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आखिर सड़क हादसों पर नियंत्रण कैसे संभव?

आखिर सड़क हादसों पर नियंत्रण कैसे संभव?

एक रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि भारत में सड़क हादसों में लगातार इजाफा हो रहा है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में सड़क हादसों की कुल संख्या 449002 थी। जबकि 2018 में यह आंकड़ा 467044 और वर्ष 2017 में 464910 था। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सड़क हादसों के चलते होने वाली मौतों की अधिकतम संख्या की मुख्य वजह वाहनों की गति का तेज होना रही है। वहीं गैर सरकारी संगठन इंडिया विजन संस्थान के 2020 के अध्ययन पता चला है कि 40 फीसद व्यावसायिक वाहन ड्राइवर दृष्टिदोष की समस्या से ग्रस्त है। 2019-20 में 12 राज्यों में 15 हजार ड्राइवरों की जांच में 40 फीसद को धुंधला दिखाई देने की शिकायत मिली, जबकि 30 हजार ट्रक ड्राइवरों से पूछताछ से पता चला है कि उन्होंने कभी आंख की जांच नहीं कराई। अध्ययन में दावा किया गया है कि हर चौथा ड्राइवर दृष्टिदोष का शिकार है और उसे सड़क पर 20 से 30 मीटर की दूरी पर स्पष्ट नजर नहीं आता है। ऐसे में दृष्टिदोष भी सड़क हादसों को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है जो कि बेहद चिंताजनक है।

ऐसे में, आम-आदमी के मन-मस्तिष्क में सवाल उठता है कि इन सड़क हादसों की संख्या में लगातार होती वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए सरकार द्वारा क्या-क्या प्रयास किए जा रहे हैं? यदि प्रयास किए भी गए हैं तो सड़क हादसों में लगातार इजाफा क्यों हो रहा है? सड़क हादसों पर अंकुश लगाने की दिशा में हाल में केंद्र सरकार ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए ट्रक-बस ड्राइवरों का दृष्टिदोष दूर करने के लिए राष्ट्रव्यापी मेगा नेत्र जांच शिविर श्रृंखला शुरू करने का फैसला किया है। इसमें सरकारी और गैर सरकारी संगठनों का सहयोग लिया जा रहा है। इसके अंतर्गत शहरों और कस्बों में राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे व्यावसायिक वाहन ड्राइवरों की नेत्र जांच कर नजर के चश्मे दिए जाएंगे। बता दें कि ये जांच शिविर लगाने की श्रृंखला आगामी जनवरी से शुरू हो जाएगी। वहीं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सड़क हादसों पर अंकुश लगाने की मंशा के साथ मसौदा तैयार किया है। मंत्रालय ने मसौदे में इस बात का जिक्र किया है कि दोपहिया चालक यह सुनिश्चित करेगा कि पीछे बैठने वाले नौ महीने से चार साल के बच्चे को क्रेश हेलमेट पहनाया गया हो। मंत्रालय द्वारा जारी मसौदा अधिसूचना के अनुसार, चार साल तक के बच्चों को ले जाते वक्त मोटरसाइकिल की गति 40 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए। मंत्रालय ने आगे कहा कि मोटरसाइकिल का चालक यह सुनिश्चित करेगा कि चार साल से कम उम्र बच्चों को अपने साथ बांधे रखने के लिए सेफ्टी हार्नेस का इस्तेमाल किया जाए। बता दें कि सेफ्टी हार्नेस बच्चे द्वारा पहना जाने वाला एक ऐसा जैकेट होता है, जिसके आकार में फेरबदल किया जा सकता है। उस सुरक्षा जैकेट से जुड़े फीते इस तरह से लगे होते हैं कि उसे वाहन चालक भी अपने कंधों से जोड़ सकते है।

इसके अतिरिक्त सरकार को सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी प्रयासों को तेज करने की दरकार है। सरकार को नियमित तौर पर सड़क हादसों पर नियंत्रण के लिए प्रयासरत रहना होगा। इसके बिना सड़क हादसों पर नियंत्रण संभव नहीं हो सकेगा। सरकारी प्रयासों के साथ-साथ जन जागरूकता एक बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है। सड़क हादसों पर नियंत्रण के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में इस विषय को जोड़ा जाना चाहिए। जैसा कि सड़क सुरक्षा का दायित्व प्रत्येक नागरिक का है। लिहाजा बच्चों के साथ परिवार में सभी सदस्यों को यातायात नियमों से जुड़ी जानकारी होनी चाहिए। यह सच्चाई है कि प्रति वर्ष सड़क दुर्घटना में बड़ी तादाद में लोग असामयिक मौत के शिकार हो जाते हैं। इसके पीछे स्पीड ब्रेकर, सड़कों का खराब होना, वाहनों की फिटनेस पर ध्यान न देना, सड़कों का उचित रखरखाव न होना जैसी वजह रही हैं। लेकिन देशभर में ऐसी कई घटनाएं सामने आई है कि बाइक के चालकों द्वारा स्टंट के चलते दूसरों की जिंदगी को खतरे में डाले जाने की खबरें भी सामने आती रही है। इस तरह वाहन चलाने वालों पर अंकुश लगाने के लिए अभिभावकों के साथ-साथ पुलिस प्रशासन को भी ध्यान देना होगा। इसके अलावा वाहन चालकों को पर्याप्त प्रशिक्षण की व्यवस्था जरूरी हो जाती है। यह देखा गया है कि यातायात नियमों का ध्यान में न होने के चलते भी हादसे हो रहे हैं। इसके लिए चालकों को पर्याप्त प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना जरूरी है। सड़क हादसों पर नियंत्रण के लिए सख्ती के साथ यातायात नियमों का पालन जरूरी है। साथ ही अधिक भीड़़भाड़ वाले शहरों में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ तथा ओवर ब्रिज हो। वहीं ट्रैफिक सिग्नलों का आधुनिकीकरण किया जाए। इन सभी प्रयासों के बलबूते ही सड़क हादसों पर नियंत्रण संभव हो सकेगा। इसके बिना नियंत्रण संभव नहीं है।

 

अली खान

 

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