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अजीब दास्तान है ये!

अजीब दास्तान है ये!

सन 1965 में एक फिल्म आयी थी, नाम था ‘छोटी छोटी बातें।’ उसे फिल्म की हेरोइन नादिरा पर फिल्माया गया एक गीत था, जिसके बोल थे ‘कुछ और जमाना कहता है, कुछ और है जिद्द मेरे दिल की। मैं बात जमाने की मानूं, या बात सुनूं अपने दिल की।’ इस गाने के यह बोल भारत की  ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस पर एकदम फिट बैठती है। कांग्रेस पार्टी में इन दिनों बड़े बदलाव हो रहे हैं। पंजाब से लेकर दिल्ली तक बहुत सी चीजें बदलीं हैं। बीते दिनों जहां पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस्तीफा दे दिया और वहां एक दलित चेहरा चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया, तो वहीं बीते 28 सितम्बर को दिल्ली में गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और मूलत: बिहार के रहने वाले कम्युनिस्ट नेता कन्हैया कुमार को कांग्रेस में शामिल किया गया।  कन्हैया कुमार 2016 में जेएनयू में लगे देश विरोधी नारों के बाद लाइमलाइट में आए थे। उसके बाद उन्होंने हर मोर्चे पर मौजूदा केंद्र सरकार का विरोध किया और शायद इसी विरोध के चलते ही उन्हें कांग्रेस पार्टी में जगह भी मिली।

वक्त बदल चुका है, सियासत बदल चुकी है, लेकिन इस बदलते दौर में इस दल की सोच उसकी रणनीति ठहरी नजर आती है।  कांग्रेस की सियासत आज भी गांधी परिवार और उनके तथाकथित सेक्युलरवाद के ईर्द- गिर्द सिमटी है। देश के विभिन्न कोनों से पार्टी के भीतर लगातार उभरता असंतोष भी कांग्रेस को अपनी सोच या राजनीती का तरीका बदलने को तैयार नहीं कर पा रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व का संकट लगातार विवादों का कारण बना हुआ है, ऐसे में नेताओं और कार्यकर्ताओं के लगातार गिरते मनोबल के बीच पार्टी मोदी जैसे महामानव से टक्कर लेने में कैसे सफल होगी यह कोई नहीं बता सकता है।

गांधी नाम केवलम

2014 के लोकसभा चुनाव में सदन की कुल सदस्य संख्या का एक दशांक भी नहीं जीत पाने के कारण कांग्रेस को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से वंचित रह जाना पड़ा था। 2019 में भी कांग्रेस वही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना करने को विवश होना पड़ा। पार्टी की करारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन हुआ वही जिसकी पूरी सम्भावना थी। पार्टी ने एकमत से उनके इस्तीफे को अस्वीकार कर दिया और उन्हें संगठन में बड़े फेरबदल तक के लिए उन्हें अधिकृत कर दिया। दूसरी और यह भी कहा जा सकता है  कि उनका इस्तीफा यदि मंजूर कर लिया जाता तो इस डूबते जहाज की कप्तानी करने का साहस कौन दिखायेगा यह समझ से परे है। अब सवाल यहां यह भी उठ रहा है कि यदि राहुल गांधी के हाथों कांग्रेस की बागडौर आगे भी जारी रही तो पार्टी को क्या इससे बुरे दिन देखने पड़ेंगे। वैसे इस्तीफे देते समय राहुल के बयान की की बात करे तो उन्होंने कहा कि अब किसी गैर गांधी को अध्यक्ष बनाया जाए तो फिर सवाल उठता है कि गांधी परिवार के इतर यदि किसी को अध्यक्ष बना भी दिया जाए तो वह परिवार से बड़ा तो हो नहीं सकता। वह अध्यक्ष बनेगा भी तो गांधी परिवार के आशीर्वाद से ही।

एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि क्या किसी गैर गांधी अध्यक्ष का नेतृत्व आज की स्थिति में कांग्रेस के दिग्गज स्वीकार कर पाएंगे? कपिल सिब्बल क्या गुलाब नबी आजाद की बात सुनेंगे? दिग्विजय सिंह या कमलनाथ चीदंबरम को स्वीकार करेंगे?  ऐसे नेताओं की सूची लंबी है, जो एक दूसरे का नेतृत्व स्वीकार करने से परहेज करेंगे, लेकिन ये सारे दिग्गज गांधी परिवार आगे कुछ नहीं कहेंगे। इसलिए फिलहाल तो अब गांधी परिवार और कांग्रेस को एक दूसरे का  पूरक मानने में कांग्रेस सहित देश को हिचक नहीं होनी चाहिए।

दरअसल कांग्रेस का मनोबल इतना गिर चुका है कि उसे वापस लाने का सामर्थ्य अभी किसी नेता में दिखाई नहीं दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि का मुकाबला करने की क्षमता जब राहुल गांधी में ही  दिखाई नहीं दे रही है तो किसी और से क्या उम्मीद की जा सकती है। वैसे फिलहाल मोदी के  करिश्मे के आगे सभी दलों में भी शून्यता ही दिखाई दे रही है। विरोधी दलों के जिन अध्यक्षों को अपने  करिश्माई राजनेता होने की खुशफहमी है, वे भी केवल अपने राज्य तक ही सीमित है।

