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वैश्विक समस्या बनती जा रही है आत्महत्या

वैश्विक समस्या बनती जा रही है आत्महत्या

जीवन पृथ्वी पर सबसे अनमोल चीज मानी गई है। पुराणों और शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। इस नश्वर संसार में अमरत्व प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है। प्रत्येक मनुष्य के जन्म और मृत्यु का समय निश्चित है लेकिन जब इसी समय के खिलाफ जाकर कोई शरीर छोडऩे की सोचता है तो वह आत्महत्या की ओर प्रेरित होता है। आत्महत्या के कई कारण हो सकते हैं। पूरी दुनिया 10 सितंबर को वल्र्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे मनाती है। यह एक ऐसी मुहिम है जिसमें तनाव, एंग्जाइटी या डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को जागरुक किया जाता है।

कुछ दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट ‘सुसाइड वल्र्ड वाइड इन 2019’ के अनुसार दुनियाभर में हर साल करीब 7 लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं। 2019 में यह आंकड़ा 7.03 लाख था। इसका मतलब है कि हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। दुनियाभर में हर 100 में से एक व्यक्ति की जान खुदकुशी करने के कारण गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में होने वाली करीब 1.3 फीसदी मौतों की वजह आत्महत्या है जो इसे मृत्यु के लिए जिम्मेवार 17वां सबसे बड़ा कारण बनाता है। डब्लूएचओ के मुताबिक 2019 में भारत में आत्महत्या के कारण 173,347 लोगों की जान गई थी। जिनमें से 42 फीसदी महिलाऐं थी। इसका मतलब है कि इस वर्ष में 72,935 महिलाओं ने आत्महत्या में अपनी जान दी थी, जबकि इसके कारण मरने वालों का आंकड़ा 100,413 था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनिवार्य सतत् विकास लक्ष्यों (एस.डी.जी.) में वैश्विक आत्महत्या मृत्यु दर को एक तिहाई कम करना एक लक्ष्य है। लेकिन दुनिया इस लक्ष्य से अभी भी कोसों दूर है। एस डी जी रोकथाम और उपचार के माध्यम से देशों से गैर-संचारी रोगों के कारण समय से पहले होने वाली मृत्यु दर को एक-तिहाई तक कम करने और मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया।

आत्महत्या के विचार आने की समस्या से पीडि़त व्यक्ति को खुद का जीवन नष्ट करने के विचार आने लगते हैं, इसके साथ-साथ इस दौरान उसको डिप्रेशन और बिहेवियरल बदलाव भी महसूस होने लगते हैं। खुदकुशी का विचार आना एक सामान्य समस्या है और ज्यादातर लोग इसे तब महसूस करते हैं, जब वे तनाव या डिप्रेशन से गुजर रहे होते हैं। समाज की अलग-अलग संस्कृतियों और तबकों में आत्महत्या की वजहें अलग-अलग हैं। लेकिन हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि आत्महत्या, मृत्यु का सबसे निरोध्य कारण है, यानी इसे रोका जा सकता है। आत्महत्या की कोशिशें अक्सर मदद की एक पुकार ही होती हैं और अब तो तेजी से एक मनोवैज्ञानिक इमरजेंसी के तौर पर देखी जा रही हैं। आत्महत्या को रोकने की जिम्मेदारी हम सब पर है।

सुसाइड के कुछ कारणों को देखे तो पाते हैं कि किसी अपने के मौत पर उस शख्स से हमेशा के लिए दूर हो जाने की भावना, निजी रिश्ते में किसी प्रकार की समस्या, किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार होने पर, जीवन में कोई लक्ष्य ना होने पर, अपने जीवन पर काबू ना होने पर, किसी तरह का आर्थिक घाटा होने पर। अत्यधिक केसों में इन सबमें से ही कोई न कोई कारण होता है सुसाइड करने का।

जीवन को जीने लायक बनाए जाने की कोशिशें युगों से जारी हैं और जीवन को ठुकरा देने की भी। नई आत्महत्याएं खबरों में पुरानी आत्महत्याओं को धुंधला कर देती हैं। इस दरम्यान न आत्महत्या करने के तरीके बहुत बदलते हैं और न ही उन पर खबर करने के। इस सिलसिले में स्वामी विवेकानंद की बात भी याद कर लेनी चाहिए –  जीवन में मैंने एक महत्वपूर्ण बात सीखी वह यह कि आपका ध्येय जितना ऊंचा होगा, उतने ही आप दुखी होंगे। इस सृष्टि में मुख्यत: दो प्रकार के लोग मिलते हैं। पहले प्रकार के लोग दृढ़, मन के पक्के, शांत, प्रकृति के आगे समर्पित होने वाले, कल्पना-शक्ति के फेरे में न पडऩे वाले, किंतु अच्छे, सज्जन, दयालु, मधुर स्वभाव के होते हैं। यह सृष्टि ऐसे ही लोगों के लिए है। ये लोग सुखी होने के लिए ही जन्म लेते हैं। इसके विपरीत दूसरे प्रकार के लोग अत्यंत संवेदनशील स्वभाव के, कल्पना-प्रधान होते हैं। इनकी भावना अत्यंत तीव्र होती है। इस तरह के लोग एक पल में ही ऊंची उड़ान भरते हैं, तो दूसरे ही पल एकदम जमीन पर होते हैं। ऐसे लोगों के भाग्य में सुख नहीं होता है। इसे समझे तो कह सकते हैं कि ये दूसरे प्रकार के लोग ही आत्महत्या करते हैं।

