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राजा महेंद्र प्रताप : इतिहास के पन्नों से

राजा महेंद्र प्रताप : इतिहास के पन्नों से

भारतवर्ष को आजादी दिलाने में कितने सुने-अनसुने आजादी के मतवालों ने अपनी शहादतें दी, इसका लेखा-जोखा रखना किसी भी सरकार के वश की बात नहीं लेकिन आजादी के तुरंत बाद की सरकारों ने एक परिवार के दरवाजे पर मत्था टेकने वालों को ही असली स्वतंत्रता सेनानी का तमगा दे एक गलत परंपरा की नींव डाल दी, जिसे बाद की सरकारें ढोती रही हैं। लेकिन वर्तमान केंद्रीय सरकार इस आजादी के अमृत वर्ष यानी के 75वें साल में उन भूले बिसरे आजादी के मतवालों को उचित सम्मान देने का काम कर रही है। देश की राजधानी से कोई पौने दो सौ किलोमीटर दूर अलीगढ़ में  अभी एक पखवाड़े पहले जैसे का माहौल था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद वहां मौजूद थे। उन्हीं के हाथों एक विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई है। यह विश्वविद्यालय राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर है। आज जहां उत्तर प्रदेश का हाथरस जिला पड़ता है, वहीं पर राजा महेंद्र प्रताप सिंह की रियासत हुआ करती थी। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जिस जमीन पर बना है, वह राजा साहब के खानदान की ही दी हुई है। उनके नाम पर विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग लंबे समय से हो रही थी। और इस मांग  का सम्मान आखिरकार मोदी सरकार ने किया और अब राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय अस्तित्व में आने जा रहा है।

आधारशिला रखने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार उन स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देते हुए याद कर रही है जिन्हें इतिहास में भुला दिया गया और उन्हें उनका वास्तविक स्थान और सम्मान नहीं मिला। श्री मोदी ने कहा कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने न केवल देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने शिक्षण संस्थानों की स्थापना के अलावा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए जमीन भी दान में दी थी। उन्होंने युवाओं से चुनौतियों के समय राजा महेंद्र प्रताप सिंह से प्रेरणा लेने की अपील की। प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव के अन्तर्गत सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रही है।

उद्घाटन से पहले प्रधानमंत्री ने आगामी राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय और डिफेंस कॉरिडोर के प्रदर्शनी मॉडल का निरीक्षण किया। इस विश्वविद्यालय की स्थापना अलीगढ़ की कोल तहसील के ग्राम लोढ़ा और ग्राम मुसेपुर करीम जरौली में 92 दशमलव दो-सात एकड़ से अधिक क्षेत्र में की जाएगी। राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय के पहले चरण में निर्माण कार्य के लिए 101 करोड 41 लाख रुपये स्वीकृत किए हैं। इस विश्वविद्यालय में कौशल विकास और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम पढाये जायेंगे। विश्वविद्यालय की स्थापना से अलीगढ़ हाथरस, कासगंज, एटा और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े लगभग 395 महाविद्यालय सम्बद्ध होंगे।

विरोधी को सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर विपक्षी पार्टियां सबसे बड़ा आरोप लगाती हैं कि ये आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास से अपने विरोधी विचारधारा वालों को बेदखल करना चाहते हैं। लेकिन 14 सितंबर को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद इन आरोपों की सारी  हवा ही निकल गयी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी शख्सियत के नाम पर अलीगढ़ में विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया, जिसने भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में शामिल पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ 1957 के लोकसभा चुनाव में मथुरा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरकर उन्हें मात दी थी। इस चुनाव में जनसंघ प्रत्याशी अटल बिहारी वाजपेयी चौथे स्थान पर रहे थे, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जीत दर्ज की थी। हालांकि बलरामपुर सीट से वाजपेयी करीब साढ़े नौ हजार वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे थे।  उन्होंने मथुरा के अलावा बलरामपुर सीट से भी नामांकन दाखिल किया था।  उन्हीं राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर योगी सरकार अलीगढ़ में यूनिवर्सिटी का निर्माण करवाने जा रही है, जिसका शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों 14 सितंबर को हुआ। यह भी एक सोचनीय तथ्य है कि  उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जो कहती है वो करती भी है। दरअसल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2019 में जनता से जाट राजा के नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना का वादा किया था।

