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धसकती कांग्रेस

धसकती कांग्रेस

कांग्रेस का ‘प्रथम परिवार’ सबसे पुरानी पार्टी को पतन की ओर ले जा रहा है, जो न केवल अपने कार्यकर्ताओं से बल्कि नागरिकों से भी दूर जा रही है। गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं, जिन्होंने कहा कि कांग्रेस में संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। इसके अलावा पार्टी में पांच सितारा संस्कृति का भी प्रवेश हो चुका हैं, जिससे पार्टी लगातार आमजन से दूर होती जा रही हैं। ऐसा माना जा रहा हैं कि यह बयान कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ दिया गया है। यहां यह बताना आवश्यक हैं कि 2019 लोकसभा चुनाव में हार मिलने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और भविष्य में भी कमान संभालने से इंकार कर दिया था। तब से पार्टी की कमान सोनिया गांधी के ही हाथों में हैं। यहां यह बताना आवश्यक हैं कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अपने पूरे इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रही हैं। जो पार्टी अब तक यह कहती रही हैं की इसने ही भारत को विदेशी गुलामी से आजादी दिलायी, वह स्वयं दशकों से एक ही  परिवार की गुलाम बनी हुई हैं। यही कारण है कि यह न तो देश से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर किसी सकारात्मक बहस में हिस्सा लेती है, न ही कोई तार्किक सुझाव देती है, बल्कि विरोध में सड़कों पर उतरती है, जैसा कि लखीमपुर खीरी में देखने को मिल रहा है। ऐसा लगता हैं कि वर्तमान कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्षा भारत के प्रति संवेदनशील नहीं हैं और महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह व्यवहार कर रही है, और पुत्रमोह में अंधा होकर अपने अयोग्य पुत्र को देश की कमान दिलाने के लिए भरपूर प्रयास कर रही हैं। इसलिए यह कह सकते है कि आज की कांग्रेस केवल माता-पुत्र की कांग्रेस बनकर रह गयी हैं। और यही इसके पतन का कारण भी हैं। इतना ही नहीं, पंजाब और छत्तीसगढ़ में नेतृत्व परिवर्तन और पारदर्शी सांगठनिक  चुनाव के लिए अंतर्कलह है, जो कि  निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए गंभीर चिंता का कारण है।

राजनीति में हाई कमान का योगदान अब एक चर्चा का विषय हैं, और कांग्रेस के संदर्भ में यह बिल्कुल ही लोकतन्त्र के विरूद्ध हैं, क्योंकि इसका उद्देश्य लोगों की इच्छा के अनुरूप कार्य करना होना चाहिए। कांग्रेस के अंदर कभी भी आंतरिक लोकतन्त्र नहीं रहा हैं। आजादी के पूर्व भी कांग्रेस में नेहरु और गांधी जैसे कुछ लोगों की ही चलती थीं और इसलिए सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों को अलग-थलग कर दिया गया। यह ऐसा ही हैं कि केवल राजा और रानी को ही शासन करने का अधिकार हैं। और ऐसा ही कांग्रेस मे हो रहा हैं। शायद इसी संस्कृति ने भारतीय राजनीति को नुकसान पहुंचाया है। लोग 2014 के चुनाव में कांग्रेस से इतने चिढ़ चुके थे कि वे किसी को भी इसके स्थान पर चुनने के लिए व्याकुल थे। और तब से चीजें नहीं बदली हैं। कांग्रेस के भीतर का राजनीतिक असंतोष अब और भी अधिक मुखर हो चुका है। और इन सब के लिए नेहरु-गांधी परिवार ही जिम्मेदार हैं। आज वंशवाद के कारण कांग्रेस अब अपने सबसे निचले स्तर पर आ चुकी हैं। आज पार्टी अपने पैरों पर एक बार फिर खड़ा होने में असमर्थ दिखती हैं। अब तो यह बिल्कुल ही साफ हो चुका हैं की जिस परिवार को इस पार्टी को सम्भालने की जिम्मेदारी मिली थीं, वह अब उसकी सुरक्षा में विफल हों चूका है। यदि कांग्रेस को एक बार फिर खड़ा होना हैं तो इसे दो कार्य करने होंगे। पहला, नेहरू-गाधी परिवार से इसे छुटकारा पाना होगा और दूसरा सामथ्र्यवान नेताओं को मौका देना होगा, जो पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर कार्य कर सकें।

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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