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यूपी 2022 के बनते समीकरण

यूपी 2022 के बनते समीकरण

आबादी की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव-2022 के लिए सभी राजनीतिक दल मैदान में आ चुके हैं। लोकसभा की 80 सीट देने वाला प्रदेश का चुनावी परिणाम यूपी के साथ राष्ट्रपति और 2024 के लोकसभा के चुनाव का भविष्य भी तय करेगा। सटीक शब्दों में कहूं तो यूपी चुनाव का परिणाम देश की दिशा और दशा दोनों तय करेगा। वैसे तो यूपी विधानसभा चुनाव सभी दलों के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा पर जैसे क्लास के टॉपर पर परीक्षा पास करने के साथ शीर्ष पर रहने का अतरिक्त दबाव भी होता है ठीक उसी प्रकार सत्तारूढ़ पार्टी पर पुन: सत्ता में लौटने का अतरिक्त दबाव होगा, जो उसके पांच वर्षों में किए गए कार्य तय करेंगे।

यूपी के सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी द्वारा हिंदू आस्था की प्रतीक धर्मस्थल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण (भले ही राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हो रहा परंतु वास्तव में इस फैसले में बीजेपी पार्टी का महत्वपूर्ण योगदान है) के साथ-साथ प्राचीन धर्म नगरी बनारस में बाबा काशी विश्वनाथ और चित्रकूट में किये जा रहे विकास कार्यों पर एक विशेष वर्ग के वोट का लाभ तो मिलेगा ही पर इसके साथ दिन प्रतिदिन बढ़ रही महंगाई, बेरोजगारी, इत्यादि का खामियाजा भी उठाना पड़ सकता हैं। जैसा कि हम सब जानते है की योगी ने अपने इस पांच वर्षीय कार्यकाल में कोरोना जैसी महामारी में काफी मेहनत किया पर उनके इस मेहनत में उनके साथ उनके मंत्रिमंडल टीम के ज्यादातर सदस्य नदारद दिखे। जिसका खामियाजा हमने गंगा में तैरती हुई लाशे और आक्सीजन और दवा के कालाबाजारी के रूप में देखा (सिर्फ यदि सरकारी आंकड़ों में बात करें तो सरकार यहां भी कामयाब दिखी पर धरातल के वास्तविकता पर गौर करेंगे तो नजारे कुछ और ही दिखे था)। सरकारी नौकरी में पादर्शिता, चिकित्सा के क्षेत्र में 59 नए अस्पताल, प्रदेश में पांच नए इंटरनेशनल एयरपोर्ट इत्यादि उपलब्धियों के साथ सरकार ने गुंडा-राज, भू-माफिया पर जितनी अपनी नकेल कसी रखी उतनी ही सरकार कानून व्यवस्था कायम करने में बेहाल भी दिखी। जिसका उदाहरण हमने हाथरस में एक दलित लड़की के बलत्कार के बाद रातों रात उसके शव दहन कर मामले की लीपापोती, लखीमपुर में अन्नदाताओं को बेरहमी से कुचलना, व्यापारी मनीष गुप्ता की ह्त्या, पंचायत चुनाव में सरेआम एक नारी के चीरहरण का प्रयास इत्यादि रूप में देखे।

इन सब के साथ कही न कही बढ़ती महंगाई, निजीकरण, केंद्र सरकार के कृषि विधेयक कानून से किसानों की नाराजगी (यूपी में खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में) इत्यादि मुद्दे को लेकर विपक्ष चुनावी लाभ लेने का भरपूर प्रयास करेगा, और सरकार की इन मुद्दों पर विफलता उसके वोट बैंक के ग्राफ को नीचे ला सकते है।

