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जम्मू-कश्मीर में विकास का दुश्मन इस्लामिक जिहाद

जम्मू-कश्मीर में विकास  का दुश्मन इस्लामिक जिहाद

खामोशियों का चीखना तो अभी बाकी है

फर्श पर अगर हक तुम्हारा है

तो मेरा अर्श अभी बाकी है

भले लकीरे खीछ दो तुम जमीं पर

मगर मेरी जन्नत अभी बाकी है।

धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यही है, यही है, यही है…

जम्मू-कश्मीर भारत का स्वर्ग जिसके बारे मे कितने ही कवियों ने लिखा और गाया। लेकिन देश में एक वर्ग, ऐसा भी है जिसके बारें में सोचकर कश्मीर को भारत का स्वर्ग कहने वालो की जुबान कापने लगती है। आपको मालूम होना चाहिए कि कैसे इसी स्वर्ग में कश्मीरी पंडित तिनके की तरह इधर-उधर बिखर कर रह गए। ऐसा क्यों हुआ यह जानना आवश्यक है क्योंकि यह तकलीफ जितनी कश्मीरी पंडितो की है उतनी ही आपकी और उन तमाम बुद्धिजीवियों की भी होनी चाहिए, जो सहनशीलता पर प्रर्वचन तो देते है, लेकिन सच का सामना नहीं कर पाते। जो किसी छोटे से इलाके में दो पड़ोसियों के झगड़े को धार्मिक रंग देकर देश को गुमराह तो करते है लेकिन हिन्दुओं पर होने वाले इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा किये जाने वाले नरसंहार पर मूक हो जाते है। यह पूरा विश्व जनता है कि आज इस्लामिक कट्टरवाद अपने चरम पर है जिसका जीवंत उदाहरण अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा और अब बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार व कश्मीर में आधार कार्ड पर गैर-मुस्लिम होने पर हत्याएं तो मानो आम बात है। इसके कारण कब लोगों को अपनी जीविका अपने घर आंगन को छोड़ पलायन करना पड़ता है इसका दर्द बयां कर पाना नामुमकिन है।

विस्थापन-निर्वासन-पलायन-निष्कासन

जैसे शब्दों की चोट क्या होती है यह वही समझ सकता है जिसने खुद इन शब्दों के घाव सहे हो, उसी प्रकार पलायन का दर्द क्या है ये वो कश्मीरी पंडित ही जान सकते है जिन्होंने 1990 के दौरान इसे झेला था। जो आज भी अपनी क्षेत्रीय पहचान के लिए लड़ रहे है।

लेकिन आज फिर कश्मीर घाटी का त्रासद इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता दिख रहा है। जिहादी आतंकी कश्मीर में बचे-खुचे हिंदू और सिखों को निशाना बना रहे हैं। इससे उपजे भय के कारण वे फिर से पलायन के लिए मजबूर हो सकते हैं। हाल ही में श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल में सिख और हिंदू अध्यापकों को चिन्हित कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे पहले श्रीनगर के जाने-माने दवा विक्रेता मक्खन लाल बदरु की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। आतंकियों ने दिहाड़ी कमाने वाले एक दलित वीरेंद्र पासवान को भी नहीं बख्शा, जो रोजी-रोटी के लिए कश्मीर आया था। इसी दिन मोहम्मद शफी लोन की भी इस शक में हत्या की गई कि वह सुरक्षा बलों की मदद करते हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी पलायन और तालिबान के सत्तारूढ़ होने के बाद जिहादी तत्वों के नापाक मंसूबे फिर से परवान चढ़ रहे हैं। उसी का नतीजा कश्मीर में हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों की हत्याओं के रूप में सामने आ रहा है। इन हत्याओं के लिए पाकिस्तान और उसके समर्थित आतंकी संगठन तो जिम्मेदार हैं हीं, लेकिन उतने ही जिम्मेदार फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे संवैधानिक पदों पर रह चुके कश्मीरी मुस्लिम नेता भी हैं, जो तालिबानी उभार पर न सिर्फ सार्वजनिक रूप से खुशी जता चुके हैं, बल्कि भारत को यह धमकी भी दे रहे हैं कि जो अफगानिस्तान में हुआ, वह कश्मीर में भी होगा। वे उसी तालिबान के उदय से खुश हैं, जिसके नेता महमूद गजनवी की मजार पर जाकर सोमनाथ मंदिर पर उसके क्रूर हमले का महिमामंडन कर रहे हैं। यह कश्मीर के समाज और राजनीति का ऐसा नंगा सच है जिसे कश्मीरियत के ढकोसले की आड़ में ढकते रहना आतंकियों द्वारा मारे गए निर्दोष लोगों के साथ छल होगा। कश्मीर का एक हिस्सा इस्लामिक कट्टरपंथ का गढ़ बन चुके अफगानिस्तान-पाकिस्तान से उठने वाले मजहबी उन्माद के ज्वार से प्रभावित होता है। इसकी परिणति कश्मीर में गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसा में होती है।

