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भारतीय विद्यार्थियों की विदेश में शिक्षा का मोह : एक चिंता का विषय

भारतीय विद्यार्थियों की विदेश में शिक्षा का मोह : एक चिंता का विषय

एक समय था जब सम्पूर्ण विश्व से लोग उच्च शिक्षा के लिए भारतवर्ष आते थे। भारत ज्ञान-विज्ञान का वैश्विक केंद्र था। भारत प्राचीन काल में विश्व में उच्च शिक्षा के लिए जाना जाता था। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, वल्लभी, पुष्पगिरी आदि शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे। उड़ीसा में स्थित पुष्पगिरी को विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय की संज्ञा दी जाती है। पूरे विश्व से विद्यार्थी धर्म, दर्शन, विज्ञान आदि की शिक्षा के लिए भारतवर्ष आया करते थे। इन्ही विश्वविद्यालयों के कारण ही भारत को विश्व गुरु की संज्ञा दी गई थी। भारतीय संस्कृत का ध्वज इन्ही विश्वविद्यालयों के कारण ही पूरे विश्व में लहरा रहा था। भारतवर्ष उस समय उच्च शिक्षा का वैश्विक केंद्र था।

जब हम वर्तमान समय में उच्च शिक्षा की दयनीय स्थिति देखते है तो दु:ख होता है की हम कहां से कहां आ गए हैं। आज भारत विश्व में विद्यार्थी बाहर पढऩे हेतु भेजने के लिए जाना जाता है न की विदेश से विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु भारत आकर्षित करने के लिए। उच्च शिक्षा हेतु बाहर विद्यार्थी भेजने में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है। एक तरफ 10 लाख से भी अधिक भारतीय विधार्थी विदेशों में पढ़ रहे हैं (विदेश मंत्रालय 2021) और दूसरी तरफ पचास हजार से भी कम विदेशी भारत पढऩे आते हैं। 2019-20 में AISHE के अनुसार केवल 49348 विदेशी विद्यार्थी ही भारत में पढ़ रहे हैं। भारतीय विद्यार्थियों के विदेश में पढऩे से काफी अधिक मात्रा में विदेशी मुद्रा का भी भारत से पलायन होता है जो अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव डालता है। इस वर्ष केवल एक महीने अगस्त 2021 में 1.8 खरब डॉलर भारत से विदेशी मुद्रा विदेश गई, जो अब तक का एक महीने का रिकार्ड है और इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा भारतीय विद्यार्थियों द्वारा विदेश में फीस एवं अपने रहन सहन पर खर्च किया गया (Indian Express 21 October) इस पैसे को यदि भारत में व्यय किया जाता तो निश्चित रूप से यह हमारे यहां रोजगार के अवसर उत्पन्न करता और अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक होता।

भारत से सबसे अधिक विद्यार्थी अमेरिका (30 प्रतिशत), ऑस्ट्रेलिया (10 प्रतिशत), कनाडा (9 प्रतिशत) एवं ब्रिटेन (6 प्रतिशत) आदि विकसित देशों को जाते हैं। और तो और अब भारतीय विद्यार्थी चीन, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण कोरीया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर आदि देशों को भी जा रहे हैं।

समय की मांग है की एक बार पुन: भारत को विश्व में उच्च शिक्षा का शैक्षणिक केंद्र बनाया जाए। दु:ख तब और होता है जब हम पाते हैं की हजारों की संख्या में भारतीय विद्यार्थी चीन एवं हांगकांग उच्च शिक्षा के लिए जा रहे हैं। चीन ने दक्षिण एशिया के विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्रारंभ किया है। अपने विद्यार्थियों को चीनी भाषा में और विदेशी विद्यार्थियों को अंग्रेजी भाषा में शिक्षा देकर काफी धन भी कमा रहा है। चीन जाने वाले भारतीय विधार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जो की एक चिंता का विषय है। चीन के साथ-साथ सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण कोरीया एवं हांगकांग जैसे एशियाई देशों में भारत से पढऩे जाने वाले विद्यार्थीयों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जबकि इन देशों से शायद ही विद्यार्थी शिक्षा हेतु भारत आते है। हाल के वर्षों में दुबई, आबुधाबी, दोहा जैसे पश्चिम एशिया के देश भी भारतीय विद्यार्थीयों को आकर्षित कर रहे हैं और भारतीय विद्यार्थी इन देशों को भी उच्च शिक्षा के लिए जाने लगे हैं। दुबई, आबूधाबी, दोहा, सिंगापुर एवं कुलालमपुर आदि ने अपने यहां यूरोप एवं अमेरिका के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के परिसर खोल दिए हैं। यहां फीस भी कम है और रहने का खर्च भी पश्चिम के देशों से काफी कम है। ढेर सारे भारतीय विद्यार्थी इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश इस लालच में ले रहे हैं कि उन्हें आसानी से प्रतिष्ठित पश्चिम के विश्वविद्यालयों की डिग्री मिल जाएगी।

