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हकीम अब्दुल हमीद : हमदर्द उद्यम के दूरदर्शी संस्थापक

हकीम अब्दुल हमीद : हमदर्द उद्यम के दूरदर्शी संस्थापक

हकीम अब्दुल मजीद साहब ने जो सफर शुरू किया था आज वह कितना बड़ा कारवां बन चुका है, यह मुझे आप सबको बताने की जरूरत नहीं है। आज भारत में ‘हमदर्द’ को इस मुकाम तक पहुंचाने में हकीम अब्दुल मजीद साहब के बेटे हकीम अब्दुल हमीद साहब की मेहनत और उनकी दूरंदेशी का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे बताया गया है कि आज अब्दुल हमीद साहब का जन्मदिवस भी मनाया जा रहा है। इसलिए आज के इस मौके की खुशी दो गुनी हो जाती है।

आज हमदर्द एक ऐसा नाम है जो सरहद के इस तरफ हिंदुस्तान में तो मशहूर है ही साथ ही उस पार पाकिस्तान में भी, हमदर्द एक जाना पहचाना नाम है। बंटवारे से पहले ही भारत में ‘हमदर्द’ की एक पहचान बन चुकी थी।

भारत में पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों में यूनानी चिकित्सा पद्धति को पहचान दिलाने में जहां हकीम अजमल खान साहब का बहुत बड़ा योगदान है वहीं हकीम अब्दुल मजीद साहब और हकीम अब्दुल हमीद साहब के योगदान को भी नही भुलाया जा सकता।

‘हमदर्द’ का मतलब है हमारे दर्द को साझा करने वाला। जो किसी रोग या तकलीफ से परेशान है, उनकी तकलीफ को कम करना, या खत्म करना ‘हमदर्द’ की पहचान रहा है। मैं मानता हूं कि यूनानी चिकित्सा पद्धति को आज पूरे साउथ एशिया में जो मकाम हासिल है उसमें ‘हमदर्द’ का बड़ा योगदान है।

भारत की सभी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों की तरह यूनानी चिकित्सा पद्धति भी सैकड़ों साल पुरानी है। यूं तो भारत की धरती में इस पद्धति का जन्म नही हुआ है मगर आयुर्वेद की तरह इस यूनानी पद्धति में भी इसी बात पर जोर दिया गया है कि Prevention is better than cure’। हमारे देश में ‘स्वास्थ्य’ और ‘आरोग्य’ पर पुराने जमाने से ही जोर दिया गया है। हमारे ऋषियों द्वारा भी कहा गया है कि, ‘आरोग्यम् धनसंपदा’ यानी आरोग्य ही सबसे बड़ी संपत्ति है। यानि आरोग्य को इंसान का परम भाग्य माना गया है।

आज भी आप अपने घर परिवार में कहीं न कहीं सुन ही लेते होंगे कि, ‘पहला सुख निरोगी काया’, यानि आपकी सेहत ही पहला सुख है।

भारत का नजरिया हमेशा से global एवं all-inclusive रहा है। हमने कहा ‘सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामया’। यानि हमारे मंत्रों में सभी लोगों के सुखमय जीवन की जो कामना की गई है, उसमें भी ‘निरामय’ अथवा ‘निरोग’ को पहली आवश्यकता बताया गया है।

हमारा देश चिकित्सा और उपचार पद्धतियों के संदर्भ में एक समृद्ध देश रहा है। आयुष की प्रत्येक प्रणाली आयुर्वेद, योग, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी, अपने integrated रूप में उसी holistic approach के अनुसार काम करती है।

हम देख सकते हैं कि इंसानी सेहत की देखभाल के लिए इन पद्धतियों में अनेक elements common है। अगर आप भारतीय और यूनानी परंपरा को ही देखें तो आयुर्वेदिक परंपरा में मानव शरीर पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश आदि पंचतत्वों से निर्मित माने जाते हैं। यूनानी में भी आकाश को छोड़कर बाकी सभी तत्व शरीर की निर्मिति के जिम्मेदार तत्व माने जाते हैं। इसी तरह भारतीय परंपरा में प्रचलित वात, पित्त और कफ भी यूनानी के दम (Blood), बलगम (Phelgm), सफरा (Yellow Bile) और सौदा (Black Bile) की बात के बहुत करीब है।

यानि आयुर्वेद जिस तरह का अप्रोच सेहत और इलाज को लेकर रखता है वैसा ही अप्रोच यूनानी पद्धति का भी है। ये दोनों पद्धतियां इंसान को प्रकृति के न केवल करीब लाती है बल्कि उसे प्रकृति से जोड़ती भी है।

जबकि पश्चिमी जगत से आई मेडिकल साइंस, जो एलोपैथी कही जाती है, वह एक अलग तरह का अप्रोच रखती है, जो Intervention based होने के साथ-साथ Invasive भी है।

मगर आज एलोपैथी पूरी दुनिया में काफी लोकप्रिय और कारगर भी है। इसकी बड़ी वजह है एलोपैथी में हुआ बड़े पैमाने Research & Development, जिसने एलोपैथी को बाकी सभी पद्धतियों से आगे खड़ा कर दिया।

मगर अब तस्वीर बदल रही है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सेहत के लिए Traditional Treatment & Methods’ की लोकप्रियता बढ़ रही है। योग और आयुर्वेद ने धीरे-धीरे अपना एक अहम स्थान बना लिया है। लोगों में जागरूकता भी बढ़ रही है।

खासतौर पर जब से हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली है, भारत की पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों को आगे बढ़ाने के लिए Sustained efforts किए जा रहे हैं।

