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एस-400 भारत का नया रक्षा कवच

एस-400 भारत का नया रक्षा कवच

अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है, लेकिन दुनिया को सबसे घातक हथियार देने वाला अमेरिका भी एक ब्रह्मास्त्र से खौफ खाता है। वो है रूस का एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम। पुतिन का ये हथियार तुर्की ने लिया तो अमेरिका ने उस पर कई तरह के बैन लगा दिए। भारत ने रूस से एस-400 खरीदने की डील साइन की तो अमेरिका का पारा हाई हो गया। असल में एस-400 की तैनाती का मतलब है, देश की सुरक्षा की गारंटी और इस मिसाइल के प्रहार का मतलब है, आसमान में अभेद्य कवच। दुश्मन के पास कितनी भी ताकतवर मिसाइल हो, कैसा भी फाइटर जेट हो, सीक्रेट तरीके से घुसपैठ करने वाला ड्रोन हो, एस-400 के रहते वो सरहद क्रास नहीं कर सकता।

रक्षा के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपनी ताकत बढ़ाने में जुटा हुआ है। रूस ने भारत को दुनिया के सबसे खतरनाक मिसाइल डिफेंस सिस्टम एस-400 की डिलीवरी शुरू कर दी है। यह मिसाइल सिस्टम अपनी तमाम खूबियों के लिए दुनिया में जाना जाता है। एस-400 दुनिया का सबसे खतरनाक एंटी मिसाइल सिस्टम है। यह एक साथ तरह-तरह के खतरों से निपट सकता है। इसकी विशेष बात यह है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही ये दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख सकता है और पलक झपकते ही दुश्मन के मंसूबों पर पानी फेर देता है। एस-400 की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब से रूस से इसकी डील की बात हुई है, तब से अमेरिका जैसा देश भी इस डील के खिलाफ आ खड़ा हुआ है। एस-400 मिसाइल सिस्टम एक साथ 36 ठिकानों पर तबाही मचा सकता है। इतना ही नहीं यह डिफेंस सिस्टम चार तरीके की मिसाइलों से लैस है और 40 से 400 किलोमीटर दूरी तक घातक प्रहार कर दुश्मन को ढेर कर सकता है, यानी अगर इसकी तैनाती दिल्ली में की जाए तो दुश्मन के किसी विमान या मिसाइल को आगरा पहुंचने से पहले ही यह तबाह और बर्बाद कर देगा। एस-400 मिसाइल सिस्टम अलग-अलग तरह की चार मिसाइलों से लैस होता है। इसमें एक मिसाइल लॉन्ग रेंज की है, जो 400 किलोमीटर तक मार कर सकती है। दूसरी मिसाइल मीडियम रेंज की है, जो ढाई सौ किलोमीटर तक प्रहार कर सकती है। तीसरी मिसाइल मीडियम-शार्ट रेंज की है, ये 120 किलोमीटर तक हमला कर सकती है और चौथी मिसाइल शार्ट रेंज की है, ये 40 किलोमीटर के दायरे में दुश्मन को तबाह कर सकती है। यह डिफेंस सिस्टम सबसे एडवांस्ड रडारों से लैस है, जिससे ये 600 किलोमीटर की दूरी तक अपने 300 टारगेट्स का पता लगा सकता है और कुछ ही मिनटों में इन्हें ध्वस्त कर सकता है। ये बड़ी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाया जा सकता है और सिर्फ 5 मिनट के अंदर हमले के लिए तैनात किया जा सकता है। भारत को एस-400 मिसाइल सिस्टम मिलने के बाद इंडियन एयरफोर्स की ताकत कई गुना बढऩे वाली है।

