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राम दूत अतुलित बल धामा

राम दूत अतुलित बल धामा

पवन पुत्र हनुमान पृथ्वी, अंतरिक्ष, आकाश, गहन समुद्रों और दुर्गम पर्वतों को पार करने वाले अदम्य पराक्रमी साहसी योद्धा, अद्वितीय सेनापति, आदर्श मंत्री, गुणों के भंडार, विद्वान, कुशल नीतिवेत्ता, अनन्य राम भक्त, अपने सम्राट सुग्रीव तथा हृदय सम्राट राम के प्रति अगाध श्रद्धावान-निष्ठावान तथा संकट मोचन हैं। उनके व्यक्तित्व का एक अन्य गौरवशाली पक्ष दूत का भी है जिस के वशीभूत होकर घट-घट में बसने वाले राम उन्हें लक्ष्मण और भरत सम भाई मानकर अंगीकार करते हैं। वाल्मीकि एवं तुलसी रामायण एवं हनुमान चालीसा में इससे संबंधित तीन प्रसंग आते हैं।

बाली से भयभीत और दुखी हुए सुग्रीव ऋष्यमूलक पर्वत पर बैठे हुए हैं। वह चिंता में हैं। सुग्रीव की परेशानी और भी बढ़ जाती है जब वह धनुर्धारी राम और लक्ष्मण को वन में अपनी ओर आते हुए देखते हैं, आशंकित हो उठते हैं कि कहीं इन धनुर-धारियों को बाली ने उनका वध करने के लिए तो नहीं भेजा है। इस भय से बाहर निकलने का उन्हें कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था। हनुमान उस समय उनके पास बैठे हुए थे। उन्होंने नाना प्रकार से शिरोमणि वानर सुग्रीव को समझाने का प्रयत्न किया कि भय का कोई कारण नहीं है। बताया कि यह पर्वत पूरी तरह से सुरक्षित है क्योंकि इस पुण्य भूमि में कोई पापी प्रवेश तक नहीं कर सकता। मगर सुग्रीव का मन नहीं ठहरा और भयभीत होकर हनुमान जी से अनुरोध किया-

धरिबटु रूप देखुतैं  जाई।

कहेसुजानिजियंसयन बुझाई।

अर्थात-‘हे हनुमान आप ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखें और उनका यथार्थ जानकर मुझे इशारे से समझा देना’।

‘उनकी चेष्टाओ, रूप, वार्तालाप से उनके मनोभावों को समझने का प्रयास करें कि कहीं उनके मन में हमारे प्रति कोई द्वेष तो नहीं है और उनके वन आगमन का वास्तविक कारण क्या है? यदि वह तुम्हारे वार्तालाप से संतुष्ट प्रतीत हो तो उन्हें मेरा परिचय देना और प्रयत्न  करना कि उन्हें मुझ पर विश्वास बैठ जाए’।

अपने स्वामी का आदेश पाकर महावीर हनुमान गंतव्य स्थान पर पहुंचने से पहले वानर रूप का त्याग कर विप्र रूप  धारण करते हैं और विधिवत विनम्रता और मधुरता से राम और लक्ष्मण का अभिवादन करने के पश्चात कहते हैं कि हे वीरों आप तो राजऋषियों एवं देवताओं के समान प्रभावशाली दिखते हैं। आप मनुष्यों में श्रेष्ठ, पराक्रम में सिंह के समान बलवान, कांतिमान, रूपवान धनुर्धारी हैं फिर यहां वनवासी वेश में विचरण करने का प्रयोजन क्या है? इसके पश्चात हनुमान जी ने अपनी वाणी को विश्राम देकर यह जानने का प्रयत्न किया कि इस संक्षिप्त सारगर्भित वार्तालाप का आगंतुकों पर क्या प्रभाव हुआ है। श्रीराम लक्ष्मण की भाव-भंगिमा से जब अंजनी पुत्र को यह आभास हो गया कि उनके कथन का अभीष्ट प्रभाव हुआ है तो उन्होंने तुरंत अपना परिचय देते हुए कहा कि इस पर्वत पर महात्मा सुग्रीव रहते हैं जो वानर शिरोमणि है। मैं भी एक तुच्छ वानर ही हूं। सुग्रीव बडे धर्मात्मा और वीर हैं। वह आप से मित्रता करना चाहते हैं। राम हनुमान के वार्तालाप से अत्यंत प्रभावित हुए और लक्ष्मण के हनुमान। श्रीराम हनुमान जी के वार्तालाप से अत्यंत प्रभावित हुए और लक्ष्मण जी को हनुमान जी की वार्तालाप कला और संचार कौशल का बखान करते हुए कहते हैं कि हनुमान चारों वेदों के ज्ञाता,  व्याकरण के अध्येता हैं। उन की वाणी शुद्ध और सत्य प्रतीत होती है और हृदय से प्रस्फुटित हुई लगती है। यह भी कहते हैं-