आज जम्मू-कश्मीर मे हुए कश्मीरी पंडितो के नरसंहार को 29 साल बीत चुके है जब कश्मीरी हिन्दुओं को धर्मपरिवर्तन, पलायन या मरने के विकल्प दिए गए थे। आश्चर्य से अधिक मैं इस बात को सोचकर सिहर जाती हूं कि आखिर क्यों कश्मीरी हिंदुओं के अंजाम से भारत के प्रत्यके नागरिक ने सबक नही सीखा। दुनिया भर मे इस्लामी कटटरवाद के बारे मे चेतावनी भर संदेश क्यों नही फैलाया गाया। जबकि घाटी मे कटटरपंथियो का खूनी खेल चल रहा था। 4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि ‘सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड दें’। अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबार छापा, चौराहो और मस्जिदों मे लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि ‘पंडित यहां से चले जाए, नही तो बुरा होगा’, इसके बाद लोगों की लगातार हत्यायें और रेप जैसी घटनाए होने लगी। जगह-जगह नारे लगें कि पंडितो यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतो को यही छोड़ जाओ- (असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान), हमे कश्मीर चाहिए, पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ। कश्मीर मे इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया गया। मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकरों से यह नारा लगाया जाने लगा कि हम सब एक, तुम भागो या मरो। जगह- जगह मुस्लिमों द्वारा तरह-तरह के नारे लगवाए गए जैसे :

जागो जागो, सुबह हुई, रूस ने बाजी हारी है, हिंद पर दर्जन तारे है,

अब कश्मीर की बारी है,

हम क्या चाहते, आजादी

आजादी का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लाह अगर कश्मीर में रहना होगा, अल्लाहु अकबर कहना होगा,

ऐ जालिमो, ऐ काफिरों, कश्मीर हमारा है। यहां क्या चलेगा, निजाम-ए- मुस्तफा।

श्रालिव, गालिव या चालिव, हमारे साथ मिल जाओ, या मरो और भाग जाओ।

23 मार्च 2003 में पुलवामा जिले के नंदी मार्ग गांव में आंतकियों ने 24 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया जिसे नंदी मार्ग नरसंहार के नाम से जाना जाता है।

शोपिया जिले में नंदी मार्ग (अब पुलवामा) एक हिन्दू बहुल गांव था, जिसकी कुल आबादी मात्र 54 थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के पैतृक गांव से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में 23 मार्च, 2003 की रात सब तबाह हो गया। जब पूरा देश भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की याद में शहीद दिवस मना रहा था, तब नंदी मार्ग में हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा था। उस दिन 7 आतंकवादी गांव में घुसे और हिन्दुओं को चिनार के पेड़ के नीचे इकट्ठा करने लगें। और फिर इन 24 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी। गौर करने वाली बात यह है कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। मरने वालों में 70 साल की बुजुर्ग महिला से लेकर 2 साल का मासूम बच्चा भी शामिल था। क्रूरता की हद पार करते हुए एक दिव्यांग सहित 11 महिलाअें, 11 पुरूषों और 2 बच्चों पर बेहद नजदीक से गोलियां चलायी गयी। आतंकी यहीं नही रूके उन्होंने घरों को लूटा और महिलाओं के गहने उतरवा लिए। न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने इस घटना का जिम्मेदार ‘मुस्लिम आतंकवादियों को बताया। अमेरिका के स्टेटस डिपार्टमेंन्ट ने भी इसे धर्म आधारित नरसंहार माना था। उस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस के इंटेलिजेंस विंग को सभांल रहे कुलदीप खोड़ा ने भी कहा कि बिना स्थानीय सहायता के नंदी मार्ग  नरसहांर को अजांम ही नहीं दिया जा सकता था। इस प्रकरण में राज्य सरकार की भूमिका भी संदेह वाली बनी रही थी। ऐसा इसलिए क्योंकि घटना होने से पहले ही उस इलाके की सुरक्षा में लगी पुलिस को हटा लिया गया था। घटना से पहले वहां 29 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिनकी संख्या उस रात को घटाकर केवल 5 कर दी गयी। कश्मीर में विकास के दुश्मन है जिहादी जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए के खात्मे के बाद ही वहां हो रहे विकास कार्यों का आमजन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आम कश्मीरी के मन में उम्मीदों के साथ देश से जुड़ाव पैदा होने लगा है। इसका प्रभाव पिछले साल हुए जिला विकास परिषद के चुनावों में भी देखने को मिला, जिसमें लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी ली। पर्यटकों और उद्यमियों का आवागमन शुरू हो गया है! कश्मीर को लेकर शेष भारत के लोगों में भरोसा बढ़ रहा है। इस्लामिक जिहादियों का मकसद कश्मीर में हो रहे विकास को रोकना है और कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की योजना पर पानी फेरना है। जिसके चलते कश्मीर के अलगाववादी नेता तिलमिलाये हुए है और इसी कारण वे लोग खुल कर आतंकवादियों का समर्थन भी कर रहे है। टारगेट किलिंग के द्वारा वह फिर से गैर कश्मीरियों के मन मे वही 1990 का भय भरना चाह रहे है परन्तु वर्तमान सरकार के ऊपर जनता के भरोसे को देख कर स्वयं  अलगाववादी नेता खुद भय मे है ये स्पष्ट रूप से दिखाई भी देता है। कश्मीर की जनता समझ चुकी है कि वर्तमान सरकार आतंकवाद में नहीं बल्कि युवाओं के विकास हेतु रोजगार पर जोर दे रही है जो विकास का एकमात्र रास्ता है।

 


डॉ.
प्रीति

(लेखिका, अस्सिटेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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