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कृषि कानूनों की वापसी के आगे-पीछे

कृषि कानूनों की वापसी के आगे-पीछे

टेलीविजन समाचार चैनलों ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए जिन कुछ शब्दों की खोज की है, मास्टर स्ट्रोक उन्हीं में से एक है। सिखों पंथ के संस्थापक गुरू नानक देव की की जयंती पर 19 नवंबर की सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में तीन कृषि कानूनों की वापसी का जो ऐलान किया, टेलीविजन चैनल ही नहीं, अखबारों की वेबसाइटों तक ने उसे मास्टर स्ट्रोक बताने में देर नहीं लगाई। लेकिन सोशल मीडिया और भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी गलियारों में जिस तरह की भाजपा समर्थकों की प्रतिक्रिया दिख रही है, वह प्रतिक्रिया इसके उलट है। सोशल मीडिया पर खुलेआम भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के समर्थक रहे सन्नी कुमार ने तंज में लिखा, ‘घबराना नहीं है साथियों। शाम तक कानून वापसी के लाभ वाले तर्क जारी कर देंगे। डटे रहो।’

जल्द ही सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी के कदम को ‘न भूतो न भविष्यति’ बताने वाले तर्कों की बाढ़ आ भी गई। सबसे मजेदार तर्क आया, ‘सिस्टम में रहने के लिए आपको सिस्टम में रहना होगा।’ स्पष्ट है कि कृषि किसानों की वापसी को जहां भारतीय जनता पार्टी के खेमे में सही ठहराने की कोशिश हो रही है, वहीं भाजपा के उन कट्टर समर्थकों को इसे पचाने में दिक्कत हो रही है। अगर सिस्टम वाले तर्क को ही स्वीकार कर लें तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पंजाब में भाजपा के जिन कार्यकर्ताओं को नंगा किया गया, जिन्हें जगह-जगह पीटा गया, वे अब क्या सोच रहे होंगे? जिस केंद्रीय नेतृत्व के कदमों के समर्थन की कीमत उन्होंने अपमान सहकर चुकाई है, क्या वे सिस्टम में बने रहने वाले तर्क को आसानी से स्वीकार कर लेंगे।

गुरूनानक जयंती के दिन प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए जो कहा, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘मैं देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से कहना चाहता हूं कि हमारे प्रयास में कमी रही होगी कि हम उन्हें समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक जी का पवित्र प्रकाश पर्व है। आज मैं आपको यह बताने आया हूं कि हमने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर देंगे। मेरी किसानों से अपील है कि अपने घर लौटें, खेतों में लौटें।’

राजनीतिक नजरिए और लोकतंत्र के तकाजे के हिसाब से देखें तो प्रधानमंत्री का यह फैसला उदार कदम माना जाएगा। इसकी प्रशंसा समाजवादी विचारक और नीतीश कुमार के कट्टर आलोचक प्रेमकुमार मणि ने की भी है। निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक राजनीति में निरंकुशता का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों को वापस लेकर एक तरह से यह संदेश देने की ही कोशिश की है कि आलोचकों की नजर में उनकी चाहे जो भी छवि हो, लेकिन वे निरंकुश नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब आपके सामने बक्कल खोलने की सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल करने वाली ताकत हो तो क्या किसी शासक की ऐसी उदारता कितनी उपयोगी हो सकती है। इटली के राजनीति विज्ञानी मेकियावेली कहते हैं कि शासक को इतना भी उदार नहीं होना चाहिए कि उदारता को उसकी कमजोरी माना जाए। किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राकेश टिकैत ने प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद जो कहा है, उससे यही साबित होता है कि उनके सामने किस स्तर का विरोधी है। राकेश टिकैत ने ट्वीट के जरिए अपनी शर्त रखने में देर नहीं लगाई। उन्होंने लिखा, ‘आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा। हम उस दिन का इंतजार करेंगे, जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा।’ टिकैत ने आगे नई शर्त भी जोड़ दी, ‘सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्यज के साथ-साथ किसानों के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत करें।’

