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संघ की आरक्षण-नीति : चुनाव नहीं, सामाजिक समरसता का लक्ष्य

संघ की आरक्षण-नीति : चुनाव नहीं, सामाजिक समरसता का लक्ष्य

यदि आज किसी से पूछा जाए कि भारत की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या क्या है, तो कोई भी व्यक्ति बेझिझक कह देगा-जातीय भेदभाव। पिछले दो सप्ताह में जातिवार जनगणना और पिछड़ी जातियों की सूची को लेकर जो कुछ बहस देश में चली, वह पूरी की पूरी बहस जातियों की व्यवस्था से अधिक उसमें होने वाले भेदभाव, उसके परिणामों और उसे दूर करने के उपायों पर केंद्रित रही। इस पूरी बहस से जातियों को समझने का प्रयास गायब था। इस बहस के ठीक बीच में एक पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह यानी कि सर्वोच्च अधिकारियों में से दूसरे स्तर के अधिकारी दत्तात्रेय होसबोले का वक्तव्य आ गया कि आरक्षण तो तब तक रहना चाहिए, जब तक समाज का कोई वर्ग स्वयं को उपेक्षित अनुभव करता है। उन्होंने अपने भाषण में बहुत सारी बातें कहीं।  हैरानी की बात यह है कि एकदम ठीक से प्रसारित हो रहे कार्यक्रम में अचानक से दत्तात्रेय होसबोले के वक्तव्य को मूक कर दिया गया यानी यूट्यूब पर होने वाले लाइव प्रसारण में होसबोले के बयान के अंतिम हिस्से को नहीं दिखाया गया। यह वह हिस्सा था जिसमें वे दलित पहचान के भीतर खड़े होने वाले अन्यान्य पहचानों के बारे में बोल रहे थे। वस्तुत: उनके भाषण में काम की बात यही थी, परंतु समाचार पत्रों की सुर्खी बनी आरक्षण संबंधी बात जोकि चुनावी महत्त्व रखती थी। यहाँ हमें चुनावी और राजनीतिक बातों में अंतर करना सीखना होगा, क्योंकि बहुत विचारवान और बुद्धिमान लोग भी अक्सर चुनावी मुद्दों और महत्व को राजनीतिक मुद्दा या महत्व कह दिया करते हैं। आरक्षण एक चुनावी मुद्दा है और जातीय विमर्श एक राजनीतिक विषय।

जाति व्यवस्था को लेकर संघ की राय प्रारंभ से ही निश्चित रही है। जातीय भेदभाव तथा छुआछूत को संघ ने अपने प्रारंभ से ही गलत माना है और उसे दूर करने के प्रयासों का समर्थन किया है। वस्तुत: महात्मा गाँधी से उनकी विचारसाम्यता के साझा बिन्दुओं में यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिंदू रहा है। महात्मा गाँधी जब संघ के शिविर में गए थे, तो वे वहाँ जातीय भेदभाव का अभाव देख कर वस्तुत: काफी प्रसन्न हुए थे। उन्होंने इस पर आश्चर्य भी प्रकट किया था कि बिना किसी व्यापक प्रचार के संघ कैसे इस काम को कर पा रहा है। डॉ. हेडगेवार के समय से चली आ रही इसी बात को वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने दोहराया और कहा कि छुआछूत को समाप्त करना प्रारंभ से ही संघ का प्रमुख विषय रहा है और इसके लिए उन्होंने तृतीय सरसंघचालक के प्रसिद्ध वाक्य को भी उद्धृत किया यदि छूआछूत पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है। कुछ ऐसा ही वक्तव्य उनसे वर्षों पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिया था कि यदि दास प्रथा पाप नहीं है, तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है। सरकार्यवाह दत्तात्रेय ने संघ के इस पुराने तथा सुपरिचित मत को ही अपने भाषण में प्रस्तुत किया।

