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श्री दुर्गियाना मंदिर : प्राचीन एवं भव्य

श्री दुर्गियाना मंदिर : प्राचीन एवं भव्य

अमृतसर में हिंदुओं का अत्यंत प्राचीन मंदिर और तीर्थ स्थान है जिसे श्री दुर्गियाना मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसे रामायण काल में निर्मित मानते हैं। ऐसी लोक मान्यता है कि श्रीराम जी ने जब अश्वमेध यज्ञ का अश्व छोड़ा तो उसे सीता-राम के सुपुत्रों- लव और कुश ने बांध लिया। तब वे रामतीर्थ में वाल्मीकि जी के आश्रम में रहते थे। जब महावीर हनुमान उस घोड़े को छुड़ाने के लिए पहुंचे तो बालकों ने उन्हें भी एक वटवृक्ष से बांध दिया। वृक्ष आज भी मंदिर के परिसर में विद्यमान है। इसी पुरातन स्थल पर माता सीता ने आदि शक्ति की पूजा की ऐसी मान्यता है। इसी पुरातन स्थल पर 16वीं शताब्दी में सेठ गुरु सहाय ने  पुन: इस मंदिर को बनवाया जो दुर्गा माता को समर्पित है। इश्क भक्त की मूर्ति, मंदिर की दर्शनी ड्योढ़ी में स्थापित है। अमृतसर  नगरपालिका के 1818 ईस्वी के दस्तावेजों में इस मंदिर के सरोवर का वर्णन है। जॉन कैम्पवेल ओमान, जो गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में प्राकृतिक विज्ञान विषय के प्रोफेसर थे, ने अपनी पुस्तक में इस मंदिर के संबंध में लिखा है कि उन्होंने इसमें कुछ सन्यासियों को योगा करते हुए देखा है। अमृतसर जिला के गजेटियर 1893 में इस संबंधी यह भी उल्लेख है कि यहां एक ‘सरोवर’ और ‘देवी द्वारा’ है जहां श्रद्धालु यात्रियों की भीड़ लगी रहती है।

मगर इस मंदिर के पुन: जीर्णोद्धार का श्रेय महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी को है जिन्होंने 1921 ईस्वी में इसे सजाने-संवारने और सौम्य रूप देने का अभियान प्रारंभ किया और अंतत: इसे उन्होंने वह रूप दिया जो मंदिर के श्रद्धालुओं की आंखों में आज भी स्पष्ट झलकता दिखाई देता है।

यहां एक 60 मीटर 130 मीटर का सरोवर है। इस सरोवर के सलिल-निर्मल जल में अनेक रंग-बिरंगी मछलियां कलोल करती हुई इठलाती-इतराती रहती हैं। इसी सरोवर से ध्यानमग्न मुद्रा में शंकर भगवान की मूर्ति भी है जो नैसर्गिक नजारा पेश करती है। इस सरोवर के चहुंओर से देवी-देवताओं की मूर्तियां सुसज्जित हैं जिससे एक दैविक दृश्य बन जाता है। वातावरण में भव्यता-सौम्यता और सौंदर्य होता है समाविष्ट हो जाते हैं।

इसी सरोवर के बीचों-बीच से इस मंदिर का निर्माण हुआ है। मंदिर की वास्तुकला सिख धर्म के सर्वोच्च दरबार साहिब-श्री हरमंदिर साहिब जैसी ही लगती है। इसके गुंबद और चंदोओं तथा बाहरी दीवारों पर 40 किलोग्राम सोने का झोल चढ़ाया हुआ है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सरोवर के मध्य में एक पुल बना हुआ है जो सीधे मंदिर के मुख्य द्वार तक जाता है। इसके मार्ग में दोनों और मजबूत लोहे के जाल हैं। मुख्य मंदिर में रंगीन पत्थरों से भवानी देवी के भिन्न-भिन्न रूपों को दर्शाया गया है।

मंदिर में दिन-रात माता का यशोगान चलता है। चलो को भजन और कीर्तन की पावन स्वर लहरी से समस्त वातावरण एकदम शुद्ध, स्वस्थ और शाश्वत हो उठता है।  इसका मंडप सदैव जगमगाती रोशनी में झिलमिलता  दिखाई देता है। इसके सभी दरवाजे चांदी के हैं। इसके मुख्य द्वार पर हनुमान जी की भव्य मूर्ति बनी हुई है और इसके दूसरी ओर कृष्ण भगवान को कालिया नाग का मर्दन करते हुए दिखाया गया है। दुर्गियाना मंदिर के  समस्त परिसर में  कीमती  संगमरमर लगा हुआ है।

