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ड्रग्ज+बॉलीवुड+अंडरवल्र्ड+राजनीति : ताजा नस्लों को पंगु बनाने की साजिश

ड्रग्ज+बॉलीवुड+अंडरवल्र्ड+राजनीति : ताजा नस्लों को पंगु बनाने की साजिश

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि बॉलीवुड और ड्रग्ज का रिश्ता चर्चित, एवं विवादास्पद अभिनेता संजय दत्त की पहली फिल्म रॉकी के आस-पास का है। हालांकि कहा यह भी जाता रहा कि संजय दत्त नौ साल की उम्र में अपने  पिता प्रख्यात अभिनेता स्व. सुनील दत्त द्वारा बाथरूम में सिगरेट पीते हुए पकड़ लिए गए थे। फिल्मों के अलावा सुनील दत्त ने राजनीति में भी नाम कमाया। इसी बीच उन्होंने दिवंगत अभिनेत्री नरगिस से विवाह भी कर लिया था जिसके कारण उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद लग गए थे। नरगिस को कांग्रेस ने राज्यसभा में भी भेजा था, लेकिन कैंसर के कारण नरगिस का असमय स्वर्गवास हो गया। संजय दत्त कई इंटरव्यूज में कह चुके हैं कि उन्हें नशीली दवाओं की लत अपनी मां की उक्त गम्भीर बीमारी के दौरान लगी थी, जिसे छोडऩे में उन्होंने पूरी मेहनत तो की, लेकिन इस दौरान उनके अच्छे भले करियर के कुछ साल बर्बाद हो गए। दूसरी तरफ उनके सहित पूरे परिवार की छवि को जो अकथनीय नुकसान पहुंचा, सो अलग। उन्हें मीडिया ने नशेड़ी तक कहा, क्योंकि वे शराब का सेवन भी करने लगे थे। ड्रग्ज एडिक्ट होने के कारण उनकी मनोदशा इतनी बिगड़ गई थी कि वे मुंबई में देर रात को अपने घर की छत से हवाई फायर करके अन्य रहवासियों को परेशान किया करते थे, जिसकी शिकायत पुलिस में भी की गई थी। कहा तो यहां तक जाता है कि ड्रग्ज और बंदूकों के इस शौक ने उन्हें अंडरवल्र्ड से जोड़ दिया था। यानी ड्रग्ज की घुसपैठ भले संजय दत्त के मार्फत बॉलीबुड में सीधे-सीधे नहीं हुई हो, लेकिन अंडरवल्र्ड को यह मालूम पड़ ही गया था कि बॉलीवुड ड्रग्ज या काले सफेद सोने की खपत का मुकम्मिल सेंटर हो सकता है।

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हमारी जवान नस्लों पर इधर के कुछ सालों में फिल्मी हस्तियों की जीवनचर्या का असर बढ़ता ही जा रहा है। उच्च वर्ग की जानें भी दें, तो मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में भी कोविड 19 की महाबला के बावजूद रेखांकित किए जाने वाला इजाफा हुआ है। माना जाता है कि इस कारण से भी देश के कई हिस्से उड़ता पंजाब या उड़ता इन्दौर बन गए हैं। एक हौलनाक आंकड़े के अनुसार भारत में चार करोड़ से ज्यादा लोग ड्रग्ज एडिक्ट हो चुके हैं, जो ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित और सम्पन्न देश की कुल आबादी से दो गुणा अधिक है। और इनमें भी 18 से 35 आयु वर्ग के लोग लगभग 82 प्रतिशत हैं। सोचिए कितना विकट, जटिल, अफसोसनाक और शर्मसार करने वाला दौर है यह लेकिन ले देकर मीडिया ही यह मुद्दा बार-बार उठाने की जहमत उठाता है। न, तो समाज और राजनेताओं को जहरीले कारनामे की चिंता है। महाराष्ट्र सरकार के काबीना मंत्री जनाब नवाब मलिक की यह परेशानी नहीं है कि कल को उनके सुपुत्र (भगवान करे ऐसा कभी न हो) को भी ऐसी लत लग सकती है। लेकिन वे, तो समीर वानखेड़े के लत्ते बिखेर रहे हैं, जबकि जमाना जानता है कि नवाब मलिक साहब दरअसल कबाड़ का धंधा करते-करते इतनी ऊंचाई पर पहुंचे। कई गम्भीर आरोप उन पर भी  चस्पा हैं। संजय दत्त खुद कहते रहे हैं कि नशे का आदी व्यक्ति दोस्ती, यारी, सम्बंध, बुरा, भला भूल चुका होता  है। उक्त अभिनेता के अंडरवल्र्ड से रिश्तों के सबूत पुलिस को मिले। यहां तक की अतिआधुनिक हथियार घर में छिपाकर रखने, और दूसरे आरोपों के चलते उन्हें चार साल से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा। उन्होंने एक बार खुद यह माना था कि वे एक बार चुपके से एक किलो नशा अपने जूतों में छिपाकर जम्मू-कश्मीर ले गए थे। जब संजय को उपचार के लिए अमेरिका ले जाया गया था, तब डॉक्टर्स ने उन्हें विभिन्न ड्रग्ज की लिस्ट देते हुए पूछा था, इनमें से कौन-कौन सी ड्रग ले चुके हो? संजय ने सभी  ड्रग्ज पर जब हां का टिक मार्क कर दिया, तो डॉक्टर्स से पूछे बिना नहीं रहा गया कि फिर अब तक आप जिंदा कैसे हैं? जान लें कि प्रमुख ड्रग्ज में एल.एस.डी. हीरोइन, कोकीन, चरस, गांजा, अफीम, और कुछ अन्य नाम भी आते हैं।