भले ही कांग्रेस ने विभिन्न आंदोलनों को हवा देकर अपनी छवि चमकाने की कोशिश की है, लेकिन कांग्रेस अपने मैले चरित्र को कैसे साफ कर पाएगी? क्योंकि कभी हिन्दुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा, तो कभी संविधान और न्यायपालिका के खिलाफ सियासी रणनीति, कभी सेना पर सवाल तो कभी हिन्दुस्तान से अदावत और पाकिस्तान से प्यार जैसी करतूत को अंजाम देकर कांग्रेसी नेताओं ने कई बार अपनी पार्टी की फजीहत कराई है। ऐसा नहीं है की कांग्रेस के छोटे-मोटे नेता ऐसी हरकतें करते दिखतें हैं, बल्कि उनके ना सिर्फ बड़े नेता, यहां तक की राहुल गांधी भी ऐसी भड़काऊ हरकतों से बाज नहीं आते। राहुल बाबा ने जहां आतंकी मसूद अजहर को ‘मसूद अजहर जी’ कहा था, तो उनके चहेते नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने पाकिस्तान के पीएम इमरान खान को ‘फरिश्ता’ बता दिया था।  दिग्विजय सिंह ने तो आतंकी हाफिज को ‘हाफिज साहब’ तक कह दिया था। कांग्रेस नेता बी के हरिप्रसाद ने ये आरोप लगाया था कि ‘पुलवामा हमला मोदी और पाकिस्तान के बीच ‘मैच फिक्सिंग’ है।’ वहीं मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि भारत-पाक के बीच बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब मोदी ‘पीएम पद से हटेंगे।’ इतना ही नहीं पूरी दुनिया को पता है कि मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ था, लेकिन कांग्रेस के नेताओं को पाकिस्तान का गुनाह नजर नहीं आता। तभी तो आतंकी संगठन के खुद यह मानने के बावजूद कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का गहरा कनेक्शन है, दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘मुंबई हमले में आरएसएस का हाथ है।’ इन बयानों से कांग्रेस का असल चरित्र तो उजागर होता ही है, साथ ही इन्ही बयानों ने इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी को ना सिर्फ सत्ता से बल्कि देश की जनता से भी दूर कर दिया।

कांग्रेस के नए खेवैया-मेवाणी और कन्हैया

कांग्रेस पार्टी में पिछले दिनों हुई सियासी चहलकदमी के बाद दिल्ली में कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा तुर्क शामिल किये गए हैं। पार्टी खासकर राहुल गांधी इन युवा तुर्कों के सहारे कांग्रेस में जान फूंकने की कोशिश में लग गए हैं। युवा नेताओं को कांग्रेस में शामिल होने के लिए 28 सितंबर की तारीख का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इस दिन भगत सिंह की जयंती थी। पिछले दिनों कांग्रेस में हुए उलटफेर के बाद कई युवा नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुष्मिता देव, जितिन प्रसाद, प्रियंका चतुर्वेदी और ललितेशपति त्रिपाठी जैसे नाम शामिल हैं। पार्टी अब अपने डूबते जहाज के खिवैया के तौर पर कन्हैया और जिग्नेश को आगे करेगी। सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश का चुनावी मैदान, वह पहला पड़ाव होगा जहां दोनों युवा नेता पार्टी के लिए प्रचार करते हुए नजर आ सकते हैं।

गुजरात में जिग्नेश मेवाणी के जरिए कांग्रेस जातिगत समीकरणों को साधने के चक्कर में है। कांग्रेस की रणनीति ओबीसी और दलितों को लुभाने की है, राज्य में हार्दिक पटेल काफी हद तक पिछड़ों के नेता माने जाने लगे हैं, पिछले कुछ सालों में गुजरात में दलितों के सिरमौर मेवाणी बनते दिख रहे हैं।

इन सब के इतर कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी के कांग्रेस में शामिल करने के पीछे की वजह तलाशा जाए तो प्रशांत किशोर की गलबहियां राहुल के साथ है ही उसके अलावा राहुल गांधी की भी अपनी एक सोच इसके पीछे मानी जा सकती है। बीते जुलाई महीने में कांग्रेस पार्टी के सोशल मीडिया प्रोग्राम में राहुल गांधी ने साफ कह दिया था कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो मौजूदा सरकार से डर नहीं रहे हैं, बल्कि उससे लड़ रहे हैं।  लेकिन वह लोग कांग्रेस से बाहर है और उन्हें कांग्रेस में लाने की जरूरत है।  वहीं जो लोग कांग्रेस के अंदर हैं और सरकार से डर रहे हैं उन्हें कांग्रेस छोड़ देने की जरूरत है। राहुल गांधी ने इस बयान में जिन बाहर के लोगों का जिक्र किया उनमें जिग्नेश मेवाणी और कन्हैया कुमार जैसे युवा ही थे, जिन्हें राहुल गांधी अपनी नई टीम में शामिल करना चाहते थे और उन्होंने वैसा ही किया भी। लेकिन मौंजू सवाल यह है की क्या जिग्नेश मेवाणी और कन्हैया कुमार कांग्रेस पार्टी को वह धार दे पाएंगे कि वह आगामी विधानसभा चुनावों या फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर पाएंगे?

