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ग्रीन हाइड्रोजन भविष्य की ऊर्जा

ग्रीन हाइड्रोजन भविष्य की ऊर्जा

हाईड्रोजन-एक रंगहीन, गंधहीन गैस है, जो पर्यावरणीय प्रदूषण से मुक्त भविष्य की ऊर्जा के रूप में देखी जा रही है। वाहनों तथा बिजली उत्पादन क्षेत्र में इसके नये प्रयोग पाये गये हैं। भारत की सबसे बड़ी तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने अपनी मथुरा रिफाइनरी में देश का पहला ‘ग्रीन हाइड्रोजनÓ प्लांट बनाने की घोषणा कर दी है। इस कदम का उद्देश्य भविष्य में तेल और ऊर्जा के स्वच्छ रूपों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तैयार करना है। कंपनी प्रायोगिक आधार पर कई हाइड्रोजन उत्पादन इकाइयां स्थापित करने की योजना भी बना रही है।

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा जारी ”वर्ल्ड एनर्जी ट्रांज़ीशन आउटलुकÓÓ रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2050 तक कुल ऊर्जा मिश्रण में हाइड्रोजन की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत तक हो जाएगी औऱ इसके उपयोग किये जाने वाले इस हाइड्रोजन का लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक गैस के बजाय जल से प्राप्त किया जाना चाहिये। इसके पहले केंद्र सरकार ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को वर्ष 2022 के 175 गीगावाट से बढ़ाते हुए वर्ष 2030 तक 450 गीगावॉट कर दिया है।  इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु केंद्रीय बजट 2021 में राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन का प्रस्ताव दिया गया है। इस मिशन के द्वारा हाइड्रोजन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाना है। देश का ऊर्जा क्षेत्र का प्रबंधन आज न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भी ज्यादातर ऊर्जा का उत्पादन तापीय ऊर्जा संयंत्र से होती है जो पूरी तरह से कोयले के उपयोग पर निर्भर हैं। ऐसे में हाइड्रोजन ऊर्जा एक स्वच्छ और प्रचुर ऊर्जा के रूप में उम्मीदें जगाती है।

ग्रीन हाइड्रोजन शक्तिशाली फ्यूल है, शून्य उत्सर्जन के साथ भारी मशीनों को चलाने में सहायक होगा, जो सौर और पवन ऊर्जा से नहीं चल पाती हैं। यह कार्बन मुक्त ईंधन पानी से तैयार किया जाएगा। इसके लिए अक्षय ऊर्जा स्रोतों से तैयार बिजली से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अणुओं को अलग किया जाएगा। यह आम ईंधन के मुकाबले तीन गुना तक ऊर्जा देता है। यह पूरी तरह से एक स्वच्छ ऊर्जा है क्योंकि इसके उपयोग के बाद उत्पाद में केवल पानी ही निकलता है जिससे यह पूरी तरह से प्रदूषण रहित होता है। इसकी उच्च ईंधन कारगरता की वजह से इसका उपयोग अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण के लिए रॉकेट ईंधन के रूप में होता है। हाइड्रोजन एक ऐसा तत्त्व है जो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अत: इसका उपयोग स्वच्छ ईंधन के लिये  वैकल्पिक तौर पर किया जा सकता है। भविष्य में स्वच्छ ईंधन के प्रयोग एवं बिजली की उच्चतम मांग को पूरा करने के लिये सरकार को हाइड्रोजन ईंधन के उत्पादन की दिशा में कार्य करना चाहिये।

आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने बहुत कम लागत में पानी से हाइड्रोजन ईंधन को अलग करने की तकनीक खोज निकाली है। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर और स्टूडेंट्स की एक टीम ने हाइड्रोजन प्रोडक्शन पायलट प्लांट में ईंधन बनाकर तैयार कर लिया है। वहीं, वाराणसी स्थित आईआईटी-बीएचयू में सेरामिक इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक डॉ. प्रीतम सिंह ने फसलों के अवशेष जैसे कि पराली-पुआल, गेहूं, गन्ने का छिलका और काष्ठ अवशेष आदि से दुनिया का सबसे शुद्ध हाइड्रोजन ईंधन बनाया है।

ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा भारत के राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (ढ्ढहृष्ठष्ट) लक्ष्य को पूरा करने एवं क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये महत्वपूर्ण है। ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा भंडारण के एक विकल्प के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है, जिसका उपयोग भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में किया जा सकता है। यह भविष्य के लिए फायदेमंद साबित होता दिख रहा है। इससे जीरो कार्बन फुटप्रिंट बनी रहती है।  ग्रीन हाइड्रोजन से जीरो कार्बन उत्सर्जन होता है। इससे प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निजात मिलेगी। इसके स्टोरेज की बात की जाए तो इसे टैंक में स्टोर किया जा सकता है। ऐसे में वाहनों के लिए यह अत्यंत उपयोगी साबित होगी। इसका वजन भी काफी हल्का होता है। यह लीथियम बैटरी की तुलना में बेहद हल्की है। लम्बी दूरी के वाहन अधिक मात्रा में इसे ले जा सकते हैं। इसके  साथ ही इसे कम समय में रिफ्यूल किया जा सकता है।