एवं गुणगणैर्युक्तायस्यस्यु:कार्यसाधका:।

तस्यसिध्यन्तिसर्वाऽर्था दूतवाक्यप्रचोदिता:।।

अर्थात-जिस राजा के दूत ऐसे गुणों से संपन्न हो, उस राजा के सभी कार्य दूत के वार्ता कौशल से ही सिद्ध हो जाते हैं।

सुग्रीव  के दूत को लक्ष्मण ने अपने वन आगमन का प्रयोजन बताया। हनुमान जी ने तुरंत सुग्रीव और अपनी ओर से पूर्ण विश्वास दिलाया कि वह सीता माता का पता लगाने में  जी जान लगा देंगे। तदुपरांत दोनों भाई हनुमान जी के कंधों पर सवार होकर सुग्रीव के पास पहुंच जाते हैं।

इस प्रकार दूत ने केवल सुग्रीव के मंतव्य को ही सिद्ध नहीं किया वरन इससे आगे बढ़कर सुग्रीव की धनुर्धारी वीरों से मित्रता करवा दी जिसके फलस्वरूप सुग्रीव सम्राट हो गए। तुलसी दास  जी में  हनुमान चालीसा में, हनुमान  जी के दूत रूप का गुणगान करते हुए कहा है  –

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा

राम मिलाइ राजपद दीन्हा।

श्रीराम और लक्ष्मण उसी पर्वत की एक गुफा में वास करने लगे। वर्षा ऋतु का आगमन हुआ तो विरही राम ‘घन घमंड नभ गरजतघोरा’ ‘दामिनी दमक रही घन माही’  दादुर धुनिचहुं दिसा सुहाई’ देखते हुए यही कहते हैं- ‘प्रिया हीन डरपत मन मोरा’ । वर्षा तो जैसे तैसे बीत गई और निर्मल रितु आई और श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं ‘सुधि न सीता कै पाई’। राम जी कहते हैं-

सुग्रीवहु  सुधिमोरी बिसारी

पावा राजकोस पुर नारी।

परंतु सुग्रीव को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि –

जेहिंसायक मारा मैं बाली

तेहिंसर हतौमूढ कह काली।

प्रभु को क्रोध वान देखकर जब लक्ष्मणने तुरंत धनुष पर बाण चढ़ाया तो श्रीराम ने उन्हें समझाते हुए कहा कि ‘भय देखाई आवहु तात सखा सुग्रीव। क्रोध वान लक्ष्मण फुफकारते  हुए सुग्रीव के दरवाजे पर पहुंचते हैं और कहते हैं-‘जारिकरउ पुरछार’। इस हुंकार को सुनकर सभी भयभीत हो जाते हैं। अंगद और सभी वानर लक्ष्मण के क्रोध को शांत करने का प्रयास करते हैं। इस समय महावीर हनुमान जी सुग्रीव के शयनकक्ष में ही थे। उन्होंने लक्ष्मण के आने से पूर्व ही सुग्रीव को कर्तव्य के प्रति चेताया भी था। लक्ष्मण की ललकार को सुनकर सुग्रीव भयभीत हो उठा। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। उसने एक बार फिर भय से आकुल होकर कहा – ‘सुनो हनुमंत करि बिनती समझाऊ कुमारा।’

लक्ष्मण की क्रोधाग्नि को शांत करने और अपनी भूल के पश्चाताप के लिए सुग्रीव ने एक बार फिर हनुमान जी को दूत बना कर भेज दिया।

