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त्यौहारों पर असमाजिक होती दुनिया!

त्यौहारों पर असमाजिक होती दुनिया!

इस बार दिवाली पर सोशल मीडिया पर आए एक संदेश ने सोचने पर मजबूर कर दिया। संदेश यह था कि ‘सुबह से संदेशे तो बहुत आए, लेकिन मेहमान कोई नहीं आया। सोचता हूं कि ड्राइंग रूम से सोफा हटा दूं और वहां स्टडी रूम बना दूं!’ इसी संदेश की अंतिम लाइन थी ‘इस दीवाली जरा इस सवाल पर गौर कीजिए, एक दोस्त के घर हो आइए … अगले साल आपके घर भी कोई आने लगेगा!’ वास्तव में ये महज संदेश नहीं, एक गंभीर पीड़ा और सोच भी है कि अब दिवाली पर लोगों के घर जाकर मिलने-जुलने का रिवाज खत्म होने लगा। कारण सिर्फ कोरोना ही नहीं, घटती आत्मीयता भी है। सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने लोगों को असमाजिक बना दिया। आसपास रहने वाले पड़ोसी अगर त्यौहारों पर एक-दूसरे के घर आना-जाना छोड़ दें, तो त्यौहार के उत्साह के साथ आत्मीयता भी खत्म हो जाएगी।

दिवाली से पहले सोशल मीडिया के सारे संदेशों वाले एप पर सुबह से ही शुभकामनाओं के संदेश आने लगते। पर्सनल दोस्तों के अलावा वर्चुअल दोस्तों के आत्मीय संदेशों से मोबाइल फोन की गैलरी भर जाती! मन में ऐसा लगता कि लोगों में कितनी आत्मीयता है और हमारे आसपास दोस्तों की कमी नहीं है। लेकिन, कुछ ही दिनों में ये भ्रम टूट गया। दिवाली जैसे त्यौहार पर कोई मिलने तक नहीं आया। दु:ख इसलिए ज्यादा होता है कि हमेशा की तरह ड्राइंग रूम ठीक किया। सोफे के नए कवर बदले, नए परदे लगाए गए। कुछ मिठाई घर पर बनाई, कुछ बाजार से मंगवाई, पर सारी तैयारी धरी रह गई। दूर के मिलने वाले तो ठीक आसपास के लोग भी बाहर से मिलकर चले गए। ये कोरोना इफेक्ट था या त्यौहारों के प्रति बढ़ता रूखापन ये समझ से परे है।

अब वे दिन नहीं रहे जब त्योहारों से पहले पूरा घर मिलकर घर को सजाने का काम करते थे। हफ्तेभर पहले प्लानिंग होती थी कि इस बार रसोई में क्या बनेगा और क्या सामान बाहर से लाया जाएगा! घर से बाहर उत्सव मनाने और पूरे परिवार के साथ घूमने और खाने-पीने के कार्यक्रम को अंतिम रूप दे रहे हैं। रिश्तेदारों से मिलने-जुलने और उनके यहां क्या लेकर जाना है, इस पर बातें होती, पर अब वे सारे दिन सिर्फ यादें बनकर रह गई। आखिर यह त्यौहार ही तो है, जो आपको पूरे परिवार के साथ जोड़ देते हैं। आप दिनभर सोशल मीडिया पर दोस्तों से जुड़े रहते हैं! लेकिन, असली सोशल लाइफ तब है, जब असल में लोग मिले, बैठे और बात करें! आपस में मिलना ही सोशल है, बाकी सब असमाजिक!

अब तो पारिवारिक बातचीत के लिए भी सोशल मीडिया पर फैमिली ग्रुप बनने लगे। लोग रिश्तेदारों के घर आने-जाने के बजाए ग्रुप पर ही संदेश देने लगे। लेकिन, इसमें भी लोग त्योहार पर शुभकामना संदेश फॉरवर्ड करके खुश होते हैं। इसी पर लोग मौसी, बुआ, मामा का हालचाल पूछते हैं और आने का वादा तक कर डालते हैं। लेकिन, अब कोई आता-जाता नहीं! लोगों को अपने दोस्तों के ग्रुप पर चैट से फुरसत नहीं मिलती, पर पारिवारिक आत्मीयता खो गई। जबकि, हमारे संस्कार और संस्कृति में त्योहारों का अपना अलग महत्व है। इन्हें सेलिब्रेट करने में पूरा परिवार साथ होता है। सभी मिलकर नए कपड़ों और अच्छे खाने की बात करते हैं। तकनीक की दुनिया और वर्चुअल कनेक्टिविटी के इस दौर में त्यौहारों पर घरवालों के नजदीक आना बहुत अच्छा लगता है और यही हमारी भारतीय संस्कृति को दर्शाता है। लेकिन, सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में संस्कृति और संस्कार खो गए।

हमारे शास्त्र हमें शिक्षा देते रहे हैं कि त्यौहार सिर्फ कलेंडर में दर्ज तारीख नहीं है, बल्कि नए सृजन की उम्मीद है। जहां उम्मीद होती है जीवन उसी और यात्रा पर निकलता है। दीपावली हो या होली हो या कि ईद हो ये सभी त्यौहार मुकम्मिल तरीके से मनाए जाएं तो सम्भव है जीवन उत्सव बन जाए।

रेणु जैन

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