यह भी याद करना चाहिए कि प्रधानमंत्री की घोषणा के एक दिन पहले ही टिकैत ने कहा था कि अगर उनकी बातें नहीं मानी जाएगी तो किसान संगठन सीएम योगी और पीएम मोदी को उत्तर प्रदेश में उतरने नहीं देगे। टिकैत की बातों से साफ है कि मास्टर स्ट्रोक कदम भी किसानों को संतुष्ट करने में कामयाब कम से कम शुरूआती स्तर पर तो नजर नहीं आ रहा।

भारतीय जनता पार्टी की तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि मोदी की घोषणा से एक साथ विपक्ष और किसान संगठनों के हाथ से मुद्दा छिन गया है। भाजपा समर्थक यह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने जरूर काफी सोच-विचार के बाद यह कदम उठाया है। लेकिन दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता यह कहते नहीं थक रहे कि उत्तर प्रदेश में आशंकित हार ने प्रधानमंत्री को डरा दिया। उनके इस तर्क की ही स्वीकारोक्ति भाजपा के उस तर्क के पीछे ढूंढ़ी जा रही है। भाजपा की ही ओर से तर्क दिया जा रहा है कि सिस्टम बदलने के लिए सिस्टम में रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी की अब तक की राजनीति पर जिन्होंने नजर रखी है, उन्हें पता है कि वे बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाते। अगले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनाव हैं। इनमें किसान आंदोलन का तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में ज्यादा असर है। भारतीय जनता पार्टी का जो कुछ भी दांव पर है, दो राज्यों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ही है। इसमें दो राय नहीं है कि मोदी की घोषणा का असर इन दो राज्यों पर ही पडऩा है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी की निगाह उस पंजाब पर भी है, जहां उसका कुछ भी दांव पर नहीं है। उसकी थोड़ी-बहुत उम्मीद कैप्टन अमरिंदर सिंह के कांग्रेस से अलग होने के बाद बढ़ गई है। भारतीय जनता पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी का अनाम रहने की शर्त पर कहना है कि जिस दिन अमरिंदर सिंह ने अमित शाह से मुलाकात की थी, उसी दिन आपसी बातचीत में उन्होंने मान लिया था कि अब कृषि कानूनों का अंत निकट आ गया है। माना जा रहा है कि पंजाब के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह और भारतीय जनता पार्टी में गठबंधन हो सकता है। चुनाव नजदीक आते ही टिकट ना मिलने से नाराज कांग्रेसी कैप्टन की ओर आएंगे और इसके साथ ही कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने की कोशिश बढ़ेगी। वैसे कृषि कानूनों के ही चलते भाजपा की पुराना सहयोगी शिरोमणि अकाली दल अलग हो गया था। वैसे तो उसका बहुजन समाज पार्टी से समझौता हो गया है, लेकिन ऐसी समझ विकसित हो रही है कि बदले हालात में अकाली दल की भी कैप्टन और भाजपा के गठजोड़ से समझ विकसित हो सकती है। यानी सदियों से लड़ाई का मैदान रहे पंजाब में कांग्रेस को चौतरफा घेरने की तैयारी है। उत्तर प्रदेश में जो जाट मतदाता छिटकते नजर आ रहे थे, भारतीय जनता पार्टी उम्मीद कर सकती है कि बदले हालात में वे भी भाजपा की ओर आ सकते हैं। हालांकि इस बार जाट स्वाभिमान का मुद्दा भी उछला नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश में इस स्वाभिमान के प्रतीक चौधरी चरण सिंह रहे हैं। उनके पोते जयंत सिंह को इस बार जाट समुदाय आगे लाने की कोशिश में है। इसलिए यह भी तय है कि बागपत के आसपास के जाट मतदाता राष्ट्रीय लोकदल का एकमुश्त समर्थन कर सकते हैं।