हनुमान जी ने लक्ष्मण जी को विनम्रता से विनती की और उन्हें सुग्रीव के महल में ले आने में सफल हुए। उनके चरण पखारे और पलंग पर बिठाया। इस पश्चात सुग्रीव ने उनके चरणों में शीश नवाया और लक्ष्मण जी ने हाथ पकड़ कर उन्हें गले से लगा लिया। सुग्रीव ने क्षमा याचना की और  वह सभी वहां पहुंच गए जहां श्रीराम जी विराजमान थे।

हनुमान जी ने मंत्री और दूत की भूमिका इस सूझबूझ से निभाई कि श्रीराम ने सुग्रीव की केवल क्षमा याचना को ही स्वीकार नहीं किया अपितु सुग्रीव को भरत समान प्रिय भाई का दर्जा भी दिया और कहा-

अब सोइजतनुकरहुमनि लाई

जेहिबिधि सीता कैसुधि पाई।

सुग्रीव ने तुरंत अपने समस्त वानरों को उचित आदेश देकर चारों दिशाओं में सीता माता की खोज करने भेज दिया। उन्होंने हनुमान जी के अनेकानेक गुणों का बखान करते हुए कार्य सिद्धि हेतु जाने की प्रार्थना की। राम जी का मन अत्यंत हर्षित हो गया क्योंकि उन्हें हनुमान जी के सामर्थ्य पर भरोसा था। उन्होंने तुरंत पवन पुत्र को अपने हाथों से मुद्रिका निकाल कर देते हुए कहा –

‘बहु प्रकारसीतहिसमझाएहु, कहिबल बिरह बेगितुम्हआएहु।’

हनुमान जी उन सभी का आशीर्वाद लेने के पश्चात अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु चल पड़े।  रास्ते की विविध बाधाओं, व्यवधानो, आपदाओं और विपदाओं का सामना करते हुए एक पल भी कहीं आराम करने के लिए नहीं रुके।

‘राम काज किन्हें बिनुमोहि कहां विश्राम’।

इधर-उधर भटकते, आशा निराशा में डूबते-इतराते कई योजन लंबे सागर को पार कर आखिर वह लंका में पहुंच जाते हैं। सीता की खोज में वह रावण के शयन कक्ष तक पहुंच तो गए पर सीता माता का कहीं पता नहीं चला। वह महल-महल खोजते रहे। इस बीच उन्होंने एक मंदिर देखा जिस के मुख्य द्वार पर श्रीराम के धनुष बाण अंकित थे। वह हर्षित हुए और आश्चर्यचकित भी क्योंकि यह मंदिर रावण के प्रसाद के निकट ही बना हुआ था।  उन्हें विश्वास हो गया कि इसमें अवश्य ही किसी सज्जन का वास है। उसी समय विभीषण जाग उठे और ‘राम-राम तेहि सुमिरन कीन्हा’ और वार्तालाप में दोनों राम महिमा का बखान करते रहे। हनुमान जी ने उन्हें राम नाम का मंत्र दिया जिसे अंगीकार कर विभीषण लंकेश्वर हो गए-

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना,

लंकेश्वर भए सब जग जाना।

विभीषण ने उन्हें बताया कि माता सीता अशोक वाटिका में हैं। हनुमान जी तुरंत वहां पहुंचे और अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण करके पेड़ पर छुप गए। उन्होंने माता सीता को राम के विरह में डूबे हुए पाया। निराशावश अपने प्राणों का अंत तक करने के लिए वह भगवान से प्रार्थना कर रही थीं। उसी क्षण हनुमान जी ने राम द्वारा दी गई मुद्रिका सीता के समीप  फेंकी जिसे देखकर सीता जी की आंखें चमक उठीं। उनके मन में आशा की किरण जागी। मगर जल्द ही तर्क-वितर्क में पड़ गई और इसे भी रावण की कोई नई चाल समझकर निराशा में डूब गयीं। तभी  हनुमान जी ने वानर रूप में प्रकट होकर उन्हें अपना पूर्ण परिचय दिया और सीता जी को राम, लक्ष्मण तथा समस्त परिवार के सकुशल होने का शुभ समाचार सुनाया। माता सीता को यह भी बताया कि प्रभु राम उनके प्रेम और विरह में कितने व्याकुल रहते हैं और उनका कुशल क्षेम जानने के लिए कितने आतुर हैं। उन्होंने माता को वानरों के बल के प्रति आश्वस्त करने के लिए अपना विराट रूप दिखाया और विश्वास दिलाया कि अब शीघ्र ही रावण का अंत होगा और श्रीराम जी से उनका मिलन होगा।

