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अस्तित्व के संकट से जूझती कांग्रेस

अस्तित्व के संकट से जूझती कांग्रेस

प्रथम राजनीतिक दल के रूप में उभरी कांग्रेस पार्टी का भारत में अपना ही इतिहास रहा है। भले ही इतिहास में कांग्रेस एक मजबूत पार्टी रही हो लेकिन वर्तमान में पारिवारिक मोह इसे गर्त में लेकर जा रहा है।

1885 में जब कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई तब इसके पीछे अंग्रेजो का तर्क था की इससे भारतीय ब्रिटिश सरकार के समक्ष अपनी बात रख पाएंगे अर्थात कांग्रेस लोगों की आवाज बनेगी। लेकिन यहां यह जानना जरुरी हैं कि ब्रिटिश सरकार के निर्देशों और ए ओ ह्यूम के प्रतिनिधित्व से उपजी कांग्रेस पार्टी के गठन की सहमति देने के पीछे वास्तविक तर्क कुछ और ही था। मसलन जब भारत में ब्रिटिश सरकार के प्रति भारतीय लोगों की असहमति चरम पर थी तब लोगों के इसी राष्ट्रीय उबाल को शांत करने के लिए अंग्रेजो ने कांग्रेस पार्टी की स्थापना की थी। शुरुवात में कांग्रेस की भूमिका ब्रिटिश सरकार और भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे नेतृत्वकर्ताओं के मध्य सिर्फ पत्र-व्यवहार तक सीमित थी जिसकी आलोचना करते हुए बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस के लिए कई बार कहा कि ‘यदि वर्ष में हम एक बार मेढ़क की तरह टर-टर्राए तो हमें कुछ नहीं मिलेगा’। बहरहाल कांग्रेस का इतिहास बताने के पीछे तर्क सिर्फ इतना ही है कि वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की हालत उस मेढ़क की तरह ही हो गई है जो वर्ष में सिर्फ एक बार ही टर-टर्राते हैं जिसका कारण है कि आज कांग्रेस पार्टी के लोग ही पार्टी में नेहरू परिवार की परिवारवादी गुटबंधी की आलोचना कर रहे है। फिर चाहें वह जी-23 हो या फिर पुराने कांग्रेस के नेताओं का पार्टी को छोड़कर जाना, कही न कही कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व के संकट का कारण बन गया है।

गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी लगातार भारत में लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाए रखने की बात करती है लेकिन स्वयं पार्टी मे लोकतान्त्रिक मूल्यों का स्पष्ट अभाव दिखता है। पार्टी के भीतर ये लोकतान्त्रिक गिरावट ही पार्टी को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है। उदाहरण पंजाब में पार्टी के भीतर की गुटबंधी के कारण चुनावों के दौरान पार्टी द्वारा पंजाब में विकास के किए गए तमाम वादों का पीछे छूटना है। पंजाब में लगातार बदलता घटनाक्रम और राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में आकार ले रहे राजनीतिक तूफान यही संकेत करते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के नियंत्रण में कांग्रेस की जड़ें कमजोर होने के साथ ही उसका प्रभाव भी घट रहा है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को फिलहाल आंतरिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में पार्टी का आलाकमान इन दिनों खासा सक्रिय है। इस आलाकमान में सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हैं। हाल में उन्होंने कांग्रेस के क्षत्रप अमरिंदर सिंह को ऐसी परिस्थितियों में अपमानित किया, जिसका पार्टी को राजनीतिक रूप से खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि पंजाब में अमरिंदर का अपना राजनीतिक वजूद है और मतदाताओं को लुभाने के लिए वह नेहरू-गांधी परिवार के मोहताज नहीं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में आलाकमान की ऐसी ही दखल राज्य में पार्टी की स्थिति को डांवाडोल कर सकती है। भविष्य में पंजाब में होने वाले राजनैतिक घाटे का कयास इस बात पर आधारित हो सकता है कि जब राजस्थान में नेहरू-गांधी परिवार सचिन पायलट की नेतृत्व क्षमता को भांपने में नाकाम रहा, और पूरा परिवार इस भ्रम में जीता रहा कि पायलट को जीतने के लिए कांग्रेस पार्टी के सहारे की जरूरत है। मसलन इस आधार पर यह सहज ही समझा जा सकता है कि भविष्य में कांग्रेस को पंजाब में अमरिंदर को खोने की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इसके अलावा जिस तरीके से 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में पारिवारिक राजनीति को लोगों ने नकारा, यह भी कारण है कि कांग्रेस आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक समय था जब रजनी कोठारी ने कहां था कि ‘संविधान ही कांग्रेस है और कॉग्रेस ही संविधान’। अपनी इसी लोकप्रियता के कारण कभी राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा कांग्रेस पार्टी को छाता धारी पार्टी भी कहा जाता था। क्योंकि ऐसा माना जाता था कि भारतीय राजनीति में उभरने वाली सभी छोटी-बड़ी पार्टियां कांग्रेस में आकर मिल जाती है। लेकिन वर्तमान तस्वीर कुछ और ही बयां करती है। जिस तरह से कांग्रेस पार्टी में राजनीतीक मूल्यों का क्षरण हो रहा है उसके पीछे कही न कही वह पुत्र मोह है जिसके चलते पार्टी में वरिष्ठ लोगों की अनदेखी हो रही है। इसके अलावा जिस तरह से आज कांग्रेस पार्टी संसद में सकारात्मक बहस को पीछे छोड़ सिर्फ और सिर्फ विवाद को बढ़ावा दे रही है इसके कारण भी आम लोगों का कांग्रेस से विश्वास समाप्त होता जा रहा है। वर्तमान में कांग्रेस की स्थिति यह हो गई है कि इसी पारिवारिक मोह के कारण कभी भारतीय राजनीति की सबसे विराट राजनीतिक पार्टी कहीं जाने वाली कांग्रेस पार्टी आज एक ही परिवार के तीन लोगों के मध्य सिमट कर रह गई है। ऐसे नेताओं की सूची बहुत लंबी है, जिन्होंने अपना राजनीतिक सफर तो कांग्रेस से शुरू किया, लेकिन बाद में अपने रास्ते अलग कर लिए। इनमें एचडी देवगौड़ा, रामकृष्ण हेगड़े, चंद्रबाबू नायडू, वीपी सिंह और ममता बनर्जी से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे तमाम नाम शामिल हैं। कांग्रेस से इन नेताओं के पलायन और चुनाव में उसके लगातार प्रदर्शन में सीधा संबंध दिखता है। नेहरू और इंदिरा गांधी के दौर में पार्टी लोकसभा चुनावों में 42 से 45 प्रतिशत वोटों के साथ करीब 65 प्रतिशत सीटें जीतती थी। 1957 के चुनाव में 47.8 प्रतिशत मतों के साथ उसने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया, जो रिकार्ड इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए चुनाव में 48.1 प्रतिशत मतों के साथ टूटा। ये सब इतिहास है। वर्ष 2000 से 2010 के बीच कांग्रेस का मत प्रतिशत 25 से 28 प्रतिशत के दायरे में झूलता रहा, जो पिछले लोकसभा चुनाव में 19.7 प्रतिशत पर आकर ठिठक गया।

कुल मिलाकर कांग्रेस वजूद के संकट से जूझ रही है। बरहाल नेहरू-गांधी परिवार के पास मतदाताओं को लुभाने और पार्टी का कायाकल्प करने के लिए कोई जादुई छड़ी शेष नहीं बची। मसलन जब तक अमरिंदर और पायलट जैसे जनाधार वाले नेताओं को शीर्ष पर लाकर सामूहिक नेतृत्व वाली परंपरा बहाल नहीं की जाती, तब तक कांग्रेस का भला नहीं होने वाला।

 

Deepak Kumar Rath


डॉ.
प्रीति

(लेखिका, अस्सिटेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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