ब्रेकिंग न्यूज़ 

पूजा लक्ष्मी की ही क्यों, गृहलक्ष्मी की क्यों नहीं?

पूजा लक्ष्मी की ही क्यों, गृहलक्ष्मी की क्यों नहीं?

विचित्र विरोधाभास है स्त्री की स्थिति में इस देश में। एक ओर शास्त्रों में श्री, धी और शक्ति की प्रतीक लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के रूप में पूजित है, तो दूसरी ओर घर में ही नहीं समाज के लगभग हर क्षेत्र में शोषित और पीडि़त, दोयम दर्जे की नागरिक भी है। एक ओर वह गृहलक्ष्मी की पदवी से अलंकृत है तो दूसरी ओर दहेज की बलिवेदी पर निरंतर चढ़ायी जा रही आहुति भी है। मां के रूप में आत्मोसर्ग के शिखर पर पहुंची हुई, स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और वंदनीय यह नारी ही नरक की खान, माया, महाठगिनी और छलना भी बन जाती है जिसके आकर्षण से बचने और जिसके मोहपाश से निकल भागने की चेष्टा गौतम युग-युग से करते रहे हैं और सफल होने पर वंदित होते रहे हैं। नारी से जन्मा नर उसकी इसी जन्म दे सकने की क्षमता के लिए उसकी देह रचना के लिए आखिर क्यों युग-युग से उसे कभी सम्मानित और कभी प्रताडि़त करता आ रहा है?

घर में कैद हो गयी गृहलक्ष्मी

बात शायद तब से शुरु हुई होगी, जब पुरुष ने नये जीवन की रचना में अपना भाग पहचाना होगा और उसमें नारी की तुलना में अपने आपको बहुत गौण पाया होगा। यहीं से शुरु हुआ होगा स्त्री की देह-रचना की उसकी कमजोरी सिद्ध करने और इसके लिए उसे अपावन ठहराने का कुचक्र। पुरुष की सत्ता को बनाए रखने और उसकी सम्पत्ति को उसकी ही संतान के लिए सुरक्षित रखने की चेष्टा के फलस्वरूप विवाह-प्रथा जन्मी और उसकी कृपा से जो सहचरी और सहभागिनी थी, वह मात्र अनुगामिनी बन कर घर में कैद हो गयी।

एसेहु पति कर किए अपमाना, नारिपाव जमपुर दुख नाना’

इस प्रथा पर परंपरा का मुलम्मा चढ़ा, जिसने स्त्री को खुद उसी के मुंह से ‘अधम ते अधम’ कहलाया, ‘ढोल, गंवार, शूद्र’ के साथ ताडऩा की अधिकारी ठहराया, ‘अति स्वतंत्र हुए बिगरहि’ का भय दिखाया ओर पति सेवा को उसके जीवन का चरम लक्ष्य बनाया। उसे सीख दी गयी कि पति को जो मोक्ष अन्य उपायों से प्राप्त होगा, वह उसे सहज पति सेवा से ही मिल जाएगा। जो आत्मसम्मानी नारी पुरुषों के दिए इन फतवों से भी आतंकित न हो और दुष्ट, कुटिल, कामी पति की उपेक्षा या अवमानना करने की बात मन में लाए उसका सिर कुचलने के लिए ‘एसेहु पति कर किए अपमाना, नारिपाव जमपुर दुख नाना’ की व्यवस्था की गयी। बड़ी चौकस, चाक-चौबंद कोशिश थी। भागने के लिए कहीं कोई दरवाजा तो क्या, खिड़की भी खुली रहने नहीं दी गयी थी, तिस पर मनु महाराज उसे बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के सुपुर्द भी तो कर गए थे।

पुरुष के चरित्र की जिम्मेदारी भी गृहलक्ष्मी पर

लकीर खींची पुरुषों ने जरूर मगर उस लकीर को पीटने की जिम्मेदारी, औरतों ने ही संभाली। सदियों तक ऐसी दिमाग-धुलाई हुई उनकी कि आखिरकार वे भी यह स्वीकार करने लगीं कि वे हीन हैं, उनका उद्धार पुरुष की सेवा ओर इच्छापूर्ति से ही संभव है और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघते ही कोई रावण उन्हें हर ले जाएगा। चरित्र का अर्थ केवल शारीरिक शुद्धता हो गया और यह शुद्धता भी सिर्फ औरतों के लिए जरूरी रही। दलील दी गयी कि वह मां है और चरित्रवान मां की संतान ही चरित्रवान हो सकती है। इस तरह पुरुष के चरित्र की जिम्मेदारी भी स्त्री पर ही थोप दी गयी। बदलती हुई सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियां ये सारी जिम्मेदारियां सिर झुका कर स्वीकार करती गयीं।