एस-400 डिफेंस मिसाइल सिस्टम की खासियत ही इसे बाकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम से अलग बनाती है। इसमें लगे मिसाइल सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक हैं, जो करीब पांच किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकते हैं। इतना ही नहीं जमीन से 35 किलोमीटर ऊपर आसमान में भी ये दुश्मन की किसी भी मिसाइल, राकेट या लड़ाकू विमान का खात्मा कर सकते हैं। एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम स्टील्थ मोड के 5थ जनरेशन फाइटर प्लेन तक को गिरा सकता है। अमेरिका के सबसे बड़े एडवांस्ड एफ-35 फाइटर जेट भी इससे बच नहीं सकते हैं। इस डिफेंस सिस्टम के मुख्य रूप से तीन हिस्से हैं, पहला हिस्सा है, टारगेट मैनेजमेंट रडार सिस्टम, जो दुश्मन की दूरी तय करता है। इसके बाद आता है कमांड सेंटर, जो दुश्मन के हमले की दूरी तय करके मिसाइल लॉन्चर को हमले का निर्देश देता है और तीसरा हिस्सा है मिसाइल लॉन्चर, जिसमें से मिसाइल अपने टारगेट पर हमला करने के लिए निकल पड़ती है।

यह एक सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, यानी ये सतह से हवा में मार करने वाला दुनिया का सबसे आधुनिक और सबसे प्रभावी मिसाइल सिस्टम माना जाता है। अगर भारत इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम को कश्मीर में लाइन ऑफ कंट्रोल पर तैनात कर देता है तो पाकिस्तान चाह कर भी कोई हवाई हमला हमारी सीमा के अंदर नहीं कर पाएगा। अगर उसने हमला किया भी तो ये एस-400 एक बार में उसके 32 विमानों को मार कर नीचे गिरा सकता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि भारतीय सेना को एस-400 क्षमता के रूप में एक ऐसी मारक क्षमता मिली है जिसका जवाब अब तक कोई देश ढूंढ नहीं पाया है। इसलिए अब भारत और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा में इस डिफेंस सिस्टम का बहुत बड़ा हाथ रहने वाला है। इस डिफेंस सिस्टम के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं, पहला सीमा पर इस डिफेंस सिस्टम की तैनाती से चीन और पाकिस्तान पर होने वाला असर, क्योंकि यही दो हमारे दुश्मन देश हैं और दूसरा पहलू है अमेरिका, क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत रसिया से ये मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदे, लेकिन उसकी मर्जी के खिलाफ हमने ये सिस्टम खरीद लिया। इस संबंध में अमेरिका में वर्ष 2017 में एक कानून लाया गया था, ताकि अगर कोई देश विरोध के बावजूद रसिया से कोई रक्षा सौदा करता है तो उस देश पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। सवाल यह है कि क्या अमेरिका अब भारत पर भी प्रतिबंध लगाएगा?