एक वैश्विक तथा अत्यंत शक्तिशाली संगठन के सरकार्यवाह होने के कारण उन्होंने इसके व्यावहारिक परिणामों को भी सामने रखा। उन्होंने अत्यंत स्पष्टता के साथ कहा कि यदि समाज का कोई वर्ग असमानता का अनुभव करता है तो उसे आरक्षण देना ही होगा और इसलिए संघ प्रारंभ से आरक्षण का समर्थक ही रहा है। ध्यातव्य है कि संघ का काम हिंदू समाज को जोडऩा रहा है और इसलिए समाज को तोडऩे या बांटने वाली हर बात को दूर करने पर ही उसका जोर रहता है। किसी भी समाज के लिए भेदभावयुक्त आंतरिक विषमता का होना ठीक नहीं है और इसलिए उसे दूर करना किसी भी सामाजिक संगठन के लिए आवश्यक है। इस पर किसी को भी कोई मतभेद हो नहीं सकता। मतभेद होता है केवल इसे दूर करने के उपायों को लेकर। कम्युनिस्ट इस विषमता को हिंसा और संघर्ष से दूर करने पर जोर देते हैं, संघ का जोर होता है सद्भाव तथा परस्पर सौमनस्य के विकास से इसे दूर करने पर। वस्तुत: महात्मा गाँधी को संघ के शिविर में किसी भी स्वयंसेवक को अपनी तथा अन्य स्वयंसेवकों की जाति पर ध्यान देने पर जो आश्चर्य हुआ था, उसका मूल कारण यही था कि उस समय भी इसके पक्ष में नारे तो बहुत लगते थे, परंतु उनके कारण समाज में विद्वेष और संघर्ष ही बढ़ रहा था। केवल सौहार्द्र और आत्मीयता से भी यह कार्य हो सकता है, यह तो उन्हें संघ के शिविर में जाकर ही ध्यान आया।

समझने की बात यह भी है कि समस्या की चर्चा भी समस्या को जिंदा बनाए रखती है और यदि उस समस्या को दूर करने के नाम पर लोगों की रोजी-रोटी चल रही हो तो वे लोग उसे दूर करने की बात तो करेंगे, परंतु हृदय से उस समस्या का अंत कभी नहीं चाहेंगे। यही कारण भी है कि जातीय समानता की इच्छा रखने वाले लोग समानता को स्थापित करने के नाम पर केवल असमानता तथा विषमता की चर्चा करते हैं और इस प्रकार वे प्रकारातंर से असमानता और विषमता को ही फैला तथा बढ़ा रहे होते हैं। यह बात केवल सामाजिक संगठनों पर ही नहीं, राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। यह देखना कठिन नहीं है कि जब से देश में जातीय असमानता को दूर करने की चर्चाएं होनी प्रारंभ हुई है, तभी से देश में जातीय विषमता और संघर्ष में भी वृद्धि हुई है। अधिकांशत: इसके लिए यह तर्क दिया जाता है कि दबाई जाती रही जातियां उत्तर देने के लिए खड़ी हुईं और इसलिए यह संघर्ष बढ़ा है, परंतु यह सच्चाई नहीं है।

उदाहरण के लिए जातीय विषमता केवल ब्राह्मण-राजपूत बनाम अन्य जातियों में ही नहीं है। पिछड़े वर्ग तथा कथित दलित जातियों में भी परस्पर काफी विषमता व्याप्त है। एक पिछड़ी जाति दूसरी अति पिछड़ी जाति से भेदभाव बरतती है। उनके बीच में यह संघर्ष नहीं दिखता। आखिर कछित पिछड़ी और दलित जातियों को एक वर्ग के रूप में दिखाने और उनमें सामाजिक-राजनीतिक आंतरिक एकता को स्थापित करने के प्रयास तो किए जा ही रहे हैं न। यदि केवल भेदभाव का विरोध करने से यह हिंसा और संघर्ष बढ़ रहा होता तो फिर कथित रूप से पिछड़ों और दलितों में भी कोई एकता संभव नहीं होती, उनमें भी हिंसा और संघर्ष बढ़ता। इससे यह स्पष्ट होता है कि जातीय विषमता को समाप्त करने के नाम पर समाज को दो-तीन गुटों में बांटने के प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों जिसे हम षड्यंत्र भी कह सकते हैं, को उजागर करने के लिए राजीव मल्होत्रा और अरविंद नीलकंदन ने पुस्तक लिखी है ब्रेकिंग इंडिया जिसका हिंदी अनुवाद भारत विखंडन के नाम से उपलब्ध है। इस काम के लिए विभिन्न माध्यमों से विदेशों से भारी धन भारत भेजा जा रहा है। सामाजिक परियोजनाओं से लेकर राजनीतिक आंदोलनों तक और अकादमिक गतिविधियों से लेकर बौद्धिक लेखन तक में जातीय विषमता के आधार पर वर्गीकरण और उस वर्गीकरण को विद्वेष तथा अंतत: हिंसा में बदलने के लिए किए जा रहे प्रयासों को भरपूर वैदेशिक आर्थिक सहायताएं मिलती हैं। राजीव मल्होत्रा ने इस पुस्तक के प्रारंभ में ही ऐसे एक दलित-एफ्रो प्रोजेक्ट का उदाहरण दिया है, जिसमें भारत के कथित दलितों की अफ्रीका के काले लोगों से तुलना करने के लिए कुछ लोगों को धन देकर काम पर लगाया गया था। देश में ऐसी ढेर सारी बौद्धिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थाएं काम कर रही हैं। इसलिए संघ यदि आरक्षण का समर्थन करता है, तो इसका उद्देश्य केवल और केवल समाज के ताने-बाने की रक्षा करना मात्र है, न कि कोई चुनाव जीतना।

