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बीमार विपक्ष

बीमार विपक्ष

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के यह कहने के साथ कि अब यूपीए का वजूद नहीं है, कांग्रेस में राजनीतिक तूफान चल रहा है। ममता की  महत्वाकांक्षाएं 1 दिसंबर को प्रकट हुईं, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख, शरद पवार से मिलने  के बाद उन्होंने 2004 से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन के अंत की घोषणा की। उन्होंने राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के लिए उनकी आलोचना की। सोनिया गांधी द्वारा इस टिप्पणी को बहुत विनम्रता से नहीं लिया जाएगा और टीएमसी और कांग्रेस के बीच तालमेल की संभावना को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया है। सोनिया परिवार और ममता बनर्जी के बीच की यह लड़ाई वास्तव में इस मूल प्रश्न को लेकर है कि असली कांग्रेस कौन सी है? सोनिया परिवार अपनी कांग्रेस को असली कांग्रेस बता रहा है और ममता बनर्जी अपनी कांग्रेस को असली कांग्रेस बता रही है। लेकिन एक प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि ममता बनर्जी तो कांग्रेस के एक धड़े को लेकर 1997 में ही अलग हो गईं थीं फिर इतने साल बाद उसने असली कांग्रेस होने का दावा क्यों किया? इस बीच वे सोनिया परिवार वाली कांग्रेस से कहीं न कहीं सहयोग भी करती रही हैं। फिलहाल इस समय देश में मान्यता प्राप्त विपक्षी दल का ना होना लोकतंत्र समर्थकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। लेकिन इसके लिए देश की आम जनता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। वास्तव में इसके लिए विपक्ष के दल ही जिम्मेदार हैं। उसकी नीतियां ही इतनी लचर और लोकतंत्र विरोधी है कि देश की जनता में इनका विश्वास ही नहीं पैदा हो पा रहा है।

इस पृष्ठभूमि में यह कहना उचित है कि अगर कांग्रेस अल्पकालिक लाभ के लिए अपने दीर्घकालिक हितों को त्याग देती है, तो इससे साफ होता है कि कांग्रेस एक निराशाजनक भविष्य की ओर देख रही है। गौर करने वाली बात तो यह है कि पूरे देश में यह विपक्षी पार्टियों को नहीं बल्कि अपने तथाकथित सहयोगियों को ही जगह दे रही है, जिनमें से कुछ कांग्रेस के पूर्व नेता रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में यादव का मत यादव को तथा दलित का मत मायावती को जाता है। फिर भी जमीनी हकीकत को दरकिनार कर कांग्रेस इन्हीं दलों के साथ गठजोड़ करती रही और आज उसी का परिणाम है कि कांग्रेस वहां अब अपना वर्चस्व भी नहीं बचा पाईं। अपने आप को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिए कांग्रेस को दो बातों पर ध्यान देना होगा। पहला, इसे वंशवाद से उपर उठना होगा। दूसरा, इसे पार्टी के धरती से जुड़े कार्यकत्ताओं को प्रोत्साहित करना पड़ेगा। यह तो बिल्कुल सच है कि आपस में बंटा हुआ विपक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को मात देने के लिए एक राह टटोलने में व्यस्त है। लेकिन इस संदर्भ में इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि आजादी के बाद से इस देश के बहुदलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी विपक्षी दलों को एकजुट रखना आत्याधिक कठिन रहा है। हमें यहां साठ के दशक में संयुक्त विधायक दल की सरकार और 1975 में जनता पार्टी की सरकार को नहीं भूलना चाहिये, जो काफी अल्प समय में ही गिर गईं। इसके अतीरिक्त भारतीय मतदाताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चार वर्ष के कार्यकाल तथा उनके द्वारा विकास के लिए उठाये गये कदमों को भी देखा है। 2019 चुनाव के मद्देनजर देखा जाए तो वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखाई देता।

 

 

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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