इस सिस्टम के कुल चार भाग हैं। पहला है लॉन्ग रेंज सर्विलांस रडार, इसकी ट्रैकिंग रेंज 600 किलोमीटर है। मान लीजिए अगर दिल्ली में यह मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिया जाए और लगभग 600 किलोमीटर दूर लखनऊ में आसमान में कोई दुश्मन विमान उड़ रहा है तो ये रडार सिस्टम उसके बारे में सब कुछ पता लगा सकता है। इसके बाद ये कमांड व्हीकल को इसकी जानकारी देगा। इस कमांड व्हीकल को इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम का ब्रेन यानी दिमाग कहा जा सकता है। क्योंकि यही ब्रेन इस पूरे सिस्टम को कंट्रोल करता है। इसके बाद बारी आती है इंगेजमेंट रडार की। इसी रडार सिस्टम से टारगेट को चुना जाता है और फिर जब लांच व्हीकल (प्रक्षेपण यान) से मिसाइल दागी जाती है तो इसकी मदद से मिसाइल टारगेट का पीछा करना शुरू कर देती है, यानी अगर मिसाइल एक बार फायर हो गई तो ये 100 प्रतिशत अपने लक्ष्य को नष्ट करके ही रहती है। इसमें कुल चार मिसाइल ट्यूब लगी हैं। एक ट्यूब से 8 मिसाइलें दागी जा सकती हैं यानी अगर चारों ट्यूब से मिसाइल फायर की जाएं तो एक साथ दुश्मन के 32 विमान गिराए जा सकते हैं और ये हमला 400 किलोमीटर की रेंज के बीच हो सकता है। इसे एस-400 इसीलिए कहते हैं, क्योंकि इसकी मारक क्षमता 400 किलोमीटर है। भारत को एस-400 की कुल 5 रेजीमेंट मिलने वाली हैं, जिनमें कुल 5 मोबाइल कमांड सेंटर, 10 रडार और 10 लांचर्स होंगे। एक लांचर से अगर एक बार में चार मिसाइल भी दागी जाती हैं तो भारत आने वाले कुछ वर्षों में ऐसी 160 मिसाइलों को एक साथ फायर करने में सक्षम होगा। इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान और चीन भारत पर हवाई हमला करने के बारे में अब शायद सोच भी नहीं पाएंगे। भारत ने रसिया से ये 5 रेजीमेंट 39 हजार करोड़ रुपए में खरीदे हैं। पूरी डील लगभग 40 हजार करोड़ रुपए की है। इसकी पहली रेजीमेंट की तैनाती पश्चिमी सीमा के पास हो सकती है। जहां से पाकिस्तान और चीन दोनों को दबाव में रखा जा सकता है, दोनों पर नजर रखी जा सकती है। हालांकि चुनौतियां भारत के सामने भी हैं। पाकिस्तान के पास भले ही ये मिसाइल डिफेंस सिस्टम नहीं है, लेकिन चीन के पास इसी मिसाइल डिफेंस सिस्टम की 6 बटालियन यानी 6 रेजीमेंट पहले से ही मौजूद हैं। इनमें से एक सिस्टम उसने तिब्बत में, अरुणाचल प्रदेश के पास तैनात करके रखा है। दूसरा सिस्टम चीन ने लद्दाख में तैनात करके रखा है। ऐसा बताया जाता है कि चीन इस मामले में हमसे पहले ही आगे चल रहा है। उसने पहली एस-400 मिसाइल वर्ष 2018 में रसिया से खरीदी थी, लेकिन मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था नाम की संधि का हिस्सा नहीं होने की वजह से उसे इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। इस संधि के तहत जो देश इसका सदस्य नहीं है, उसे 300 किलोमीटर से ज्यादा रेंज की कोई मिसाइल नहीं बेची जा सकती। मतलब चीन को रसिया से एस-400 मिसाइल तो मिली, लेकिन जो मिसाइलें दी गईं, उनकी मारक क्षमता अधिकतम ढाई सौ किलोमीटर तक ही है। जबकि भारत को जो डिफेंस सिस्टम मिला है, उसकी मारक क्षमता अधिकतम 400 किलोमीटर है। यानी चीन के पास ये डिफेंस सिस्टम पहले से मौजूद तो है, लेकिन उसके पास जो डिफेंस सिस्टम है, उसकी रेंज ढाई सौ किलोमीटर है और हम जो ले रहे हैं उसकी रेंज है 400 किलोमीटर। अब इस डील का दूसरा पहलू है, भारत पर अमेरिका के प्रतिबंधों का खतरा। अमेरिका शुरुआत से ही ये नहीं चाहता था कि भारत कभी रसिया से इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम को खरीदे, लेकिन सीमा सुरक्षा और चीन से गतिरोध को देखते हुए भारत ने अमेरिका की धमकियों को नजरअंदाज कर दिया और रसिया से इस सिस्टम को खरीद लिया।