बात यदि विपक्ष की आती है तो यूपी में दमदार विपक्ष की भूमिका में समाजवादी पार्टी (सपा) नजर आ रही है। महान दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के के मुखिया ओमप्रकश राजभर (राजभर आबादी लगभग चार फीसदी परन्तु 403 विधानसभा सीटों में सौ से अधिक सीटों पर राजभर समाज का ठीक-ठाक वोट है। वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया, मऊ सहित पूर्वांचल के अन्य कई  जिलों के सीटों पर इनका वोट लगभग 18 से 20 प्रतिशत है जो किसी भी विधानसभा सीट के परिणाम को बदलने की हैसियत रखता है। अखिलेश यादव के पार्टी सपा के लिए सबसे बड़े सिरदर्द उनके चाचा शिवपाल यादव और बिहार विधानसभा में 5 सीट जितने वाली असदुद्दीन औवेसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन है। एक तरफ जहां शिवपाल सपा के मूल वोटों को प्रभावित करेंगे वही दूसरी तरफ औवेसी की पार्टी भी प्रदेश के 19 प्रतिशत मुसलमानों का एकाकीकरण नहीं होने देगी जो कभी कांग्रेस और सपा के मूल वोट हुआ करते थे। औवेसी ने लगभग सौं सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है यदि ऐसा होता तो मुस्लिम वोट भी कई भाग में बंट जाएगा। जिसका सीधा फायदा बीजेपी को और नुकसान सबसे ज्यादा सपा को होगा। अत: यदि अखिलेश को मजबूती से मैदान में लडऩा है तो चाचा शिवपाल के घर (सपा में) वापसी के साथ-साथ औवेसी और रालोद दोस्ती भी रखनी होगी सुभासपा एवं महान दलों को साथ लेकर।

कभी प्रदेश के 20 प्रतिशत दलित वोट पर एकछत्र राज्य करने वाली यूपी की चार बार सीएम रही मायावती आजकल सक्रिय राजनीति से नदारद दिख रही हैं। अब दलितों को कही न कहीं भीम आर्मी पार्टी बसपा की विकल्प के रूप में दिख रहा है, क्यूंकि उन्हें भी बसपा का गिरता राजनीतिक ग्राफ दिख रहा है कि कैसे 2007 में विधानसभा में पूर्ण बहुमत वाली बसपा अब 19 सीटों पर सिमट गई। मायावती के बाद बसपा में दूसरे नंबर के नेता कहें जाने वाले सतीश मिश्रा इस बार फिर प्रदेश में 13 प्रतिशत ब्राह्मण को रिझाने कि पूरी कोशिश करेंगे पर अबकी सभी राजनीतिज्ञ दलों कि निगाहें ब्राह्मण मतदाताओं पर टिकी है और येन केन प्रकारेण उन्हें अपने पक्ष में करने में जुटे है।

उत्तर प्रदेश को 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री देने वाली पार्टी कांग्रेस साल 1989 से उत्तर प्रदेश में सत्ता का वनवास झेल रही है, कांग्रेस महासचिव प्रियंका ने टिकट बंटवारें में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं प्रत्याशियों को टिकट देने की बात और ‘लड़की हूं-लड़ सकती हूं’ के नारे बेशक महिलाओं में एक जोश भरेगा परंतु यूपी में कांग्रेस के जनाधार के आधार पर ये कह सकते है कांग्रेस सत्ता के लड़ाई में कहीं नजर नहीं आ रही हैं परंतु प्रियंका के सक्रिय होने से पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार कांग्रेस के वोटों में कुछ प्रतिशत की बढ़ोतरी जरूर हो सकती है।

कुल मिलकर यूपी के विधानसभा चुनाव 2022 में मुख्य लड़ाई भाजपा और सपा के बीच ही होनी है। जहां सपा अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन के बाद मजबूत नजर आ रही है वही भाजपा अकेले अपने दम पर इस लड़ाई में मजबूत टक्कर दे रही है, इसका एक कारण ये भी है की भाजपा की मार्केटिंग काफी अच्छी है, तभी तो आए दिन बढ़ती महंगाई के बाद भी बीजेपी ने जनता के बीच अपनी पकड़ और छवि बरकरार रखी है। अपने अनुभव के आधार पर इतना कहूंगा से कि हर बार की तरह इस बार भी  उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में विकास से ज्यादा जाति-धर्म के समीकरण को ज्यादा प्राथमिकता दिया जायेगा।

 

अंकुर सिंह

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