ब्रेकिंग न्यूज़ 

तालिबान 0.2 : बोतल भी वही शराब भी वही !

तालिबान 0.2 : बोतल भी वही शराब भी वही !

क्या दफ्तरों में काम करने वाली औरतों और वेश्याओं  में कोई फर्क नहीं करते तालिबानी नेता?

पाकिस्तान और कुछ हद तक चीन को छोडकर किसी भी अन्य देश ने अंतरिम अफगानिस्तान सरकार को लेकर संतोष नहीं जताया है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की आई एस आई के प्रमुख जनरल फैज़ हामिद तो सरकार बनवाने के लिए काबुल में बैठे ही थे, चीन ने भी अफगानिस्तान को 3.1 करोड़ डॉलर की फौरी मदद देने की घोषणा की है।  हालाँकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी ब्रिक्स देशों के दिल्ली घोषणापत्र पर दस्तखत किये है। भारत की अध्यक्षता में हुए ऑनलाइन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की गयी। इसमें तालिबान का नाम लिए बगैर ये भी कहा गया कि ये सुनिश्चित करना चाहिए कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों में आतंक और उग्रवाद फैलाने के लिए नहीं हो।

अफगानिस्तान के पड़ोसी ईरान ने तो सबसे कडी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने पंजशीर घाटी में तालिबान द्वारा नॉर्दन अलायंस को कुचलने की कोशिशों में बाहरी ताकतों यानि पाकिस्तान की भूमिका की कडी निंदा की है। उसने ये भी कहा है कि अफगानिस्तान में चुनाव होने चाहिए ताकि वहां एक वास्तविक प्रतिनिधित्व वाली सरकार बने। मौजूदा तालिबान सरकार में पख्तूनों और तालिबान का वर्चस्व है। अफगानिस्तान के अन्य वर्गों जैसे ताजिक और उजबेकों की इसमें अनदेखी की गयी है। शिया सम्प्रदाय को मानने वाले हजाराओं को तो प्रतिनिधित्व तक नहीं मिला है। तालिबान और महिला अधिकारों का सांप-छछूँदर का रिश्ता है सो किसी महिला को मंत्रिमंडल में जगह न  मिलना तो तकरीबन तयशुदा ही था।

यों भी तालिबान के प्रवक्ता जेकरुल्ला हाशिमी ने कहा है कि औरतों का मंत्रिमंडल में क्या काम? उन्होने कहा कि औरतों का असल काम बच्चे पैदा करना है। बृहस्पतिवार को काबुल स्थित तोलो न्यूज में प्रसारित इस इंटरव्यू में हाशिमी ने कहा कि औरतों को बस ज्यादा से ज्यादा अफगानी बच्चे पैदा करने के काम में लगना चाहिए न कि मंत्रिमंडल पद जैसी जिम्मेदारी लेना चाहिए जो वो निभा नहीं सकतीं। हाशिमी ने अपने इंटरव्यू में कहा ”पिछले 20 साल के दौरान आपके इस मीडिया, अमेरिका  और उसकी कठपुतली सरकार ने जो कहा, जो औरतें दफ्तरों में काम करतीं थीं वो वेश्यावृत्ति नहीं तो और क्या है।ÓÓ तोलो न्यूज के एंकर ने इस पर उन्हें टोका कि वे सभी अफगानी औरतों को वेश्या कैसे कह सकते हैं। इसका मतलब क्या है? क्या घर से बाहर काम करने वाली सभी औरतें वेश्या होतीं हैं। तालिबान और भारत में उनके पक्ष में बोलने वालों को इसका उत्तर देना चाहिए। इस साक्षात्कार के हिस्से इस ट्वीट में देखे जा सकते हैं।