कृषि कानून वापसी का प्रधानमंत्री मोदी का फैसला चाहे जितना भी बड़ा मास्टर स्ट्रोक हो, लेकिन कुछ ऐसे सवाल हैं, जो भाजपा से ज्यादा उसके समर्थकों को असहज करते रहेंगे। केंद्रीय नेतृत्व की तर्ज पर भाजपा समर्थकों ने कृषि कानून विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोला। भाजपा के नेता किसान आंदोलनकारियों को आंदोलनजीवी और परोक्षरूप से आंतकवादी भी बताते रहे। वैसे किसान आंदोलनकारियों ने 26 जनवरी के दिन जिस तरह लालकिले पर आतंक बरपाया या दिल्ली की सीमाओं पर हंगामा किया, वह लोकतांत्रिक तरीका नहीं था। जाहिर है कि इसका विरोध करने वालों को उन जगहों पर अपमानित और प्रताडि़त किया गया, जिन जगहों पर किसान आंदोलनकारी ताकतवर और प्रभावी थे। जाहिर है कि अब उनके सामने चुनौती बड़ी हो गई है। जमीनी स्तर पर अपने विरोधियों का जवाब देना भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए भारी पड़ेगा। उन्हें इस सवाल का भी जवाब देना मुश्किल होगा कि जब कानून वापस ही लेने थे तो फिर एक साल तक अराजक किसान आंदोलनकारियों को झेला क्यों गया? वैसे किसान आंदोलनकारी भी सवाल पूछ रहे हैं कि क्या किसान आंदोलन के दौरान करीब छह सौ किसान मारे गए, उनके लिए जिम्मेदार कौन होगा।

प्रधानमंत्री की इस घोषणा का भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति पर भी असर पड़ेगा। यह संकेत जाएगा कि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर इस मामले को संभाल नहीं पाए। इस सोच को किसान आंदोलनकारी ही ताकत दे रहे हैं। राकेश टिकैत ने बहुत पहले ही सरकार को प्रस्ताव दिया था कि वह भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को मध्यस्थ बनाए। यहां यह भी याद कर लेना चाहिए कि राजनाथ सिंह पिछली वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री का भी दायित्व निभा चुके हैं। इससे राजनाथ सिंह की महत्ता बढ़ेगी, वहीं नरेंद्र सिंह तोमर पर नैतिक दबाव होगा।

अध्यात्म के संसार में किसी घटना को किसी की जीत या हार के संदर्भ में नहीं देखा जाता। वैसे लोकतंत्र का एक मतलब यह भी है कि व्यापक हित में कड़वी बात को भी हजम करना। इन अर्थों में देखें तो प्रधानमंत्री ने भारतीय लोकतंत्र के प्रमुख होने के नाते व्यापक हित में भी खुद और अपनी पार्टी को सवालों के घेरे में लाने वाला निर्णय लिया है। यह भी कहा जा सकता है कि कृषि कानूनों को वापस लेने के निर्णय से ना तो किसानों की जीत हुई है और ना ही सरकार की हार हुई है। क्योंकि किसानों का एक बड़ा हिस्सा इस आंदोलन के विरोध में भी था। भारतीय किसान यूनियन (भानु) को भी आंदोलन के समर्थक के तौर पर नहीं देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी के फैसले के बाद इस यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भानुप्रताप सिंह ने जो कहा है, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा है, ‘मैं इस कदम का स्वागत करता हूं। 75 साल से किसान विरोधी नीतियों के चलते कर्ज के कारण किसानों की मौत हो गई। मैं प्रधानमंत्री मोदी से एक कृषि समिति बनाने और फसल की दरें तय करने का आग्रह करता हूं। आज की घोषणा की तरह ही किसानों का कर्ज एक दिन में माफ हो।’

प्रधानमंत्री की घोषणा की मीमांसा होती रहेगी। आंदोलन समर्थक इसे अपनी जीत नहीं बताएंगे तो ही हैरत होगी। वहीं भाजपा समर्थकों की निराशा भी स्वाभाविक है। इस घोषणा का सबसे पहला असर पंजाब में ही दिखेगा। लेकिन इस ऐलान का फायदा कौन उठा पाता है, वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसे देखने के लिए हमें आगामी पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों का इंतजार करना होगा।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

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