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जातिगत भेदभाव से बनेगा इक्कीसवीं सदी का भारत?

जातिगत भेदभाव से बनेगा इक्कीसवीं सदी का भारत?

कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता लेकिन विगत कुछ वर्षों से भारत की राजनीति में भूचाल आना लगभग स्थाई सा हो गया है। ताज़ा भूचाल जातिगत जनगणना को लेकर है। भारत जैसे विशाल सांस्कृतिक विरासत एवं गौरवशाली अतीत वाले देश का यह दुर्भाग्य ही है कि जो संस्कृति इस देश की ताकत होनी चाहिए थी, इस देश के राजनैतिक दल अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते उसी संस्कृति को इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनाने पर तुले हैं। डिवीज़न ऑफ लेबर यानी श्रम विभाजन पर आधारित इस देश की वर्ण व्यवस्था या क्लास सिस्टम देखते ही देखते समय के साथ जाति व्यवस्था बन गई। पहले अंग्रेजों ने इस देश पर राज करने के लिए इसे अपने हथियार के रूप में उपयोग किया अब राजनैतिक दल अपनी रोटियां सेंकने के लिए इसका प्रयोग कर रही हैं। यही कारण है कि जातिगत जनगणना का मुद्दा हर राजनैतिक दल विपक्ष में रहते हुए करता है लेकिन वही दल जब सत्ता में आता है तो इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेता है। आज जो कांग्रेस अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर जातिगत जनगणना की मांग जोरशोर से कर रही है वो खुद सत्ता में रहते हुए  2011 की जनगणना का डाटा सार्वजनिक नहीं कर पाई।

इसलिए इतना तो स्पष्ट ही है  कि जब-जब ये राजनैतिक दल इस प्रकार की जनगणना की मांग करते हैं तो उनका उद्देश्य देश हित या समाज सेवा नहीं अपितु राजनीति करना ही होता है। अब यह बात खुलकर सामने आ चुकी है कि वर्तमान में राजनैतिक दलों के लिए जनगणना का उद्देश्य मात्र अपनी वोटबैंक की राजनीति रह गया है इस देश के नागरिकों की तरक्की या फिर उनके जीवन स्तर में सुधार नहीं। यही कारण है कि जनगणना के आंकड़ों में इन राजनैतिक दलों की रूचि इस देश के नागरिकों की आर्थिक अथवा उनकी सामाजिक स्थिति के बारे में जानकर उसमें सुधार करने के बजाए उनकी जिज्ञासा देश के नागरिकों की जाति जानने में होती है जिससे वो अपना वोटबैंक दुरुस्त कर पाएं। क्योंकि इनके लिए इस देश का नागरिक इस देश की पूंजी नहीं बल्कि उन्हें देश की सत्ता तक पहुंचाने वाली एक सीढ़ी मात्र है।

दरअसल जनगणना में किसी देश द्वारा विधिवत रूप से अपने नागरिकों की संख्या, उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन से सम्बंधित जानकारी इक_ा की जाती है। विश्व के लगभग हर देश में समय-समय पर यह की जाती है।  भारत में यह जनगणना हर 10 साल में होती है। स्वतंत्र भारत में यह अब तक आठ बार की जा चुकी है।

जनगणना के इतिहास की अगर बात करें तो विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में भी जनगणना का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी कराधान के उद्देश्य से जनगणना को राज्य की नीति में शामिल करने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य होता है समय के साथ देश की बदलती जरूरतों को जानना, समझना और उसके हिसाब से देश की नीतियां तैयार करना। इसके लिए जनगणना में कोई भी देश अपने नागरिकों के जीवन से जुड़ी उनकी विभिन्न जानकारियों जैसे उनका नाम, लिंग, जन्मतिथि, उम्र, वैवाहिक स्थिति, धर्म, मातृभाषा, साक्षरता जैसे मूलभूत विषयों से जुड़े प्रश्न पूछता है। इस प्रकार के आंकड़ों का प्रयोग शासन प्रशासन द्वारा लोकहित की योजनाओं और नीतियों के निर्माण के लिए किया जाता है। जाहिर है इन आंकड़ो का अध्ययन करके जमीनी स्तर पर जहाँ आवश्यकता है वहाँ सरकार विभिन्न कार्यक्रमों का संचालन कर वहाँ के नागरिकों के जीवन स्तर एवं उनकी स्थिति में सुधार ला सकती है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब जनगणना के आंकड़ों का उद्देश्य नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाना है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि वो किस जाति का है? क्या इतना काफी नहीं है कि वो इस देश का नागरिक है?  लेकिन इसे क्या कहा जाए कि  राजनीति के गिरते स्तर ने इस देश को उस सीमा पर पहुंचा दिया है जहाँ अंतर्जातीय विवाह संबंध तो समाज में  स्वीकार किए जाने लगे हैं लेकिन चुनाव में प्रत्याशी को वोट तो आज भी जाति के आधार पर ही डाले जाते हैं।

यह वाकई में निराशजनक है कि जिस देश की भूमि पर गीता जैसे ग्रन्थ की रचना हुई हो उस देश में आज कर्म से अधिक जन्म को महत्व दिया जा रहा है। जिस देश के न्यायलयों में एक अपराधी गीता जैसे कर्म की महत्ता बताने वाले ग्रन्थ पर हाथ रखकर सत्य बोलने की कसम खाता है उन न्यायालयों में जातिगत आधार पर मुकदमे ही दायर नहीं होते फैसले भी आ जाते हैं।

लेकिन अब समय आ गया है कि इस देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग समझें कि अगर एक देश के रूप में हम लोगों को तरक्की करनी है तो वो योग्यता और एकता के दम पर ही हो सकती है। अगर देश को आगे ले जाना है तो नीतियों को लाभ उसके असली हकदार को मिलना चाहिए, कतार में खड़े आखरी व्यक्ति को चाहे वो किसी भी जाति का हो। लेकिन जिस देश में नीतियां जातिगत आधार पर बनाई जाती हों, जिस देश के चुनावों में टिकट जाति के आधार पर बांटें जाते हों, जिस देश में मंत्रियों के पद जातिगत आधार पर दिए जाते हों उस देश में जनगणना की मांग जातिगत आधार पर की जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तो अब प्रश्न यह है कि क्या इक्कीसवीं सदी का भारत जातिगत भेदभाव के आधार पर बनेगा?

 


डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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