हमारी सरकार ने 2014 में ही, स्वास्थ्य मंत्रालय से अलग एक आयुष मंत्रालय का गठन किया है। इस AYUSH का अर्थ है आयुर्वेद, योगा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी। यह सारी पद्धतियां एलौपेथी की Alternate मानी जाती है।

योग को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाने में हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी की भी भूमिका रही है। United Nations में एक प्रस्ताव पारित होने के बाद आज करीब 190 देशों में हर 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ मनाया जा रहा है।

आयुष मंत्रालय द्वारा देश में सभी पद्धतियों के विकास के लिए एक National Ayush Mission’ की शुरूआत की गई है, जिसके अन्तर्गत देश के कई इलाकों में ‘आयुष ग्राम’ की स्थापना पर बल दिया जा रहा है।

मित्रों, पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में, बदलते वक्त के साथ नई पद्धतियों और health management की नई तकनीकों को साथ जोडऩे की जरूरत है। आपको यह जानकर खुशी होगी कि आयुष मंत्रालय ने हमारी Traditional system of medicine के विकास के लिए एक Integrated Approach लिया है।

Ayush system’ की अलग-अलग पद्धतियों के साथ मिलकर, यूनानी चिकित्सा पद्धति, Non communicable diseases का समाधान खोजने में एक महत्वपूर्ण play कर सकती है। आज के lifestyle के कारण, health care delivery system में यूनानी चिकित्सा का एक अहम पद्धति के रूप में उभरना इस बात का प्रमाण है।

यूनानी चिकित्सा पद्धति, अपने आप में unique है। स्वस्थ जीवन के लिए द्गड्डह्य4 easy availability, effectiveness एवं affordability यूनानी चिकित्सा पद्धति की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं। इस प्रणाली में उपयोग की जाने वाली दवाएं ज्यादातर जड़ी बूटी और मिनरल्स से प्राप्त की जाती हैं, इसलिए वे comparatively natural एवं सुरक्षित हैं। ये दवाएं प्रकृति की तरफ लौटने अथवा chemical व artificial दवाओं से natural productsकी तरफ बढऩे की प्रेरणा देती हैं। यह प्रणाली विभिन्न आम और पुरानी बीमारियों के लिए time-tested remedies प्रस्तुत करती है। Non communicable diseases सहित विभिन्न स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान खोजने में अन्य Ayush Systems के साथ यूनानी चिकित्सा एक महत्वपूपर्ण भूमिका निभा सकती है।

आज जिस गति से antibiotics का usage बढ़ा है, और कई बार बिना जरूरत के भी antibiotics दे दी जाती हैं, उससे antibiotics resistance के instances भी बहुत बढ़ते जा रहे हैं। इस हालत में भी Ayush system of medicine और खासकर nani system काफी उपयोगी साबित हो सकता है।

एक खास बात जो यूनानी system में मुझे पता चली कि शरीर की immunity को बढ़ाने वाली दवाएं भी होती हैं। इनका उचित प्रयोग करके तरह तरह के रोगों से बचना आज के समय की जरूरत है। यूनानी पद्धति हमें बिना किसी विशेष प्रयास के, केवल अपने खान-पान में balancing करके अपने शरीर को स्वस्थ रखने का उपाय बताती है। साथ ही यूनानी पद्धति symptomatic treatment की जगह किसी भी रोग के complete treatment की तरफ ध्यान देती है।

‘मेनस्ट्रीम हेल्थकेयर’ में यूनानी पद्धति से जुड़े तौर तरीकों को अन्य तरीकों से आजमाया जा रहा है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण ‘सोना बाथ’ है। आज ‘सोना बाथ’ के द्वारा शरीर के toxics को बाहर निकाल देना काफी लोकप्रिय होता जा रहा है, जो यूनानी चिकित्सा का एक प्रमुख अंग है।

आज हमें यह भी देखने की जरूरत है कि किस तरीके से हम nani system को और बेहतर एवं पॉपुलर बनाएं। मेरे ध्यान में कुछ आसान कदम आते हैं, जैसे दवाइयों का standardisation कर देने से patients में Unani  दवाइयों के प्रति और अधिक भरोसा बढ़ेगा। इस system को बाकी Ayush system के साथ देश-विदेश, दोनों जगह popularize किया जाए ताकि लोगों के बीच से demand आए। डॉक्टर्स की ट्रेनिंग एवं कोर्स को modern technology के साथ integrate करके और relevant बनाया जाए। साथ ही सबसे ज्यादा जरूरत है, कि इस system of medicine में रिसर्च का काम और तेज किया। मेरा मानना है, कि लगातार research और improvement का कार्य चलते रहना चाहिए, क्योंकि बदलते समय के साथ ही अब नए-नए रोगों का आगमन हो रहा है, जिनका सामना करने के लिए हम सब को तैयार रहना होगा। इस काम में आपका हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च एक ‘लीड रोल’ ले सकता है।

साथियों, कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को यह बता दिया है कि बीमारी के इलाज के साथ-साथ इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि शरीर की Immunity यानि प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाया जाना चाहिए।

रोगों से लडऩे की इंसान की ताकत तभी बढ़ेगी जब सेहत को लेकर समाज में जागरूकता बढऩे के साथ-साथ एक Holistic और Wholesome Approach रखा जाए। इस तरह का अप्रोच भारत में Alternative Medicine के पास है। इसके विकास के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है। मुझे पूरा भरोसा है कि हमदर्द परिवार इस काम को एक नई बुलंदी देने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा। आज के मौके पर इससे अधिक कुछ न कहते हुए और पूरे हमदर्द परिवार को फिर से ‘फाउंडेशन डे’ की मुबारकबाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं। आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद।

 

 

राजनाथ सिंह

(यह लेख रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा हमदर्द के स्थापना दिवस पर दिए गए भाषण के संपादित अंशों पर आधारित हैं।)

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