घर की चौखट लांघ कर बाहर खड़ी हुईं आज गृहलक्ष्मी

जब तक ये सिर झुके रहे, सामाजिक शांति को कोई खतरा नहीं था किंतु जब देश की आधी आबादी को गूंगा बनाकर शेष पचास प्रतिशत उसका शोषण करें तो इस अन्याय के विरुद्ध स्वर उभरते ही ये स्वर उठे सती-प्रथा के विरुद्ध, बाल-विवाह के विरुद्ध और विधवा विवाह को स्वीकार्य बनाने, स्त्री को  शिक्षा और संपत्ति में बराबर का अधिकार दिलाने के लिए। स्वतन्त्रता संग्राम की एक बड़ी उपलब्धि यह भी थी कि संघर्ष और संकट की इस घड़ी में स्त्रियां घर की चौखट लांघ कर बाहर आ खड़ी हुईं।

जो काम पुरुष कर सकता है उसे गृहलक्ष्मी भी

लड़ाई खत्म हुई तो उसे गणतंत्र में वोट का अधिकार जरुर बिना लड़े मिल गया मगर उसकी स्थिति में जो थोड़ा बहुत परिवर्तन आया वह ज्यादातर कागजी ही रहा। हां, एक बात की जानकारी उसे इस दौरान जरूर हो गयी कि जो काम पुरुष कर सकता है उसे वे भी कर सकती हैं और घर के बाहर की दुनिया ज्यादा दिलचस्प है। उस दुनिया में पैर जमाने की उसकी कोशिशं अभी भी जारी हैं – अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग रुख में भी और वे सब काम करने की चेष्टा के रूप में भी जिस पर पहले पुरुषों का एकाधिकार था।

गृहलक्ष्मी को मिलता वफादारी का इनाम सामाजिक शाबाशी के रूप में

अपनी अस्मिता की यह तलाश उसे घर से बाहर ले आयी मगर क्या सचमुच वह आज पहले से ज्यादा सुखी है? दोहरे काम का बोझ उठाकर भी कहीं उसका मन उसे कचोटता है कि गृहिणी और मां के कर्तव्य को वह पूरी निष्ठा नहीं दे पा रही है। उसे वह अपराध-बोध देने वाला कौन है? यही पुरुष-प्रधान समाज जो एक ओर स्त्री से आदर्श गृहिणी, ममतामयी मां और स्नेहमूर्ति पत्नी होने की अपेक्षा करता है और दूसरी ओर गृह संचालन को अपने अर्थोपार्जन के बराबर महत्वपूर्ण काम मानने से इंकार करता है जबकि वस्तुस्थिति यह है कि गृहिणी सप्ताह में सातों दिन काम करती है। उसे किसी तरह छुट्टी नहीं मिलती, बीमारी की भी नहीं, उसका न कोई वेतन है, न उसके अधिकारों की रक्षा करने के लिए कोई यूनियन। न उसे सेवा की, सुरक्षा की गारंटी ही है। आज भी पुरुष क्रोध के आवेश में आकर उसे ‘अपने घर’ से निकल जाने का आदेश दे सकता है। आज भी वह अपने परिवार के किसी व्यक्ति को स्वेच्छा से आर्थिक मदद नहीं दे सकती और पति की मृत्यु के उस घर और सम्पत्ति में जो उसके आजीवन प्रयास, प्रयत्न और परिश्रम का फल है, वह अपने बच्चों के समान केवल एक हिस्से की हकदार है मगर इसके बावजूद वह इसी घर के लिए जिसका तिनका-तिनका मेहनत से बटोरती-संजोती है, मरती-खपती रहती है, कोई गुलाम भी ऐसी अवस्था में शायद विद्रोह कर उठता मगर वह नहीं करती क्योंकि उसकी वफादारी का इनाम उसे सामाजिक शाबाशी के रूप में मिलता है।

जिस घर में गृहलक्ष्मी दु:खी होकर रोती है, उसका नाश हो जाता

क्या सचमुच यह अपेक्षा बहुत बड़ी है कि पुरुष युगों से उसके शोषण की शिकार इस गृहलक्ष्मी के प्रति दी गयी अपनी लंबी उपेक्षा छोड़कर उसका मूल्य पहचानने और इससे पहले कि वह विद्रोह कर उठे उसे उसकी न्यायत: प्राप्य प्रतिष्ठा दे। जब तक नारी स्वयं को देवी समझेगी, स्थिति यथावत् रहेगी किंतु जिस दिन वह अपना मानवी रूप पहचान लेगी वातावरण में निश्चय ही बदलाव आएगा। बात-बात में मनु की दुहाई देने वाले शायद भूल जाते हैं कि मनु के ही शब्दों में जिस घर में स्त्री दु:खी होकर रोती है, उसका नाश हो जाता है।

 

डॉ.विभा खरे

Leave a Reply

Your email address will not be published.