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नैरेटिव की लड़ाई से कांग्रेस को आगे बढऩा होगा

नैरेटिव की लड़ाई से कांग्रेस को आगे बढऩा होगा

जब भी चुनाव आते हैं, देश की सबसे पुरानी पार्टी के शुभचिंतक उसके उभार की भविष्यवाणियां करने लगते हैं। लंबे समय तक की सत्ता के दम पर कांग्रेस ने बौद्धिक और पत्रकारीय दुनिया में एक ऐसा समर्थक वर्ग जरूर बना रखा है, जो कांग्रेस के पहले परिवार के हर कदम पर मर मिटता है। कांग्रेस के पहले परिवार के सदस्यों के हर कदम उस वर्ग को ‘भूतो न भविष्यति’ जैसे लगने लगते हैं। कांग्रेस के प्रथम परिवार के सदस्य जब ऐन चुनावों के पहले मंदिरों का दौरा करने लगते हैं तो उसे हिंदुत्व का असल नायक बताया जाने लगता है। लेकिन अगले चुनाव में परिवार का सदस्य जब अल्पसंख्यक-विशेषकर मुस्लिम वर्ग की हिमायत करने लगता है तो कांग्रेस के समर्थक बौद्धिक वर्ग की नजर में देश में स्थापित नेहरूवादी सेकुलर मॉडल की ना सिर्फ प्रतिष्ठा होने लगती है, बल्कि वह कदम उससे भी एक कदम आगे निकलता लगता है। कांग्रेस के प्रथम परिवार के सदस्य जब भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में किसी घटना या हादसे में पीडि़त परिवार को गले लगा लेता है तो उससे कांग्रेस के समर्थक वर्ग की दृष्टि विकसित होने लगती है। गले लगाने के फोटो देखकर उसके समर्थकों को पत्रकारिता का मशहूर वाक्य याद आने लगता है, ‘एक चित्र हजार शब्दों पर भारी पड़ता है।’

दरअसल आज कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह नैरेटिव की लड़ाई लड़ रही है। इस लड़ाई के पीछे कांग्रेस के प्रथम परिवार के सलाहकार मंडल में शामिल वामपंथी विचारधारा के लोगों का बड़ा हाथ है। जिस भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस अपने समर्थक आधार, बौद्धिक समर्थक परिवार और अपने राजनीतिक हथकंडों से अछूत-सा बनाए रखने की लगातार कोशिश करती रही, वही अब उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। भारतीय जनता पार्टी का उसकी बड़ी चुनौती बनना यह साबित करने के लिए काफी है कि कांग्रेस जिस राह पर चलती रही है, जो उपक्रम वह करती रही है, अपने विशाल बौद्धिक समर्थक वर्ग के सहारे नैरेटिव रचती रही है, उसकी पोल-पट्टी आज के भारतीय मतदाता के समक्ष खुल चुकी है। इसीलिए जब राहुल गांधी मंदिरों की यात्रा करते हैं, जब वे खुद को दत्तात्रेय गोत्र का बताते हैं तो उनका भारतीय जनमानस के बड़े वर्ग में उपहास उड़ाया जाता है। राहुल के ये कदम विश्वसनीयता हासिल नहीं कर पाते, इसलिए चुनावी राजनीति में कांग्रेस ज्यादातर मौकों पर मात खा जाती है।

कांग्रेस का गठन चूंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद को लोक आधार देने के लिए हुआ था। इसलिए आप देखेंगे कि उसके शुरूआती कुछ सालों तक कांग्रेस में वे ही लोग प्रभावी थे, जो उस दौर के खाए-अघाए परिवारों से थे। एक तरह से कह सकते हैं कि उस कांग्रेस में तत्कालीन भारतीय समाज का अभिजात्य वर्ग ज्यादा सक्रिय था। आम लोगों की भूमिका ज्यादातर दरी-जाजिम बिछाने की रही। बाद में तिलक के उभार के बाद कांग्रेस के चरित्र में बदलाव होना शुरू होता है। लेकिन तिलक की पूरी कोशिश के बावजूद कांग्रेस अपनी अभिजात्य संस्कृति से उबर नहीं पाती। उसी कांग्रेस को गांधी लोक की कांग्रेस बनाने में सफल रहे। गांधी ने रणनीतिक रूप से कांग्रेस को बदला, उसमें आम भागीदारी बढ़ी, आम लोगों के सवाल उठे।