महेंद्र प्रताप सिंह-इतिहास के झरोखे से

इसमें कोई शक नहीं की जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह से आज की पीढ़ी अनजान थी।  अब उनके नाम पर अलीगढ़ में यूनिवर्सिटी बनने के ऐलान के साथ ही उन पर चर्चा होने लगी है। राजा महेंद्र कौन थे, उनका जाट समाज के लिए क्या योगदान रहा है, पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का नाम उनके नाम पर करने की चर्चा क्यों हो रही थी, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उनका क्या योगदान था, ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब अब एक के बाद एक सामने आ रहे हैं।  नवभारत टाइम्स की एक रपट के अनुसार 1886 में अलीगढ़ की मुरसान रियासत के वारिस के रूप में महेंद्र प्रताप सिंह का जन्म हुआ। तीन साल की उम्र में महेंद्र प्रताप को हाथरस के राजा हरनारायाण ने गोद ले लिया। शुरुआती पढ़ाई एक सरकारी स्कूल में हुई, मगर बाद में उन्हें मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेजिएट स्कूल में दाखिल कराया गया, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना। महेंद्र प्रताप ग्रैजुएशन पूरा नहीं कर पाए। दाखिले के 10 साल बाद यानी 1905 में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। छात्र जीवन से ही राजनीति में गहरी दिलचस्पी थी। ससुर को नापसंद था फिर भी 1906 में महेंद्र प्रताप ने कोलकाता जाकर कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया। स्वदेशी आंदोलन में शामिल कई नेताओं से मुलाकात ने महेंद्र प्रताप के दिल में देशभक्ति की आग तेज कर दी। तय किया कि बतौर शाही वारिस छोटे उद्योगों और स्वदेशी माल को प्रोत्साहित करेंगे। महेंद्र प्रताप पर दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल की बातों का तगड़ा प्रभाव था। अपने राज्य में विदेशी कपड़ों को जलाने का आंदोलन महेंद्र प्रताप ने ही शुरू किया।

काबुल में बनाई भारत की पहली अंतरिम सरकार

पहला विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। इधर, राजा महेंद्र प्रताप के दिल में मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की ज्वाला धधक रही थी। दिसंबर 1914 में वो तीसरी बार देश से बाहर गए। इस उम्मीद में कि विदेशी ताकतों की मदद से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराएंगे। यूरोप के कई देशों में घूम-घूमकर संपर्क बढ़ाने के बाद महेंद्र प्रतान ने काबुल का रुख किया।

1 दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह का 28वां जन्मदिन था। उसी दिन उन्होंने काबुल में भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया। खुद को राष्ट्रपति बनाया और मौलवी बरकतुल्लाह को प्रधानमंत्री। अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया गया। अगले कुछ साल यूं ही संघर्ष में गुजरे। रूस के लेनिन के साथ महेंद्र प्रताप की अच्छी बनती थी। लेनिन ने राजा को रूस बुलाया। तब तक अंग्रेजों की नजर में महेंद्र प्रताप बड़ा खतरा बन गए थे। अंग्रेजी हुकूमत ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह के सिर पर इनाम रख दिया, उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली और भगोड़ा घोषित कर दिया। राजा साहब को 1925 में जापान भागना पड़ा। जापान में भी राजा साहब इसी कोशिश में रहे कि विश्व युद्ध से उपजीं परिस्थितियों का फायदा उठाकर भारत को आजाद कराया जाए। 1932 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था। 32 साल बाद, 1946 में राजा महेंद्र प्रताप भारत लौटे और सीधे महात्मा गांधी से मिलने वर्धा गए। तब तक स्वतंत्रता तय हो चुकी थी। आजादी के बाद महेंद्र प्रताप ने जनता के हाथों में सत्ता दिलाने की मुहिम शुरू की। हालांकि जवाहर लाल नेहरू सरकार ने उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया। कांग्रेस के भीतर भी राजा साहब को तरजीह नहीं मिली।