यदि मन में सुसाइड का ख्याल आ रहा है तो किसी अपने और भरोसेमंद व्यक्ति के साथ बैठकर अपने मन की सभी बातें बोल दें। जी भर कर रोएं, ऐसा करने से आत्महत्या की सोच दिल से कम हो जाती है। यदि आप आशाहीन महसूस कर रहे हैं या ऐसा महसूस कर रहे हैं कि आप अब और जीने के लायक नहीं हैं। तो ऐसे में याद रखें कि उपचार की मदद से आप फिर से अपने जीवन के दृष्टिकोण को प्राप्त कर सकते हैं और जीवन को बेहतर बना सकते हैं। उत्तेजित होकर कुछ ना करें। पीडि़त के परिवार के सदस्य और दोस्त उसके बोलने और व्यवहार करने के तरीके से यह पता लगा सकते हैं कि वह इस समस्या के जोखिम पर है। इस दौरान वे पीडि़त व्यक्ति के साथ बात करके और उचित सपोर्ट प्रदान करके उसकी मदद कर सकते हैं जैसे पीडि़त व्यक्ति को डॉक्टर के पास लेकर जाना।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2030 तक वैश्विक आत्महत्या मृत्यु दर को एक तिहाई तक कम करने में देशों की मदद करने के लिये नए दिशा-निर्देश प्रकाशित किये थे। इसमें प्रमुख है- आत्महत्या करने वाले कारकों को उनसे दूर रखने का प्रयास करना है। जिसमें अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों और आग्नेयास्त्रों जैसे आत्महत्या के साधनों तक पहुंच सीमित करना होगा। आत्महत्या की जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर मीडिया को भी शिक्षित करने की आवश्यकता है, जिससे कि मीडिया द्वारा किसी खास को ट्रोल होने से बचाया जा सके। इसके आलावे किशोरों में सामाजिक-भावनात्मक जीवन कौशल को बढ़ावा देना अति आवश्यक है। आत्मघाती विचारों और व्यवहार से प्रभावित किसी व्यक्ति की प्रारंभिक पहचान, मूल्यांकन, प्रबंधन और अनुवर्ती कार्रवाई करनी होगी। इन्हीं स्थिति विश्लेषण, बहु-क्षेत्रीय सहयोग, जागरूकता बढ़ाने हेतु क्षमता निर्माण, वित्तपोषण, निगरानी और मूल्यांकन जैसे मूलभूत स्तंभों के साथ आगे बढऩे की जरूरत है।

आत्महत्या के बारे में सोच रहा व्यक्ति लंबे समय से परेशान रहने लगता है। एक सेकेंड में खुदकुशी का ख्याल हजार में से किसी एक व्यक्ति के दिल में ही आता है। इसलिए अपने करीबियों पर ध्यान दें कहीं वो किसी बात को लेकर इतना परेशान तो नहीं कि अपनी जिंदगी खत्म करने की सोच रहे हों। ऐसे लोगों के सामने उनकी सफलताओं की बातें फिर से दोहराएं, लोगों को उनका उदाहरण देकर समझाएं कि वो कितने मजबूत हैं। ऐसा करने से आत्महत्या का विचार खत्म हो जाता है। व्यक्ति समझ जाता है कि वो अन्य लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है इसलिए वो जिंदगी को सकारात्मक ढंग से जीने लगता है। जिंदगी खुद को सुधारने का एक मौका हर किसी को जरूर देती है लेकिन सुसाइड तो जिन्दगी ही छीन लेती है। जरूरत है कि जिंदगी के महत्व को समझें और समझ कर ऐसे कुविचारों से बचें क्योंकि इससे समस्या का समाधान नहीं होता है उल्टे आपके चहेतों को जख्म दे कर चला जाता है। ‘मन कितना भी मजबूर क्यों न करे मरने को, दिल उतना ही मजबूत करो हौसलों से जीने को।’

 

 

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

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