आजादी के आंदोलन के पहले तक गांधी के प्रभाव वाली कांग्रेस एक ऐसी छतरी थी, जिसमें तमाम विचारधाराएं समाहित थीं। कांग्रेस के अंदर ही समाजवादियों ने 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। कांग्रेस आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीखी आलोचना करती है, लेकिन यह भी सच है कि उसके संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार भी नागपुर में कांग्रेस के ही कार्यकर्ता थे। साफ है कि आजादी के पहले तक कांग्रेस सबकी थी। चूंकि स्वाधीनता के पहले सभी विचारधाराओं का एक मात्र लक्ष्य विदेशी दासता से देश को मुक्त कराना था, इसलिए कांग्रेस हर विचारधारा को समाहित करती रही। इस पूरी प्रक्रिया में देखेंगे तो कांग्रेस में हर वर्ग से नेतृत्व उभरता है। ठेठ गंवई और देसी नेतृत्व भी सामने आता है। हालांकि जिसे क्रीम कहते हैं, उस पर अभिजात्य हावी रहा। कहना न होगा कि यह अभिजात्यपन कांग्रेस में समाहित है, इसलिए आज भी यह उसमें किंचित नजर आता है।

इससे कौन इनकार करेगा कि नेहरू, इंदिरा और राजीव के दौर तक लोक का बड़ा हिस्सा कांग्रेस समर्थक था। लेकिन बाद के दौर में यह आधार लगातार छिटकता गया है। इसकी पहली वजह समझने के बदलती सामाजिक संरचना पर ध्यान देना होगा। आज दुनिया बहुत बदल गई है। सूचना क्रांति ने दुनिया को छोटा कर दिया है। सूचनाओं का अबाध प्रवाह जारी है। साक्षरता दर बीसवीं सदी के साठ और सत्तर के दशक के मुकाबले बहुत ज्यादा हो गई है। शिक्षा और साक्षरता के चलते भारतीय युवाओं को पहले की तुलना में विदेशों में नौकरियां ज्यादा मिल रही हैं। यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जाकर आज का भारतीय युवा वहां की प्रगति, वहां के नेतृत्व की रणनीति और वहां के सामाजिक गठबंधन को देख रहा है। फिर उसकी वह अपने देश के हालात से तुलना करता है। फिर उसे लगता है कि आजादी के बाद सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रही कांग्रेस और उसके परिवार ने असल में क्या किया है? इस तुलनात्मक अध्ययन में वह खुद को पिछड़ा पाता है, अपने सामाजिक गठबंधन की जटिलताओं को समझता है और इसके लिए कांग्रेस को ज्यादा दोषी मानने लगता है। यह सोच नए तरह के पारिस्थितिकीय तंत्र (इको सिस्टम) की बुनावट को बढ़ावा देती है। दुर्भाग्यवश इस सोच को कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व या तो समझ नहीं पा रहा है या समझते हुए भी नकार रहा है।

1969 में कांग्रेस में विभाजन के बाद इंदिरा गांधी को संसदीय बहुमत के लिए वामपंथियों ने सहयोग दिया। इसके बदले में भले ही अकादमिक दुनिया में अपनी विचारधारा और समर्थकों को फिट करने की छूट इंदिरा ने दी। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कभी वामपंथियों को कांग्रेस और व्यवस्था के संचालन में शामिल नहीं किया। अंग्रेजी में जिसे कहते हैं, ड्राइविंग सीट पर बैठना, आज की कांग्रेस में वामपंथी सलाहकार उसी सीट पर बैठे नजर आ रहे हैं।

भारतीय वामपंथ का संकट है कि वह मार्क्स के सिद्धांतों को भारतीय समाज पर ज्यों का त्यों थोपना चाहता है। भारतीय समाज में वर्ग की वैसी व्यवस्था नहीं है, जैसा मार्क्स ने यूरोप में देखा। भारत में वर्ण यानी जाति और उनके अपने संस्कार सच्चाई है। पांच हजार साल की सभ्यता में वे संस्कार भारतीय जीन में समाहित हैं। यह ठीक है कि कुछ काल खंडों में कुछ वर्णों ने कुछ वर्णों के साथ भेदभाव किया। लेकिन जब बात संस्कार और संस्कृति की आती है तो भेदभाव से प्रभावित वर्ण भी भारतीय पारंपरिक सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप व्यवहार करने लगता है। भारतीय वामपंथियों को यह तथ्य शायद ही स्वीकार्य हो कि वर्ण व्यवस्था में निचले पायदान पर रहे और वामपंथ के शब्दों में पीडि़त और प्रताडि़त रहे लोग सशक्तीकरण से बदले हालात में अपने घरों में भी शादियां, विवाह, संस्कार आदि वर्ण व्यवस्था के उपरी पायदान पर रहे लोगों की तरह ही करने में गर्व महसूस कर रहे हैं। धर्मांतरण करने-कराने वाली कुछ ताकतें बेशक भोले-भाले लोगों को प्रभावित कर लेती हों, लेकिन यह भी सच है कि ज्यादतर धर्मांतरित लोग भी ईसा मसीह के साथ अपने देवताओं की पूजा करना नहीं छोड़ते। वामपंथी विचार इस तथ्य को सिरे से खारिज कर देगा, लेकिन हकीकत यही है। दुर्भाग्यवश कांग्रेस के मौजूदा वामपंथी सलाहकार इसे स्वीकार नहीं करते। चूंकि कांग्रेस का प्रथम परिवार अभिजात्य के शिखर समाज का अंग है, इसलिए उसे ये ज्यादातर बातें पता ही नहीं है। इसलिए वह वामपंथ रचित नैरेटिव की लड़ाई को ही भारतीय जनता पार्टी की शिकस्त का सबसे बड़ा हथियार मान रहा है और उसे ही बार-बार अपनी राजनीति लड़ाई में इस्तेमाल कर रहा है।