ऐसी विषम परिस्थिति में संपूर्ण हिंदू समाज को एक करने के लिए संकल्पबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनौतियां काफी बढ़ जाती हैं और उन चुनौतियों को ही सरकार्यवाह होसबोले अपने भाषण में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने केवल आरक्षण का समर्थन करके अपनी बात समाप्त नहीं कर दी बल्कि उन्होंने यह जोर भी दिया कि जिन्हें हम आज दलित जातियां या व्यक्ति कह रहे हैं, उनका इतिहास भी तो सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के इन कथित दलित जातियों के योगदान को समझे बिना देश के भक्ति आंदोलन को समझना संभव नहीं है। उन्होंने ऐसे कई संतों का उदाहरण दिया जो स्वयं इन जातियों से थे, परंतु जिन्होंने देश की सामाजिक समरसता को पुष्ट किया, हिंसा और संघर्ष नहीं फैलाया। उन संतों ने इन भेदभावों को जिस रचनात्मक तरीके से दूर किया, उसका इतिहास सामने आना चाहिए, संभवत: यही सरकार्यवाह होसबोले का अभीष्ट था। इस इतिहास से आज के सबक मिल सकते हैं। कैसे वैमनस्य और संघर्ष को बढ़ाए बिना भेदभाव तथा छुआछूत का विरोध किया जा सकता है, यह बात तो देश के भक्ति आंदोलन से सीखने की है। कथित दलित जातियों के इतिहास को सामने लाकर ही यह किया जा सकता है। यही उनका भाव था। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि देश के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक इतिहास का लेखन तबतक अपूर्ण ही रहेगा, जबतक कि आज जिन्हें हम दलित या पिछड़ा कह रहे हैं, उन वर्गों के योगदान की उसमें चर्चा नहीं की जाए। यह बात उनके इस मनोभाव को और भी स्पष्ट करती है कि वे देश तथा समाज को टुकड़ों में बाँट कर नहीं देखना चाहते हैं, बल्कि उसकी समग्रता में देखना ही संघ की मूल संकल्पना है।

दुर्भाग्य यह है कि भ्रमरा: मधुमिच्छिन्ति, व्रणमिच्छन्ति मच्छिका: की भाँति स्वयं को मुख्य धारा का मानने वाली मीडिया ने सरकार्यवाह के इस संकेत को सामने नहीं रखा, बल्कि उनके एक कथन का राजनीतिक आयाम भर देश भर में प्रसारित कर दिया मानो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई चुनाव लडऩे वाला राजनीतिक दल हो। प्रश्न उठता है कि क्या लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ कहे जाने वाले तथा स्वयं को अतिशय बुद्धिशील मानने वाले मीडिया को भी यह समझ नहीं है कि राजनीतिक, चुनावी तथा सामाजिक मुद्दों में क्या अंतर होता है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आरक्षण का समर्थन कोई चुनावी राजनीति का वक्तव्य नहीं होता है, वह एक सामाजिक वक्तव्य होता है। वह समाज में समरसता लाने के उपाय के रूप में आरक्षण के उपयोग पर बल देता है, न कि समाज को वर्गों में बाँट कर सत्ता प्राप्त करने लिए आरक्षण का उपयोग करने की सोचता है। संघ की इस सामाजिक चेतना और भूमिका को ठीक से समझकर उसे मीडिया में प्रस्तुत करने के प्रयास का न होना भी चिंता का एक बड़ा कारण होना चाहिए। आखिर क्या कारण हो सकते हैं कि देश के मानस को प्रभावित करने वाले एक इतने बड़े वर्ग में ऐसे दो-चार लोग भी नहीं दिखते, जो विषय को बिना किसी चुनावी पूर्वाग्रह के सकारात्मक ढंग से देख सकें।

