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अमेरिका को भारी पड़ी ट्रंप की हार : विश्व शांति को खतरा बने तालिबानी

अमेरिका को भारी पड़ी ट्रंप की हार : विश्व शांति को खतरा बने तालिबानी

जब तक रिपब्लिकन पार्टी के नेता डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति रहे चीन जैसा चालाक देश भी अपनी हर चाल में फेल होता रहा। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ट्रंप से डरता भी था, और अपने विस्तार वादी सोच को लगाम देता रहा और यहां तक कि साउथ चाइना में अपने लड़ाकू जहाजी बेड़े भी तैनात नहीं कर पाया क्योंकि ट्रंप ने अमेरिकी लड़ाकू जहाज वहां तैनात कर दिए थे। ऑस्ट्रेलिया, जापान और कुछ अन्य छोटे देशों के साथ भारत द्वारा रची गई ब्यूह रचना ने चीन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। हिंद महासागर तक पहुंचने का चीन के राष्ट्रपति का सपना भी चकनाचूर कर दिया, नतीजा यह हुआ कि चीन अपना सा मुंह लेकर रह गया और दुनिया भर में उसकी भदद पिट गई।

चीन वेस्ट कोरिडोर बनाना चाहता था जिसका रास्ता पाकिस्तान से जाता है। पाकिस्तान ने अपनी जमीन भी दे दी और पीओके मैं खुलेआम समर्पण कर दिया। चीन को कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हाथ दे दिया जिसका पीओके निवासियों ने जमकर विरोध किया पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चीन के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़े थे इसलिए उन्होंने चीन की सभी शर्तें मानी। उधर अमेरिका ने पाकिस्तान से अपना कर्ज लौटाने को कह दिया। सऊदी अरब ने भी पाकिस्तान से अपने हाथ पीछे खींच लिए। ये हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की  कूटनीति की बड़ी सफलता थी क्योंकि पाक का साथ सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका और बहुत से मुस्लिम देशों ने भी छोड़ दिया था। सऊदी अरब ने पाकिस्तान से कर्ज लौटाने को कह दिया। सऊदी अरब भारत के साथ खडा था।

डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव हारते ही चीन ने अपनी नापाक  गतिविधियां शुरू कर दी। इमरान की खुशी का भी कोई ठिकाना ना था, दोनों ने मिलकर अपना खेल शुरू कर दिया। चीन की आर्थिक मदद पर पाक पूरी तरह निर्भर हो चुका था अत: पाक अब चीन के चुंगल में फंस गया। चीन के इशारे से पाक ने तालिबानियों की गुपचुप मदद शुरू कर दी। तालिबानी अफगानिस्तान में फिर से सरकार बनाने के लिए युद्ध में तेजी से कूद पड़ा। अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बायडन शुरू से ही लाचार राजनीति कर रहे थे। उन्होंने ट्रंप द्वारा दिखाई गई बहादुरी और अमेरिका द्वारा उठाए कदमों को धीरे-धीरे पीछे खींचना शुरू कर दिया। यहां तक कि अफगानिस्तान से अपना बोरिया बिस्तर उठाने का निर्णय ले लिया। यह सच है कि अमेरिका को अफगानिस्तान में अपने सैनिकों को रखने के लिए भारी खर्च का बोझ उठाना पड़ रहा था। 20 साल से अमेरिका फिर वहां अपनी आर्मी की टुकड़ी रखकर कब्जा किए हुए थे। बायडन का यह निर्णय अफगानिस्तान पर कहर लेकर आया, तालिबानियों का जोश बढ़ गया। पाक को अंदरूनी मदद उसे मिल ही रही थी। यह अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद पाक द्वारा अफगानिस्तान में अपने हवाई जहाजों से बम गिराने से साबित हो गया। जो बायडन ने दूसरी गलती यह भी की तालिबान द्वारा दी गई 30 अगस्त की सीमा तक अपने सैनिक हटाने की बात मान ली जबकि उसे कम से कम 6 माह की अवधि पर ही सहमत होना चाहिए था। नतीजा यह हुआ कि तालिबान का गुरुर बढ़ता गया और उसने अमेरिका के दर्जन भर सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। उस पर भी जो बायडन की सरकार चुप्पी साधे रही और पिट-पिटाकर अफगान से अपने सैनिकों की वापसी शुरू कर दी। तय सीमा से एक दिन पहले ही अमेरिकी सेना की घर वापसी हो गई। जाते-जाते अमेरिका अपने लड़ाकू हेलीकॉप्टर भी छोड़ गया जो एक दर्जन से अधिक थे। ये हेलीकॉप्टर युद्ध भारी विध्वंसक जाने जाते हैं, अमेरिका अपने हेवी टैंक भी छोड़ गया। हथियारों का जखीरा छोड़ गया। ये सारे लड़ाकू हथियार और अन्य सामान तालिबान को अमेरिका ने अपनी विदाई पर उन्हें दिये। ये बात और है कि जाते-जाते अमेरिका के सैनिकों ने कुछ हेलीकॉप्टर और टैंक नष्ट कर दिए।