महावीर ने लंका छोडऩे से पूर्व सोचा कि माता सीता के ठिकाने का पता चल गया, उन की कुशल क्षेम जान ली  और उन्हें शीघ्र रावण से मुक्त करवाने का विश्वास भी दिला दिया, उनके प्रति राम के प्रेम और विरह में व्याकुलता से भी अवगत करा दिया। यह सभी कार्य तो प्रभु आज्ञा अनुसार पूर्ण हुए। मगर लंका में प्रभु बल का भान करवाना अभी शेष है। यह सोचकर हनुवंतने माता जानकी से अशोक वाटिका के कुछ फलों को खाने की आज्ञा प्राप्त करके उसे पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया। अनेक प्रहरियों, सेनापतियों,  योद्धाओं और रावण के पुत्र-पौत्रों को मौत के घाट उतार दिया। आखिर, रावण ने वानर को वश में करने के लिए अपने शूरवीर पुत्र मेघनाद को भेजा। उसके साथ हनुमान जी का युद्ध होता रहा। वानर को अपराजेय जान मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जिस का  सम्मान करते हुए हनुमान जी बंध गए। मेघनाद तथा उसके सहायक महावीर को रावण के दरबार में ले आए। रावण बड़े क्रोध में था। कडक कर पूछा तो हनुमान जी ने निर्भय भाव से कहा-

खर दूषनत्रिसराअरू बाली

बधे सकल अतुलित बल साली

तासु दूत मैं जाकरि हरि

आने हूं प्रिय नारि।

‘अहं तुहनुमान्नाममारुतस्योरस:सुत:’

तुलसीदास जी ने बाल्मीकि के इसी भाव को हनुमान चालीसा में उतारा है-

राम दूत अतुलित बल धामा

अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।

बहुत वाद-विवाद के बाद रावण ने खीझ कर मारुति के लिए मृत्युदंड की घोषणा कर दी। मगर सभासदों और विभीषण के समझाने पर कि दूत को मृत्यु दंड देना न्याय संगत नहीं, यह निर्णय लिया गया कि वानर को अपनी पूंछ सबसे प्रिय होती है, उसमें आग लगाकर उसे गली- चौराहों पर घुमाया जाए।

ऐसा ही किया गया और आखिरकार हनुमान जी उड़ लिए और विशाल रूप धारण करके लंका के समूह प्रसादों और मकानों में आग लगा दी। लंका वासी त्राहि-त्राहि कर उठे।

जरइ नगर भा लोग बिहाला

झपट लपट बहु कोटि कराला

लंका को जलाने के उपरांत हनुमान जी सागर में पूंछ को बुझाने के लिए कूद गए और पुन: सीता जी से चूड़ामणि प्राप्त कर श्रीराम जी के पास पहुंचने के लिए वायु वेग से नभ में उडऩे लगे। लक्ष्मण, सुग्रीव और सभी सभासदों के साथ श्रीराम बैठे हुए थे। वहां पहुंचकर हनुमान जी ने सभी का यथायोग्य अभिवादन करने के पश्चात सीता द्वारा दी गई चूड़ामणि राम को भेंट की। तत्पश्चात उन्होंने लंका का सारा विवरण दिया कि कैसे उनके समस्त कार्यों को संपूर्ण कर दिया है और लंका में राम के बल का डंका बजा दिया है।

श्रीराम जी गदगद हो गए और उन्होंने हनुमान जी को अपने गले लगाते हुए कहा-

सुनु कपि तोहि समान उपकारी।

नहिंकोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

प्रति उपकार करौं का तोरा।

सनमुख होइन सकत मन मोरा।।

 

 

डॉ. प्रतिभा गोयल

(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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