यह ठीक है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं और चुनाव जीतना भाजपा के लिए जितना महत्त्वपूर्ण है उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण संघ के लिए भाजपा का चुनाव जीतना है। परंतु संघ के अधिकारी और वह भी सरकार्यवाह जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर बैठे अधिकारी केवल चुनावी रणनीति के तहत भाषण दें, यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। वास्तव में आवश्यकता इस बात की भी है कि किसी भी समाचार या घटना का विश्लेषण करते समय हम उसकी पृष्ठभूमियों का भी ध्यान रखें। एक चुनाव लडऩे वाले राजनीतिक व्यक्ति का भाषण और एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख के भाषण में चाहे एक ही बात कही जाए, परंतु दोनों की पृष्ठभूमि भिन्न होने से दोनों के निहितार्थ भी भिन्न होंगे। यह बौद्धिक सावधानी का मीडिया में अभाव होना निश्चय ही देश के लोकतंत्र के तो खतरनाक है ही, देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी खतरनाक है।

इस पूरे प्रकरण में चिंता का विषय वह पुस्तक भी है, जिसके लोकार्पण में सरकार्यवाह होसबोले ये  बातें कह रहे थे। हालाँकि पुस्तक के लेखक यह लिख रहे हैं कि जिन्हें आज दलित चिंतक, विचारक, नेता आदि के रूप में चित्रित किया जा रहा है, उनके पूरे समाज के लिए योगदान को रेखांकित करना ही उनका उद्देश्य है। सरकार्यवाह होसबोले ने भी इस बात को उद्धृत करते हुए कहा कि कथित दलित वर्ग के इन महान लोगों को किसी जातिविशेष के नेता या विचारक के रूप में चित्रित करना उनके साथ अन्याय करना है। वे पूरे देश के लिए मार्गदर्शन कर रहे हैं, पूरे देश के लिए सामाजिक परिवर्तन की आवाज उठा रहे हैं, उन्हें एक समुदाय मात्र का नेता बनाकर रखना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि क्या बाबा साहेब अम्बेडकर केवल दलितों के नेता हैं? ये सभी लोग भारत के नेता हैं और उन्होंने पूरे भारत के समाज के लिए कार्य किया, यह बात जबतक हम हृदय से स्वीकार नहीं करते, तब तक भारत के परिवर्तन का आंदोलन पूरा नहीं होता। दुर्भाग्य से इस पुस्तक का शीर्षक इस उद्देश्य को पूरा नहीं करता। वह इतिहास को उसी प्रकार से विखंडित करके देखने का प्रयास कर रहा है, जिसका कि पुस्तक के उद्देश्यों में खंडन किया गया है और जिस खंडित इतिहासदृष्टि को सरकार्यवाह होसबोले स्वयं मिथ्या और बेइमान लेखन कह कर खारिज कर रहे हैं। यह विरोधाभास हो सकता है कि आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में अपना स्थान बनाने के लिए आवश्यक हो, परंतु यह उस निरपेक्ष इतिहासदृष्टि को धूमिल तो करती ही है। ऐसी पुस्तकें उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करतीं, जिन उद्देश्यों की चर्चा सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने अपने पूरे भाषण में की। देश के सामाजिक ताने-बाने को तोडऩे के लिए सक्रिय ताकतें ऐसे एक भी अवसर को खोती नहीं हैं, यह तो सरकार्यवाह होसबोले के वक्तव्य के विकृत प्रस्तुतिकरण से समझा ही जा सकता है।

रवि शंकर

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