कहा जाता है कि इनमें से अधिकांश ड्रग्ज का उत्पादन अफगानिस्तान उर्फ तालिबान  द्वारा किया जाता है, क्योंकि दुनिया की 80 से 90 फीसद अफीम अफगानिस्तान में ही पैदा होती है। वहीं पर इसका प्रोसेस करके उक्त नशीली दवाओं को विभिन्न स्रोतों से गतंव्य तक पहुंचाया जाता है। कहा जाता है कि संजय दत्त, तो खैर शिवसेना के वरदहस्त, और कानूनी सूराखों की वजह से बच गए। माना जाता है कि नशे का उन्होंने नाश कर दिया है, लेकिन कई लोगों को आज तक यह समझ में नहीं आ पाया कि उनकी बायोपिक पर संजू फिल्म क्यों बना दी गई? एक थ्योरी यह भी है कि उक्त नशे की बॉलीवुड से हल्की सी जान पहचान सत्तर के दशक के आस पास ही हो गई थी। दरअसल प्रख्यात निर्माता-निदेशक, और अभिनेता स्व. देवानंद ने एक फिल्म बनाई थी हरे रामा, हरे कृष्णा। इस मूवी में जीनत अमान को एक बागी हिप्पी ड्रग एडिक्ट के रूप में पेश किया गया था। फिल्म बहुत फली-फूली, लेकिन फिल्मी दुनिया को जाने-अनजाने में आज तक लगाम न कसने न वाला ड्रग्ज का विषैला विषय दे गई। देवानन्द की इस फिल्म को लेकर कहा गया था कि समाज और देश के प्रति हरदम समर्पित रहे इस फिल्मकार को न जाने क्या हो गया था कि ऐसे संवेदनशील विषय पर फिल्म पर ऐसी गुमराह कर देने वाली फिल्म बना डाली। तब फिल्म क्रिटिक्स ने ताने कसे थे कि देव साहब की नीयत पर सवाल करना गलत होगा, लेकिन उनसे सबसे बड़ी गलती यह हो गई कि उन्होंने नशेड़ी होने को एक तरह से ग्लोरीफाई कर दिया, क्योंकि उक्त फिल्म कोई सकारात्मक संदेश तो दे नहीं पाई। उल्टे आधुनिकता, फैशन और देखादेखी को केंद्र में रखकर युवा ड्रग्ज के लिए गम्भीर अपराध तक करने लगे। बड़ी तकलीफ से लिखना पड़ रहा है कि जिस अभिनेता और फिल्मकार की पहचान जिंदगी के अंतिम पल तक जिंदगी से रोमांस करते रहने की रही, वह नशेडिय़ों को केंद्र में रखकर फिल्में बनाने का शिखर पुरूष हो गया, जिसकी इतनी नकल की गई कि कहा जाने लगा कि प्रत्येक तीन फिल्मों में से एक फिल्म में ड्रग्ज का मसाला, तो मिलाया ही जाने लगा। रेखांकित की जाने वाली बात यह कही जाती है कि देव साहब शराब तो क्या सिगरेट तक को छूते नहीं थे, और नियम के इतने पक्के थे कि रात दस बजे सोने चले जाते थे। कहते हैं बिग टाउन में शराब, तो चिर काल से पानी की तरह पी जाती रही है। जब गालिब ही गम भुलाने के लिए शराबनोशी की वकालत कर गए तो महात्मा गांधी की कौन सुने। दरअसल, ड्रग्ज पर बनी अधिकांश फिल्में अंडरवल्र्ड के लिए बहुत कम लागत और कम श्रम के कमाई का कभी न खत्म न होने वाला कुंआ बन चुकी है, जिसमें राजनेता कभी चाहकर, तो कभी अनचाहे हाथ बंटाते हैं। ड्रग्ज का ऐसा जादू चलता है कि आदमी एक ऐसी दुनिया की सैर सपाटे पर निकल जाता, जो उसे जन्नत लगती। वैसे ड्रग्ज का स्वर्ग गोवा को कहा जाता है, हालांकि कहा तो यहां तक जाने लगा है कि अब तो जर्रा-जर्रा ड्रग्ज के आगोश में आने लगा है। सिर्फ ड्रग्ज को केंद्र में रखकर 2013 में गो गोवा गॉन मूवी बनी थी, लेकिन वह फिल्म भी सोच बदलने की दिशा में पहल करती नहीं दिखाई दी।

