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तुलसी महारानी नमो नम:

तुलसी महारानी नमो नम:

तुलसी भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। यह अनोखा बिरवा है। इसकी तुल्यता कोई अन्य पौधा नहीं कर सकता। ‘तुलसी’ शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ है- इसके तुल्य अन्य नहीं। इसे हिंदी में भी तुलसी ही कहा जाता है। इस के अन्य नाम हैं-  विष्णु वल्लभा,  वृंदा, हरि प्रिया, पावनी, बहू पत्री, श्यामा, त्रिदश मंजरी, माधवी, अमृता, सुर वल्ली इत्यादि। यह सभी नाम इसके गुणों को प्रकट करते हैं।

इसकी महिमा गीता, गंगा और गायत्री से भी बढक़र मानी गई है। अनेकानेक औषधि गुणों से भरपूर होने के कारण इसकी प्राचीन काल से ही पूजा होती आ रही है। इस को छूने, दर्शन तथा सेवन मात्र से ही जन्म जन्मांतरों के पाप मिट जाते हैं। जिस घर आंगन में इसका बेरवा है, उस घर में प्रत्येक आगंतुक को सवत: गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता है। वेदों में तो इसके बखान में यह भी लिखा गया है कि पृथ्वी को पूर्णतया सोने से ढक कर, उस सोने का दान देने से जो पुण्य अर्जित होता है, उससे कहीं अधिक पुण्य तुलसी का शालिग्राम से विवाह रचाने से प्राप्त किया जा सकता है।

जनमानस में तुलसी के महत्व की यह कथा भी प्रचलित है- एक बार सत्यभामा और  रुक्मणी में इस बात को लेकर कहा सुनी हो गई कि कृष्णा उनमें से किस से अधिक प्रेम करते हैं। सत्यभामा ने कृष्ण जी को तुला में तोलने की चुनौती स्वीकार दी जिसे रुक्मणी ने स्वीकार किया। परंतु समस्या तो तब हुई जब कृष्ण जी तुला के एक पलड़े में बैठे और सत्यभामा ने दूसरे पलड़े में धन संपत्ति डालनी शुरू की। तमाम धन-संपत्ति, हीरे- जवाहरात, धन-दौलत, सोना-चांदी डाल देने पर भी कृष्ण जी का पलड़ा टस से मस न हुआ। अब रुकमणी की बारी थी। उसने अपने आंगन से तुलसी का एक पत्ता लिया और दूसरे पलड़े में रख दिया। दोनों पलड़े तुलसी का पत्ता रखते ही बराबर हो गए।

तुलसी के जन्म से संबंधित ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह उल्लेख है कि भगवान विष्णु का शंखचूड़ नामक एक गन था। वह देवताओं को दुख पहुंचाने लगा। सभी देवता उसके विरुद्ध भगवान विष्णु को जा मिले। भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर शंखचूड़ को मार गिराया। इस पर शंखचूड़ की पत्नी तुलसी बहुत दुखी हुई। वह रोते-पीटते भगवान विष्णु के दरबार में जा पहुंची। तुलसी ने तुरंत भगवान को श्राप देते हुए कहा, ‘नारायण आप बड़े पत्थर दिल हैं। आप पत्थर ही हो जाओ।’ इस  श्राप को स्वीकार करते हुए विष्णु जी ने कहा, ‘हे देवी! तू भी तुलसी का बिरवा होकर मुझे ही प्राप्त होगी और तेरे बिना मेरी पूजा अधूरी ही रहेगी।’

भारत में यह मान्यता है कि जिस घर आंगन में तुलसी का पौधा है वह तीर्थ तुल्य और समस्त देवताओं का निरंतर निवास होता है।

तुलसी दो प्रकार की होती है एक के पत्ते हरे होते हैं और दूसरी के सांवले। मरुआ जाति के इस पौधे की ऊंचाई 1 मीटर से कम की होती है। यह कई बार छोटी झाड़ी का रूप ग्रहण कर लेता है। इसके पत्ते सर्दी-जुकाम-कफ नाशक, भूख को बढ़ाने वाले, फेफड़ों के रोगों और तपेदिक, दमा आदि रोग नाशक माने जाते हैं। इन्हें चाय, दूध अथवा पानी में उबाल कर दिया जाता है। मंदिरों में दिए जाने वाले चरणामृत में भी तुलसी रहती है। कई श्रद्धालु तुलसी की महीन लकड़ी की माला भी पहनते हैं। इसे तुलसी माला कहते हैं। तुलसी कंठी को तो महिलाएं प्राय पहनती हैं।

‘ना सुचिसंजम तुलसी माला’-  यह सबद श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सुशोभित है। हर भारतीय कबीर की भांति तुलसी के पौधों से घिरा रहना चाहता है-

आसपास तुलसी का बिरवा

माहिं द्वारका गांऊ रे।

तहां मेरा ठाकुर राम राय है

भगत कबीरानांऊ रे।

तुलसी की पूजा-अर्चना कार्तिक मास में विशेषतया की जाती है। तब इसके चारों ओर बैठी  स्त्रियां गाती है-

तुलसी महारानी नमो नम:

हर की पटरानी नमो नम:

पूजे हर नारी नमो नम:

तुलसां का पात मेरे घर बिराजे

कट गई जम की फांसी नमो नम:

तुलसी विशेष ध्यान की मांग करती है। यदि ऐसा न किया जाए तो यह पौधा जल्दी मुरझा जाता है। इसके पत्र झड़ जाते हैं।इसे नित्य निर्मल जल की आवश्यकता रहती है। पाले और कोहरे से बचाने के लिए इस पर चुनरी उड़ाना या इसे छत के नीचे रखना भी आवश्यक है। प्रत्येक भारतीय को तुलसी से प्रेम है। इसलिए बहुत सी औरतों का नाम तुलसां अथवा तुलसी और पुरुषों का नाम तुलसी चंद अथवा तुलसीदास होता है। रामचरितमानस ग्रंथ के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास भी इसी नाम से विख्यात हैं।

तुलसी का पूरा लाभ नहीं उठाया गया जा सका है। क्योंकि इसके गुणों की अब तक समुचित खोज नहीं की गई है। अब इसका सही वक्त आ गया है। इस ओर ध्यान देना  चाहिए।

 

 

 

डॉ. प्रतिभा गोयल

(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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