दूसरी तरफ जो विद्यार्थी भारत पढऩे आते हैं, उसमें से अधिकांश दक्षिण एशिया के देशों से आते हैं जो इतिहास के किसी न किसी कालखण्ड में भारत के ही अंग थे। सम्पूर्ण दक्षिण एशिया सांस्कृतिक रूप से एक ही राष्ट्र हैं। यधपि राजनीतिक रूप से ये देश आज अनेक राष्ट्र राज्य में विभक्त हैं। सबसे अधिक विद्यार्थी भारत में नेपाल से पढऩे आते हैं। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार क्रमश: नेपाल के बाद आते हैं। अफ्रीकी देशों के भी विद्यार्थी काफी संख्या में भारत आते हैं। नाइजीरिया, सूडान, घाना, ईथोपिया आदि अफ्रीकी देशों से काफी संख्या में छात्र भारत शिक्षा के लिए आते हैं। पश्चिम एशिया के देशों से भी पहले काफी विद्यार्थी भारत शिक्षा के लिए आते थे। पर इधर वे अधिक पेट्रो डॉलर के कारण यूरोप एवं अमेरिका को वरीयता देते हैं। कुछ विद्यार्थी यूरोप, अमेरिका एवं एशियाई देशों से भी भारत में अध्ययन के लिए आते हैं।

राज्य के रूप में कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली विदेशियों के शिक्षा हेतु पसंदीदा राज्य हैं। बंगलुरु, मैसूर, पुणे, दिल्ली, नोएडा आदि नगर विदेशी विद्यार्थियों के केंद्र के रूप में हाल के वर्षों में उभरे हैं। आवश्यकता इस बात है की इन शहरों के अतिरिक्त भी शिक्षा के केंद्र बनाए जाएं जो विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित कर सकें।

निजी क्षेत्र के मनीपाल, एमीटी, जे एस एस, डी वाई पाटिल आदि विश्वविद्यालयों ने विदेशों में अपने परिसर प्रारंभ किए हैं। मनीपाल विश्वविद्यालय ने नेपाल, मलेशिया, एंटीगुआ, एवं दुबई में अपना केंद्र शुरू किया है। एमिटी विश्वविद्यालय ने विदेशों में अपने पचास से अधिक केंद्र शुरू किए हैं। डी वाई पाटिल विश्वविद्यालय ने मारिशस में अपना परिसर शुरू किया है। ये विश्वविद्यालय मूलत: भारतीय मूल के प्रवाशी भारतीयों के लिए खोले गए है। जो भी कारण हो कम से कम ये भारतीय शैक्षणिक केंद्र विदेशों में भारत संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारत के मृदुल शक्ति का स्रोत भी हैं।

योग, आयुर्वेद, संस्कृत, भारतीय दर्शन, वैदिक गणित आदि विषय विदेशी छात्रों को भारत आकर्षित करते हैं। काफी संख्या में विदेशी छात्र इन विषयों के अध्यन हेतु प्रति वर्ष भारत आते हैं।

विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए भारत सरकार ने भारत अध्यन कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 2500 छात्रवृति प्रदान की जा रही है और वर्तमान में इस कार्यक्रम के अंतर्गत 6 हजार से अधिक छात्र भारत में पढ़ रहे है। GRE के तर्ज पर भारत में INSAT 2020 में प्रारंभ किया गया और 5 हजार से अधिक छात्र ऑनलाइन टेस्ट में सम्मिलित हुए थे। 2025 तक 2 लाख विदेशी छात्रों को भारत में लाने की भारत सरकार की योजना है जो वर्तमान संख्या की चार गुना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति विदेशी छात्रों के सुविधा हेतु प्रत्येक विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय छात्र कार्यालय खोलने का सुझाव देता है। विश्व के सौ उच्च श्रेणी के विश्वविद्यालयों को भारत में और भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेश में अपना परिसर खोलने की अनुमति देता है। अकेडेमिक क्रेडिट बैंक की स्थापना, क्रेडिट ट्रान्स्फर, टविन्निंग, संयुक्त डिग्री कार्यक्रम, छात्र एवं शिक्षक इक्स्चेंज आदि की अनुमति राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 देता है। सम्भवत: ये सब उपाय भारत में अधिक से अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करने में सफल होगें और 2025 तक 2 लाख विदेशी छात्रों को भारत में आकर्षित करने के लक्ष्य प्राप्त करने में सहायक होंगे। यह भारत के मृदुल शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) के वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और भारतवर्ष के पुन: विश्वगुरु बनने में सहायक होगा, जो 2020 राष्ट्रीय शिक्षा नीति का भी लक्ष्य है।

 

प्रो. तेज प्रताप सिंह

(लेखक राजनीति शास्त्र विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, में प्रोफेसर हैं)

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