दुर्गियाना मंदिर के अंतर्गत अन्य मंदिर भी हैं, यथा लक्ष्मीनारायण, सीतला देवी का मंदिर तथा हनुमान जी का मंदिर। इसलिए इस मंदिर को सीतला देवी अथवा लक्ष्मी नारायण मंदिर भी कह दिया जाता है। हनुमान जी का मंदिर है, में स्थापित बजरंगबली जी की मूर्ति जैसी मूर्ति भारत में केवल अयोध्या की हनुमानगढ़ी में ही उपलब्ध है। इसमें महावीर को बैठने की मुद्रा में दिखाया गया है। यह मंदिर उस वटवृक्ष के इर्द-गिर्द ही बनाया गया है जिससे लव-कुश ने महावीर को बांध दिया था। भक्तों के लिए यह वृक्ष और मंदिर अत्यंत पवित्र पावन हैं। लोग इनकी पूजा और परिक्रमा करते हैं। उन्हें सिंदूर चढ़ाते हैं और फल-फूल अर्पित करते हैं। नवविवाहित और निसंतान दंपत्ति संतान की मन्नतें मांगते हैं।

नवरात्रि और दशहरा के दिनों में इस मंदिर में एक अद्भुत मेला लगता है जो लंगूर मेला के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा मेला भारत में कहीं और नहीं लगता। इसमें तमाम बच्चे लंगूर का वेश धारण कर गली-गली में ढोल की थाप पर धूम मचाते मंदिर परिसर की ओर नाचते-गाते हुए अपने माता-पिता के साथ पहुंचते हैं। इन बच्चों ने रंगीली-चमकीली और रुपहली धारियों वाली पोशाके, जिन पर भिन्न-भिन्न रंगों के गोटे लगे होते हैं, पहनी होती हैं। सिरों पर अजीब टोपियां होती हैं और बलखाती पूंछें लटकाई होती हैं। उनके चेहरों पर मुल्तानी मिट्टी का लेप चढ़ा रहता है। वह सचमुच के लंगूर लगते हैं। मां-बाप ने भी बढिय़ा से बढिय़ा परिधान पहन रखे होते हैं। इस  मेले में वे दंपति तो बड़े उत्साह से भाग लेते हैं जिनकी मन्नतें पूरी हुई होती हैं।

दुर्गियाना मंदिर में हर रोज ही यात्रियों का तांता लगा रहता है। मगर नवरात्र, दशहरा के अतिरिक्त दिवाली, रामनवमी और जन्माष्टमी के त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाई जाते हैं।

श्री दुर्गियाना मंदिर ट्रस्ट की ओर से इसी परिसर में  लक्ष्मी नारायण आयुर्वेदिक कॉलेज  चलाया जाता है जो बीएएमएस की पढ़ाई करवाता है। यह बाबा फरीद मेडिकल यूनिवर्सिटी, फरीदकोट से संबद्ध  है।  संस्कृत भाषा साहित्य पढ़ाने के लिए लक्ष्मी नारायण संस्कृत विद्यालय भी अरसे से चल रहा है जहां विद्यार्थियों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है। विधवाओं और निराश्रित महिलाओं को सव:निर्भर बनाने के लिए सिलाई स्कूल, यात्रियों की सुविधा के लिए ‘धनवंत कौर धर्मशाला’ और संतों तथा कथावाचकों के लिए संत निवास का निर्माण भी ट्रस्ट ने किया हुआ है।  नियमित लंगर की व्यवस्था भी चालू है। इनके  अतिरिक्त पुरातन शास्त्रों की पांडुलिपियां भी प्रचुर मात्रा में  यहां  प्रदर्शित हैं।

श्री दुर्गियाना मंदिर ट्रस्ट इसके नवीनीकरण और सौंदर्यीकरण की सतत् प्रयत्नशील रहता है। इसने मंदिर के विकासार्थ  समीपवर्ती 55 संपत्तियों को खरीदा है जिन पर बहुमंजिला पार्किंग परिसर, ओपन एयर थिएटर और दुकान परिकोष्ठ बनाए जा रहे हैं।

अमृतसर में दुर्गियाना मंदिर के अतिरिक्त स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग और अटारी सीमा परेड यात्रियों और पर्यटन के लिए मुख्य आकर्षण के केंद्र हैं।

 


डॉ.
प्रतिभा गोयल

(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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