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गौ-सेवा, नारायण-सेवा : गौ-पालन को धार्मिक आस्था के साथ आर्थिक विकास से भी जोडऩा समय की सबसे बड़ी मांग

गौ-सेवा, नारायण-सेवा :  गौ-पालन को धार्मिक आस्था के साथ आर्थिक विकास से भी जोडऩा समय की सबसे बड़ी मांग

आज भी अधिकांश भारतीय रसोई घरों में पहली रोटी गाय की, और अंतिम श्वान की उतारने का ही प्रचलन है। यूँ तो अज्ञात कारणों की वजह से गायों की संख्या में कमी आती जा रही है ,जिसके चलते गली मोहल्लों में गाय का तयशुदा वक्त पर रंभाना ,और निश्चित घरों के सामने आकर रोटी के लिए खड़े हो जाना कम होता जा रहा है। बावजूद इसके यदि भारत में गाय को माता के समान दजर्ऱ्ा देना बुरा क्यों हो सकता है? इस सम्बंध में सितम्बर 01 को इलाहाबाद (प्रयागराज) हाई कोर्ट ने क्रांतिकारी सिद्ध हो सकने वाली टिप्पणी की है। उक्त सख्त टिप्पणी में कहा है गो माँस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। जीभ के स्वाद के लिए किसी के जीवन का अधिकार नहीं छीना जा सकता। एक बीमार गाय भी खेती के लिए उपयोगी पशु होता है। इसलिए इसकी हत्या की इज़ाजत नहीं दी जा सकती। उक्त कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की है इस हत्या के आरोपी को यदि छोड़ दिया गया तो वह फिर कोई अपराध कर सकता है। उक्त हाई कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया है कि गाय को  राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिए संसद में सरकार को बिल लाना पड़ेगा।

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि उत्तराखण्ड विधानसभा में लगभग ढाई साल पहले ही गाय को राष्ट्र माता का कहने का प्रस्ताव पारित हो चुका था। इसे आगे की कार्यवाही के लिए तत्कालीन केन्द्र सरकार के पास भी भेजा गया था। इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से बचाने के लिए जानकार कहते हैं कि चूँकि उक्त मामला लम्बे समय से विवाद का विषय बना हुआ है, इसलिए बेहतर होगा  कि गो हत्या को अपराध मानकर कड़े दण्ड का प्रावधान किया जाए। गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका सदियों से गुणगान किया जाता रहा है। ऐसा व्यवहार शायद किसी अन्य पशु के बारे में नहीं किया जाता। बदलते समय चक्रने गोरक्षा के सम्बंध में हिन्दू मान्यताओं का सम्मान करना अन्य सम्प्रदायों को भी सिखा दिया है। तो कुछ इतिहासकार यहाँ तक कहते हैं कि मुग़ल बादशाह अकबर, और औरगंजेब भी एक विशेष महीने में गायों के वध पर सख्त पहरे बैठा दिया करते थे।

पौराणिक आख्यानों में कई जगह उल्लेख है कि गाय पृथ्वी पर स्थित वह पशु है, जिसमें 33 करोड़ देवी देवता निवास करते हैं। इसी आधार पर माना जाता कि प्रतिदिन यदि गाय के दर्शन कर लो, तो सभी पाप अपने आप धुल जाते हैं। मन को जो शान्ति मिलती,उससे जीवन में कुहासा भी प्रवेश नही कर पाता। फिर, दोहराना पड़ेगा कि यह सिर्फ,और सिर्फ आस्था का विषय है। ऐसे नाजुक विषयों पर न तो बहस की जाती, न ही आधुनिकता का तकाज़ा देकर कुतर्क किए जाते हैं। भारत एक मात्र देश, जहाँ संसार के सभी जीवित ग्यारह धर्मों को अपने अपने रीति रिवाज अपने तरीके से मनाने की स्वतंत्रता है। विश्व के सबसे बड़े गोपालक भगवान कृष्ण ही थे, और उन्होंने ही गीता में कहा है कि बचाहे जो हो जाए किसी की आस्था को ठेस नहीं पहुंचाई जाती। मध्यप्रदेश के कभी हिस्सा