अमेरिका में वर्ष 2017 में एक कानून आया था कि अगर कोई देश रसिया के साथ हथियारों का सौदा करता है तो उस देश को बैन कर दिया जाएगा। इस कानून को वहां ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ कहते हैं।अमेरिका ने यह कानून इसलिए बनाया था ताकि वह हथियारों के निर्यात में रसिया को कमजोर कर सके, क्योंकि हथियारों के बाजार में अमेरिका खुद सबसे बड़ा प्लेयर है और रसिया भी बहुत बड़ा प्लेयर है, लेकिन अमेरिका रसिया को कमजोर करना चाहता है। अभी पूरी दुनिया में हथियारों का सबसे ज्यादा 37 प्रतिशत निर्यात अमेरिका करता है, यानी वो हथियारों का सबसे बड़ा सौदागर है और फिर नंबर आता है रशिया का, जिसकी हथियारों को बेचने की हिस्सेदारी इस समय 20 प्रतिशत के आसपास है। ये दो सबसे बड़े हथियारों के व्यापारी हैं। वर्ष 2018 में जब चीन ने रसिया से यही एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा तो अमेरिका ने चीन पर प्रतिबंध लगा दिए थे। इसी तरह टर्की ने भी रशिया से यही एस-400 सिस्टम खरीदा हुआ है और तब भी अमेरिका ने टर्की पर कई कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, जैसे अमेरिका ने टर्की का निर्यात लाइसेंस रद्द करके उसे ब्लैक लिस्ट कर दिया था और अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाली टर्की की परिसंपत्तियों को भी उन्होंने फ्रीज कर दिया था। इस कार्यवाही के लिए अमेरिका ने पूरा एक साल का समय लिया था। संभावना है कि भारत के मामले में भी कुछ समय बाद अमेरिका इस तरह के कदम उठा सकता है। हालांकि भारत के मामले में अपवाद की स्थिति भी बन सकती है। अमेरिका में जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति थे तब उन्होंने संसद में एक कानून पास करवा दिया था और इस कानून के तहत अमेरिका ने उन देशों को प्रतिबंध लगाने वाले कानून से छूट दे दी थी, जो देश पहले से ही रूस से रक्षा संबंधी लेनदेन कर रहे थे। यानी जो देश पहले से ही रूस से हथियार खरीद रहे थे, उन्हें इस लिस्ट से हटा देने का प्रावधान उन्होंने किया था और भारत के संदर्भ में भी ये कानून पूरी तरह फिट बैठता है, क्योंकि आज भी भारत के पास जो ज्यादातर हथियार हैं, वो रसिया से हैं। इसका मतलब यह है कि अगर कोई देश वर्षों से रसिया से हथियार खरीद रहा है तो अब आप अचानक उसे कैसे रोक सकते हैं? 1960 के दशक से ही रूस भारत का सबसे बड़ा डिफेंस पार्टनर रहा है और स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत का कुल रक्षा आयात 68 प्रतिशत रूस के साथ हुआ था, यानी हमने 68 फीसदी हथियार रूस से खरीदे हैं। इस आधार पर भारत को प्रतिबंधों से छूट मिल सकती है। दूसरी बात यह है कि चीन से गतिरोध के बाद एशिया में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद पार्टनर भारत है और भारत क्वाड का भी सदस्य है। इसलिए भारत पर प्रतिबंध लगाकर अमेरिका खुद को इस क्षेत्र में कमजोर नहीं करना चाहेगा और भारत से भी अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा।

वास्तव में एस-400 आने से हमारी मिसाइल शील्ड बहुत मजबूत हो जाएगी। किसी भी देश के एडवांस्ड फाइटर जेट को रोकने में, उसको गिराने में ये बिल्कुल सक्षम है। ये एक गेमचेंजर है, इसके साथ ही इससे पाकिस्तान और चाइना दोनों को एक मजबूत मैसेज जाता है कि उन्हें अब भारत को परेशान करने से बाज आ जाना चाहिए। एस-400 डिफेंस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा ये है कि पाकिस्तान का पूरा का पूरा इलाका इसकी निगरानी में आ जाएगा और जब भी उसका कोई हवाई जहाज वहां से उड़ेगा तो हमारी सेना उस पर कोई भी कार्यवाही करने में सक्षम होगी।

 


रंजना
मिश्रा

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