कन्हैया और मेवाणी के कांग्रेस में शामिल करवाने के मकसद को लेकर टीवी 9 के डिप्टी एडिटर संयम श्रीवास्तव लिखते हैं’ राहुल गांधी को मालूम है कि हिंदुस्तान में अगर कांग्रेस को फिर से खड़ा करना है तो पार्टी के उम्रदराज नेताओं की जगह उन युवा नेताओं को सामने लाना होगा, जिनमें लडऩे की क्षमता और जुनून दोनों है। कन्हैया कुमार को कांग्रेस में शामिल करने की सबसे बड़ी वजह है बिहार में कांग्रेस का कोई भी बड़ा और युवा चेहरा ना होना। बिहार में अगर कांग्रेस के शासन काल को देखें तो नब्बे के बाद से कांग्रेस बिहार की सत्ता से दूर है। हालांकि बीच-बीच में वह गठबंधन के सहारे जरूर सत्ता में रही। लेकिन कांग्रेस का मुख्यमंत्री कोई नहीं बन पाया। जेडीयू के पास नितीश कुमार का चेहरा था, आरजेडी की कमान अब तेजस्वी यादव ने संभाल ली थी। लेकिन कांग्रेस के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जो बिहार में कांग्रेस को एक नई ऊर्जा दिला सके। कन्हैया कुमार ने बहुत ही कम समय में देश की राजनीति में अपने आप को स्थापित किया है। इसलिए आने वाले समय में बिहार में कांग्रेस को मजबूती कन्हैया के नाम पर जरूर मिल सकती है।

वहीं अगर जिग्नेश मेवाणी की बात करें तो गुजरात में वह अब दलितों का चेहरा बन चुके हैं। पहले पत्रकार, वकील और एक्टिविस्ट रहने के बाद अब गुजरात के बडगाम से निर्दलीय विधायक हैं। उन्होंने गुजरात के कई दलित आंदोलनों का नेतृत्व किया है। राहुल गांधी को मालूम है कि अगर गुजरात में कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाना है तो हार्दिक पटेल के साथ साथ जिग्नेश मेवाणी जैसा दलित युवा चेहरा भी चाहिए होगा।’

साल 2015 में जेएनयू छात्र संघ चुनावों में एक बहस के दौरान कन्हैया ने बीजेपी और कांग्रेस को एक ही तराजू पर तौला था। सीपीआई छात्र विंग एआईएसएफ के उम्मीदवार कन्हैया ने मशहूर शेर बर्बाद गुलिस्तां करने को में थोड़ा बदलाव करते हुए कहा था कि बर्बाद हिंदुस्तान करने को एक ही कांग्रेस काफी थी हर राज्य में बीजेपी बैठा है, बर्बाद-ए-गुलिस्तां क्या होगा। अब ऐसे कन्हैया से कांग्रेस किस तरह का रास रचाना चाहती है यह तो भगवान ही जाने लेकिन कन्हैया के शामिल होते ही कांग्रेस के भीतरखाने ही एक नया कलह उभरता दिख रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा कि मैंने सुना है कि कुछ कम्युनिस्ट नेता कांग्रेस ज्वाइन कर रहे हैं। ऐसे में शायद 1973 में लिखी गई किताब ‘कम्युनिस्ट इन कांग्रेस’ को फिर से पढ़े जाने की जरूरत है।  मैंने भी आज इसे फिर से पढ़ा है। मनीष तिवारी जैसे कई नेता कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने से नाराज हैं। हालांकि सब खुलकर मनीष तिवारी की तरह बयान नहीं दे रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी और खासकर राहुल गांधी लगातार इस कोशिश में लगे हैं की वह इस देश की राजनीतिक व्यवस्था में प्रासंगिक बने रहें। लेकिन जिस तरह से पिछले सात सालों से कांग्रेस जनता से दूर होती जा रही है उससे तो यही लगता है वह दिन दूर नहीं जब भारतीय जनता पार्टी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत ‘सपने से हकीकत में बदल जाए। गांधी के नाव पर सवार कांग्रेस अब भी नहीं सम्भली तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में कांग्रेस का कोई नामलेवा भी नहीं बचेगा। विवादित और कांग्रेस सम्पोषित इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी कहते हैं’ एक समय ऐसा था जब गांधी परिवार की जरूरत कांग्रेस को थी लेकिन अब गांधी परिवार को कांग्रेस की जरूरत है। गांधी परिवार अपने आखिरी दौर से गुजर रहा है। इस परिवार ने भारतीय राजनीति में अपनी भूमिका अदा कर ली है।’

 

नीलाभ कृष्ण

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