रहे छत्तीसगढ़ में तो गाय के गोबर को लेकर वहाँ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की परिकल्पना की तो शायद जोड ही न  मिले। इसी राज्य  ने सिंगल यूज्ड प्लास्टिक की सफल योजना की तरह गोधन योजना का प्रारम्भ। इस अति महत्वाकांक्षी  अभियान के अंतर्गत पशु पालकों, और किसानों से सरकार ने गाय का गोबर खरीदना प्रारम्भ किया जिससे करीब 2 लाख लोगों को तत्काल रोजगार की प्राप्ति हुई।

इन सब के बावजूद गाय पर दया नही की जाती क्योकि गे किसी की दया को नही तरसती और वो, इसलिए कि पूरे संसार पर दया करते रहने को तो गाय अपने सम्पूर्ण जीवन काल यानी लगभग 20 साल  कटिबद्ध रहती है। वो भी बिना किसी अपेक्षा या विरोध के। इसीलिये तो गाय को कामधेनु कहते हैं। अब यह कहावत जाने भी दें कि दूध देती गाय की तो लात भी बर्दाश्त करनी पड़ती है। वैसे गाय के दूध को अमृत इसलिए भी कहा जाता है कि यदि नवजात शिशु की माँ को दूध नहीं आए तो गाय का दूध ही पिलाया जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि करीब दो ढाई साल पहले एक बेस्ट सेलर किताब आई थी, जिसका टाइटल है द हंगरी काऊ। इसके लेखक रणदीप सिंह राणा है। औपन्यासिक शैली में लिखी गई इस किताब में गाय की कारुणिक स्थिति को तो बयान किया गया है, साथ ही बताया गया है कि भूखी, लाचार, और बीमार गायों की जाने अनजाने में कैसे अनदेखी कर दी जाती है। जयपुर में गो पालन में के लिए विश्व का सबसे बड़ा केन्द्र कुछ सालों से राज्य सरकार के फण्ड से चल रहा है। बीच मे अचानक कथित रूप से तन्दरूस्त कही जा रही गायें बड़ी संख्या में मरने लगी। इन्हें कोई कोविड 19 या अन्य संक्रमण से जुड़ा रोग नहीं था। पहले, तो यह खबर दबा दी गई, लेकिन मीडिया में जब एक दो क्लू लीक हुए, तो पता चला कि पेंच कहाँ, और किसने फंसाया है। दरअसल, उक्त गायों के लिए पर्याप्त फण्ड तो जारी कर दिया गया था, लेकिन गायों के परम भोजन उच्च कोटी के चारे की बजाय उन्हें आलू, और टमाटर जैसी पोषण रहित वस्तुएं खिला दी गईं। तुर्रा यह कि बाड़े में जमा गोबर, और कीचड़ के टापू बनते चले गए। गांयों उनमें दबकर या घायल हो गईं या जाती रहीं। वहाँ मच्छरों कीड़ों का बोलबाला भी था इसी तरह भूखी और बीमार गायों के वहां ऑपरेशन किये

गए, रो 15 किलो तक पॉलीथिन, प्लास्टिक, कचरा, बैटरी, आदि मिली। बाद में पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी किसी पर सुनिश्चित ही नहीं की गई। जान लें कि इन गायों की

संख्या सैकड़ों में हो गई बताई गई थी। इन्दौर में भी एक स्वयं सेवा संगठन आश्रयहीन गायों, और श्वानों को देख भाल में में सक्रिय है, जिसका संचालन मुख्य रूप से युवतियां पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान भाजपा सांसद मेनका गांधी के सहयोग से करती हैं। इस केन्द्र की शुरुआत में 80 श्वान,और 30 गायों को रखा गया था। मुम्बई स्थित आईआईटी, के शोधकर्ता तो अब गो मूत्र के बारे में भी कहने लगे है कि इसमें भी औषधि गुण होते है जिन ओर प्रयोग कीट जा रहा है। उनका कहना है की जब पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई स्वमूत्र चिकित्सा से सौ साल सक्रिय जीवन बिता सकते है तो गो मूत्र को भी शरीर का वेस्ट नही माना जा सकता।

 

नवीन जैन

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