https://twitter.com/natiqmalikzada/status/vyxz~w}xxw|v}®{||v}?s=w®

ये सोच निकलती है इस्लाम की घोर कट्टरपंथी व्याख्या से जो हक्कानी नेटवर्क जैसे कई तालिबानी मानते हैं। नयी अफगान सरकार में हक्कानी नेटवर्क को जरुरत से ज्यादा जगह मिली है। हक्कानी यानि पाकिस्तान परस्त इस्लामिक कट्टरपंथी गुट जिसे आईएसआई ने लगातार आतंक के लिए पाला पोसा है। चार हक्कानियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मालूम हो कि अफगानिस्तान के नए गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हैं। उनके सर पर एक करोड डॉलर का इनाम है। इसी तरह मंत्रिमंडल में शामिल उनके चाचा  खलीउर्रहमान हक्कानी के तार अल कायदा से जुडे रहे हैं। वे भी घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी है। मंत्रिमंडल में शामिल दो अन्य हक्कानी हैं – नजीबुल्ला हक्कानी और शेख अब्दुल बकी हक्कानी। नजीबुल्ला संयुक्त राष्ट्र द्वारा तो अब्दुल बकी यूरोपीय संघ द्वारा नामित आतंकी हैं।

अब तक अंतरराष्ट्रीय जनमत के सामने एक नया मुखौटा पहन कर आने वाले तालिबान ने अपने असली तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। आम माफी की घोषणा के बावजूद आत्मसमर्पण करने वाले अफगान सेनाकर्मियों को कत्ल किये जाने की खबरें हैं। खोर प्रान्त के फिरोजकोह इलाके में एक गर्भवती महिला पुलिसकर्मी को उसके बच्चों के सामने ही बर्बरता के साथ मार डाला गया है। मारने से पहले उसके परिवार के सामने ही उसके चेहरे और शरीर को क्षत-विक्षत किया गया। बताया जाता है कि निगारा नाम की इस पुलिसकर्मी को आठ महीने का गर्भ था।

इस हफ्ते काबुल में होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचल दिया गया है। इन प्रदर्शनों को कवर करने गए कई पत्रकारों को गिरफ्तार कर तालिबान ने कू्रर यातनाएँ दी हैं। इत्तिलातेरोज नाम के स्थानीय अफगानी अखबार के कर्मियों और संपादक को कोडे मारे गए हैं। खबर है कि रॉयटर के प्रतिनिधि एवं अन्य पत्रकारों की भी कवरेज करने के कारण पिटाई की गई है।

कुल मिलाकर अफगानिस्तान को एक नयी तालिबानी सरकार नहीं मिली बल्कि 20 साल पहले के तालिबान अपने दुर्दांत रूप में फिर से काबुल में काबिज हो गए हैं। तालिबान की इस नई पारी का कोच पाकिस्तान है जो नहीं चाहता कि अफगानिस्तान कट्टरवाद और इस्लामिक धर्मान्धता की अँधेरी खाई से बाहर निकले। अफगानिस्तान में ‘नियंत्रित अस्थिरताÓ और कट्टरवाद पाकिस्तान की नीति का हिस्सा है। उसे लगता है कि इससे वह भारत और मध्य एशिया में अपने हितों को साध लेगा। लेकिन इसमें एक ही अडचन है वो है कि ये इंटरनेट के जमाने का अफगानिस्तान है। काबुल एवं अन्य अफगानी शहरों में हो रहे प्रदर्शन इसका एक नमूना भर है। यों भी आतंक, धर्मान्धता और ‘नियंत्रित अस्थिरताÓ एक ऐसे शेर की सवारी है जो संतुलन खोने पर सवार को ही खा जाता है।

तालिबान और पाकिस्तान एक ऐसे बबंडर की ओर बड़ रहे हैं जो उनसे संभाले नहीं संभलेगा। तालिबान में हक्कानियों के दबदबे के बाद मध्य एशिया में कट्टरवाद और भारत में इस्लामी आतंकवाद बढने की गंभीर आशंका हैं। इस सबके बीच भारत को सक्रियतापूर्ण धैर्य और सतर्कता की आवश्यकता है। लेकिन असली संकट में अफगान जनता है क्योंकि अमेरिका ने उसे तकरीबन तश्तरी में रखकर हैवानों के सामने परोस दिया है। दुनिया इन आसन्न संकटों से बेखबर नहीं है। इसीलिए ब्रिटेन की गुप्तचर संस्था एम्आई 6 के प्रमुख, अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए के प्रमुख और रूस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस हफ्ते नई दिल्ली में थे। रूस और अमरीका इस मामले पर अलग-अलग राय रखने के बावजूद भारत के महत्व को समझते है। सब देख चुके हैं कि कट्टरपंथी इस्लाम से प्रेरित आतंकवाद की आग से कोई भी अछूता नहीं रहता।

 

 

उमेश उपाध्याय

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.