 

विभिन्न फायदों के अलावे  इसमें कुछ चुनौतियाँ भी है।

इसमें पहली चुनौती इसके सुरक्षा को ले कर है। अत्यधिक ज्वलनशील होने की वजह से हाइड्रोजन अत्यधिक खतरनाक भी होता  है। इससे चलने वाले किसी भी वाहन को सुरक्षित नहीं माना जा सकता। दूसरी चुनौती आपूर्ति-भंडारण  के रूप में देखा जा सकता है। ज्वलनशीलता और बहुत कम ताप पर रखे जाने की मजबूरी के चलते इसका सुरक्षित आपूर्ति और भंडारण आज भी एक मुश्किल काम बना हुआ है। यह इतना तीव्र ज्वलनशील है कि इसे विस्फोट की श्रेणी में रखा जा सकता है।  फिर भी ऐसा नहीं है कि इसे नियंत्रित कर जलाया नहीं जा सकता है। तीसरी चुनौती उत्पादन लागत के रूप में है। पेट्रो पदार्थों की तुलना में हाइड्रोजन की उत्पादन लागत भी अभी काफी ज्यादा है। व्यावसायिक रूप से हाइड्रोजन का उपयोग करने के लिए एक और सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ग्रीन हाइड्रोजन का निष्कासन है। हाइड्रोजन निष्कासन की प्रक्रिया बेहद खर्चीली होती है। वर्तमान में अधिकांश नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन, जिससे कम लागत में बिजली का उत्पादन किया जा सकता है, का उत्पादन केंद्र उन स्थानों से दूर स्थित है जहॉं उनकी मांग है।

नीति-निर्माताओं को इस तकनीक पर कार्य करने वाली संस्थाओं को प्रारंभिक चरण में निवेश की सुविधा प्रदान करनी चाहिये और भारत में ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़ी प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना चाहिये। इसके लिये सरकार को तो आगे आना ही होगा साथ ही निजी क्षेत्र को भी भविष्य के लिये ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये आगे आना होगा।भारत को राष्ट्रीय सौर मिशन के अनुभव से सीखना चाहिये और घरेलू विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।

दुनिया के बड़े देशों से तुलना की जाए तो भारत अब भी जीवाश्म ईंधन और बिजली उत्पादन में कोयले पर बहुत निर्भर है। नई तकनीकी अपनाने में भी देश में वह तेजी नहीं हैं जो दुनिया के विकसित देशों में दिखाई देती है। हाल ही में घोषणा की गई थी कि अगले छह सालों में भारत अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता को ढाई गुना बढ़ाएगा। यह मिशन भारत की दुनिया में स्थिति को बेहतर कर सकता है।

इसके चुनातियों से निपटने के लिए कुछ प्रयास करने की आवश्यकता है, जिससे कि इस भविष्य के ईंधन को उपयोग करने में सहूलियत हो। इसके लिए पहला कार्य है, इसके उत्पादन को विकेंद्रीकृत किया जाए विकेन्द्रीकृत हाइड्रोजन उत्पादन को एक इलेक्ट्रोलाइज़र, जिसका प्रमुख कार्य जल को और में विभाजित करना है, उसमे अक्षय ऊर्जा की पहुॅंच सुनिश्चित कर किया जाता है। दूसरा प्रयास, न्यूनतम आंतरायिकता करना है। विकेंद्रीकृत हाइड्रोजन उत्पादन के लिये चौबीस घंटे नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये एक तंत्र की आवश्यकता होगी, जिससे कि लगातार बिजली उपलब्ध हो सके। तीसरे प्रयास के रुप मे, नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी आंतरायिकता यानी इंटरमिटेंसी है, जिसका मतलब किसी शक्ति स्रोत को अनजाने में रोका जाना या आंशिक रूप से अनुपलब्ध होना, को कम करने के लिये, ईंधन सेल को निरंतर हाइड्रोजन आपूर्ति सुनिश्चित करना होगा। चौथी प्रयास, समवर्दि्धत उत्पादन करना है। पारंपरिक रूप से उत्पादित हाइड्रोजन के साथ ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से हाइड्रोजन की आपूर्ति की विश्वसनीयता में सुधार करने से ईंधन के अर्थशास्त्र में काफी सुधार होगा। इन सब प्रयासों से चुनौतियों से निपटने में सहूलियत मिलेगी और भारत के भविष्य के लिए ईंधन की दुनियां में लाभदायक साबित होगा।

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

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