बिना पासपोर्ट का यात्री

राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने 50 से ज्यादा देशों की यात्रा की थी। इसके बावजूद उनके पास भारतीय पासपोर्ट नहीं था। उन्होंने अफगान सरकार के सहयोग से 1 दिसंबर 1915 को पहली निर्वासित हिंद सरकार का गठन किया था। आजादी का बिगुल बजाते हुए वह 31 साल आठ महीने तक विदेश में रहे। हिंदुस्तान को आजाद कराने का यह देश के बाहर पहला प्रयास था। अंग्रेज सरकार से पासपोर्ट मिलने की बात संभव ही नहीं थी। उनके पास अफगानिस्तान सरकार का पासपोर्ट था।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह की आत्मकथा ‘माय लाइफ स्टोरी’ के मुताबिक, राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने हिंदुस्तान छोडऩे से पहले देहरादून के डीएम कार्यालय के जरिए पासपोर्ट बनवाने का प्रयास किया था, लेकिन एक अखबार में जर्मनी के समर्थन में एक लेख लिखने के कारण पासपोर्ट बनाने में बाधा पैदा हुई थी। इसके बाद राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने समुद्र मार्ग से ब्रिटेन पहुंचने की योजना बनाई। बाद में उन्होंने स्विट्जरलैंड, जर्मनी, सोवियत संघ, जापान, चीन, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की जैसे देशों की यात्रा की। 1946 में वे शर्तों के तहत हिंदुस्तान वापस आ सके।

इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती की जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान कितना महत्वपूर्ण था। राजा महेंद्र प्रताप सिंह की ही राह पर आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी चले। दोनों ने बाहर देशों में जाकर निर्वासित सरकारें बनाईं, इसे लेकर दोनों में समानता जरूर है, लेकिन दोनों की पॉलिटिकल राह अलग मानी जाती है। सुभाष चंद्र बोस जहां घोषित तौर पर कांग्रेसी नेता थे, वहीं राजा महेंद्र प्रताप सिंह कांग्रेसी नहीं थे। हां, उस दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उनकी धाक जरूर जमी थी।  महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में महात्मा गांधी उनके पत्राचार से इसका साफ पता चलता है। महात्मा गांधी ने कहा था कि राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था। उससे पहले भी उनकी ख्याति का हाल अफ्रीका में मेरे पास आ गया था। उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं। उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है। वर्ष  1939 में महात्मा गांधी को लिखे एक पत्र में, राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने उन्हें जिन्ना के बारे में सचेत किया। उन्होंने लिखा था, ”जिन्ना जहरीला सांप है, इसे गले मत लगाइए।’’ राजा एमपी सिंह 1895 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के छाल बने, जिसका 1920 में नामकरण अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हो गया। इस विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए जाट राजा ने 1929 में अपनी जमीन दान की थी, जिसे तिकोनिया पार्क कहा जाता है। एएमयू में जिन्ना की तस्वीर और नाम हर जगह मिलेगा, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह का नामो-निशान नहीं है।

अभी सिर्फ आधारशिला रखी गयी है तो हंगामा शुरू हो गया है, जब यह विश्वविद्यालय कार्य करने लगेगा तब तो पता नहीं क्या हो। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक डॉ. विवेक सिंह कहते हैं ‘मोदी और योगी सरकार का यह कदम एक दूर की कौड़ी है, जो आम आदमी की समझ से बाहर है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर यह विश्वविद्यालय उसी मुस्लिम यूनिवर्सिटी की जड़ें खोदेगा जिसने राजा महेन्द्र प्रताप को आज तक उनका योग्य स्थान नहीं दिया है।’ यह भी सच है की जिस तरह से योगी सरकार अपने इस वादे  को पूरा करने के पीछे खड़ी है, उससे उम्मीद तो यही है उत्पाती तत्वों को प्रश्रय देने वाली अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुकाबले महेन्द्र प्रताप विश्वविद्यालय ना सिर्फ अपनी शिक्षा से क्षेत्र को प्रदीप्तमान करेगी बल्कि क्षेत्र पर लगे आतंक की फैक्ट्री होने के तमगे को मिटाने का भी काम करेगी।

 

नीलाभ कृष्ण

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