कन्हैया कुमार मीडिया और प्रगतिशील बौद्धिकता के पोस्टर ब्वॉय हैं। कांग्रेस में शामिल होने के दिन जिस तरह प्रेस कांफ्रेंस पर वे हावी रहे, जिस तरह की शब्दावली का उन्होंने इस्तेमाल किया, उसका एक संदेश स्पष्ट है। वे अपने बाकी साथियों की तरह कांग्रेस के प्रथम परिवार के इशारे पर चलने नहीं आए हैं, बल्कि वे कांग्रेस को बदलने आए हैं। कांग्रेस के निष्ठावान वरिष्ठ लोग इस तथ्य को समझ रहे हैं। लेकिन वे खुलकर बोलने से परहेज कर रहे हैं। ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में पुराने कांग्रेसी स्वीकार करते हैं कि वामपंथ पर बढ़ती यह निर्भरता कांग्रेस के लिए आने वाले दिनों में और ज्यादा नुकसानदायक होगी।

कांग्रेस के अतीत को देखिए। जिसका उसने सहयोग किया, वह सहयोगी ही अपने इलाके में प्रमुख बन गया। तमिलनाडु इसका स्पष्ट उदाहरण है। महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस का उभार भी इसी की अगली कड़ी है। उसके क्षत्रप धीरे-धीरे उससे अलग होकर उसके अभिजात्य और वामपंथी प्रभाव से अलग हो रहे हैं। ममता बनर्जी तो आक्रामक अंदाज में उन कांग्रेसियों को भी अपनी छतरी के नीचे छाया दे रही हैं, जो कांग्रेस के अपने राज्यों में स्तंभ थे। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री फलेरियो इसका हालिया उदाहरण हैं।

भारतीय जनता पार्टी जब भी तेजी से उभरने लगती है, कुछ लोगों को कांग्रेस में ही देश को बचाने की ताकत दिखने लगती है। 1994-95 के दौर में जब भारतीय जनता पार्टी तेजी से उभर रही थी, तब आजीवन कांग्रेस विरोधी रहे समाजवादी दिग्गज मधु लिमये ने अपने आखिरी लेख में लिखा था कि कांग्रेस का बचना जरूरी है, क्योंकि देश को वही बचा सकती है। चूंकि यह उनका आखिरी लेख था, इसका असर राजनीतिक माहौल पर पड़ा और कुछ दिनों के लिए भारतीय जनता पार्टी को तमाम राजनीतिक दलों ने मिलकर दूर कर दिया, लेकिन उसके उभार को नहीं रोक पाए। करीब पच्चीस साल बाद कन्हैया कुमार भी बता रहे हैं कि कांग्रेस ही देश को बचा पाएगी। इसका एक संदेश यह भी है कि वे मान चुके हैं कि जिस वामपंथ के वे कार्ड होल्डर हैं, वह देश को नहीं बचा पा रहा है। हालांकि कांग्रेस के पुराने लोग इसके बरक्स कह रहे हैं कि और कोई बचे चाहे नहीं बचे, कन्हैया कांग्रेस के सहारे जरूर बच जाएंगे। बहरहाल ना तो 1998 में देश टूटा और न ही आगे वह कमजोर होने जा रहा है। चाहे मधु लिमये हों या कन्हैया कुमार, देश बचाने के बहाने कांग्रेस बचाने का फॉर्मूला अब देश की बड़ी जनसंख्या को नहीं सुहाता। दुर्भाग्यवश कांग्रेस का प्रथम परिवार अपने सलाहकारों के कोरस गान से उठे अनुनाद में इसे समझ नहीं पा रहा है।

कांग्रेस को अगर बचना है, देश के नागरिकों का समर्थन आधार हासिल करना है तो उसे सबसे पहले नैरेटिव की लड़ाई से निकलना होगा। वामपंथी आधार वाले बौद्धिक कोरस गान के तुमुलनाद से निकलना होगा। उसे स्थानीय लोगों की आवाजों को उठाना होगा। राजस्थान में विवाद हो, छत्तीसगढ़ में हंगामा हो, उसे नजरअंदाज करके दूसरे राज्यों में प्रथम परिवार की नजर में बनने के लिए आने वाले वहां के मुख्यमंत्रियों को रोकने जैसे जनता को सीधे संदेश देने वाले कदमों पर लगाम लगानी होगी। हालांकि ऐसा होता फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा।

 

Deepak Kumar Rath


उमेश
चतुर्वेदी

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