आज यदि ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो किसी ना किसी बात को लेकर पैच फसातें , भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करते और अमेरिका से सैनिकों को वापसी को रोकते। अफगानिस्तान में अमेरिका का दबदबा बना रहना जरूरी था। इससे पाक का दम घुटता रहता  और चीन भी अपने घर तक सीमित रहता। अब पाक ने तालिबान के हक में अफगानिस्तान में लड़ाकू जहाज भेजकर बम गिराए हैं। तालिबान के खिलाफ मसूद की अगुवाई में लड़ रहे सैनिकों के साथ जंग शुरू दी। इस तरह तालिबान को अपनी मदद करके पाकिस्तान ने दोस्ती का दम भरा है, और तालिबान को आगे चलकर पाक का ओर भी साथ देगा। यदि तालिबान को आर्थिक मदद नहीं मिली तो उसे विश्व समुदाय के आगे घुटने टेकने पडग़ें। ऐसे में दोस्त का दोस्त चीन उस पर उपकार जरूर करेगा। आर्थिक मदद के साथ-साथ सैन्य मदद भी कर सकता है। आखिर उसे अपने वेस्टर्न कोरिडोर को आगे ले जाना है। जिससे वो वेस्ट ईस्ट एशिया में अपने व्यापार को आसानी से फैला सके और अपने पाँव जमा सके। आज अफगानिस्तान का मामला छोटा दिखाई दे रहा है, छोटा देश भी है, जिसका विश्व में कोई विशेष स्थान नहीं है। लेकिन तालिबान सरकार को मान्यता ना मिले, बहुत से देश उसे मान्यता न भी दें पर उसकी भौगोलिक और राजनैतिक स्थिति को लेकर दोनों चालाक देश पाकिस्तान और चीन इसको हर समय विश्व राजनीति का केंद्र बनाए रखेंगे, इसी से उनका उल्लू सीधा होगा। अमेरिका के राष्ट्रपति बायडन के लिए उनका निर्णय गले की हड्डी बन गया। अमेरिका के तमाम समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट,  गार्जियन आदि सभी ने उनके निर्णय के विरोध में लिखा है। उनकी लोकप्रियता बहुत तेजी से  घटी है। आतंकवादियों द्वारा न्युयॉर्क पर किया गये हमले से अमेरिका के लोगों में आज भी दहशत है। अब तालिबानियों का अलग देश ही बन गया है जो अमेरिका नहीं पूरे विश्व के शांति के लिए खतरा है। ट्रंप तो यहां तक कह गए कि अमेरिका को अपनी हानि हुई और 2 लाख करोड़ डॉलर की वसूली तालिबान सरकार से करनी चाहिए। आवश्यकता पडऩे पर तालिबान को सबक सिखाने के लिए बम भी गिराना चाहिए। अमेरिका के लोग आज ट्रंप के हारने से अवश्य दुखी हुए होंगे और पछता रहे होंगे।

सात साल का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिकॉर्ड बताता है कि भारत अपने को सुरक्षित रखने की क्षमता के साथ दुश्मनों को सबक सिखाने से भी नहीं चूकता है। जहां तक भारत का प्रश्न है भारत अभी स्थिति और परिस्थितियों का आंकलन कर रहा है तालिबान का कहना है कि वो भारत के साथ अच्छे संबंध रखना चाहता है पर उसकी कथनी और करनी एक होगी इसमें संशय है। आखिर उसे पाक और चीन के साथ चलने की मजबूरी होगी और यह दोनों भारत विरोधी एजेंडा चलाते हैं। दूसरी बात पाक के नेता और कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती कह रही कि तालिबान की मदद द्वारा कश्मीर को भारत से हटाएंगे। तालिबान का हऊआ पाक को खुद हो सकता है। भारत के लिए तालिबान को मसलने में मात्र 2 दिन ही लगेंगे। पाक यदि उसके साथ खड़ा होगा तो भारत उसे भी साथ-साथ निबटा देगा। तालिबान भारत की आर्मी के आगे 2 दिन भी लड़ाई में नहीं ठहर सकता। पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारने वाले भारत ने चीन को डोकलाम मैं पीछे ढकेल दिया था फिर लद्दाख में भी उसे अपनी स्थिति पर वापस जाना पड़ा। हाल ही में जब काबुल एयरपोर्ट से तालिबान ने 150 से अधिक लोगों को उठाकर कैंप में डाला जिसमें 100 से अधिक भारतवासी भी थे। भारत ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए दो टूक चेतावनी दी थी। नतीजन तालिबान उन भारतीयों को सुरक्षित बाहर ले आए और भारत वापस भेजने के लिए तुरंत तैयार हो गये। स्मरणीय है कि भारत, यमन जैसे देश में भयानक विषम परिस्थितियों में अपने 4000 से अधिक जवानों को एयर लिफ्ट कर हवाई जहाज से सुरक्षित ले आया था, 1000 से ज्यादा विदेश नागरिकों को भी बाहर निकाल लाया। भारत की इस क्षमता को पूरे विश्व ने देखा था। रूस भी इस समय शांति से स्थिति को देख, परख रहा है और भारत को भी चुपचाप चुप रहने का इशारा कर रहा है। यदि ट्रंप की बात मानकर अमेरिकी सरकार अफगानिस्तान से अपने नुकसान की रकम की वसूली करता है और न देने पर अपने लड़ाकू जहाजों से आक्रमण करता है तो उसकी चीन के साथ युद्ध की भी सम्भावना होगी। ऐसे हालातो में अफगानिस्तान विश्व युद्ध का केंद्र बन सकता है। भारत ऐसी परिस्थितियों में मूख दर्शक बनकर नहीं रह सकता। पिछले सात साल का नरेंद्र मोदी का रिकॉर्ड बताता है कि भारत अपने को सुरक्षित रखने की क्षमता के साथ दुश्मनों को सबक सिखाने से भी नहीं चूकता। अमेरिका की स्थिति ऐसी दिखाई देती है कि यदि आज चुनाव हो जाये तो निश्चित ही डोनाल्ड ट्रंप वहां के राष्टपति होंगे।

 

 

डॉ. विजय खैरा

 

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