इस सबसे पहले प्रख्यात हीरो और अभिनेता स्व. फिरोज खान के पुत्र फरदीन खान को ड्रग्ज के साथ पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा गया था। एक जमाना ऐसा भी आया था, जब स्व. अभिनेता इफ्तिखार, जो पुलिस अधिकारी के रूप में ही जंचते थे, अक्सर अपनी फिल्मों में अपने अधीनस्थ अमिताभ बच्चन या स्व. शशि कपूर को एक बड़े ड्रग्ज रैकेट की फाइल कार्यवाही के लिए पकड़ाते नजर आते थे। गौर करें कि ऐसे वक्त उनका यह डायलॉग जरूर होता था कि इन ड्रग्ज के काले कारोबारियों को धरना किसी भी कीमत पर इसलिए जरूरी है कि ये ड्रग्ज की लत लगाकर हमारी युवा पीढ़ी को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। दम मारो दम फिल्म भी आई थी, जिसमें अभिषेक बच्चन के साथ राज बब्बर, और स्व. स्मिता पाटील के पुत्र प्रतीक  बब्बर भी थे। प्रतीक को नशे की ऐसी लत लग गई थी कहते हैं उन्हें अक्सर नशा मुक्ति करण केन्द्र ले जाना पड़ता था। दो फिल्में जरूर दर्शकों को याद रहीं। पहली, फैशन, जिसमें प्रियंका चोपड़ा के साथ कंगना रानोत दिखाई दी थीं! फिल्म हिट रही। इसी बीच मधुर भंडारकर ने करीना कपूर, कैटरीना और शाहिद कपूर के साथ उड़ता पंजाब फिल्म बनाई थी, जिसके नाम से जाहिर हो गया था सबसे ज्यादा नशेड़ी पंजाब में ही हैं। मधुर भंडारकर ने ड्रग्ज प्रोसेसिंग की फैक्ट्रीज भी दिखा दी थीं।

माना जाता है कि नारकोटिक्स विभाग को भी राजनेताओं के आगे ही झुकना पड़ता है। फिर तालिबान के अस्तित्व में आने कारण, तो कहा जाता है कि बरास्ता पाकिस्तान ड्रग्ज खुलकर भारत में भेजी जाने लगी है। नोट करें कि आर्यन खान की गिरफ्तारी के पहले ही गुजरात के कच्छ जिले के कुंद्रा बंदरगाह पर लगभग तीन हजार किलोग्राम हीरोइन जब्त हुई थी। अभी तक की पकड़ी गई यह ड्रग्ज की सबसे बडी खेप बताई जाती है, लेकिन जिस कम्पनी का उक्त जहाज था, उस कम्पनी के हाथ, तो सरकारों से भी ऊंचे हैं। शायद, इसीलिए तुलसीदास ने सदियों पहले ही अलार्म बजा दिया था, समरथ का दोष नहीं गोसाई।

 

नवीन जैन

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