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वर्चुअल ऑटिज्म : मोबाइल जनित मानसिक विकार

वर्चुअल ऑटिज्म : मोबाइल जनित मानसिक विकार

ऑटिज्म अर्थात स्व-लीनता। जब मोबाइल/टीवी/स्क्रीन आदि का अधिक उपयोग छोटे बच्चों (विशेष कर 0-4 वर्ष) के मानसिक विकास पर अवरोध डाल दे एवं बच्चा असामान्य व्यवहार करने (जन्म से सामान्य) लगे तब यह स्थिती वर्चुअल ऑटिज्म कहलाती है। विगत कुछ वर्षो में मोबाइल का उपयोग बच्चों मे बहुत बढ़ गया है। खाना-पीना, खेलना, पढऩा सब कुछ मोबाइल पर किंतु नई शोध के अनुसार चार साल से कम उम्र के बच्चे अगर दो घंटे से ज्यादा वक्त मोबाइल या स्क्रीन पर बीताते है तो उनके सोचने समझने सीखने व सामाजिक विकास में अवरोध उत्पन्न होता है व बच्चे ऑटिज्म जैसे मानसिक विकार के शिकार हो रहे है।

वर्चुअल ऑटिज्म के शिकार की पहचान

  • मोबाइल कि उपयोग दो घंटे से ज्यादा।
  • नजर नही मिलाना।
  • नाम पुकारने पर सुनना नहीं।
  • लगातार एबीसीडी नंबर या कविता गुनगुनाना।
  • खुद में मग्न रहना।
  • आस-पास की दुनिया से बेखबर।
  • किसी भी कार्य को दोहराना/ विशेष वस्तु से लगाव।
  • सामाजिक दूरी।
  • बोलने में देरी।

कारण

मोबाइल/स्क्रीन का कम उम्र मे अधिक उपयोग बच्चों की ‘‘देखो-समझो-करो-सीखो’’ के सामान्य मानसिक विकास के क्रम में अवरोध डाल बच्चों के मस्तिष्क को निष्क्रिय कर देता है। बच्चे सुध-बुध खोकर मोबाइल देखते है और माता-पिता बच्चों को सुरक्षित और स्मार्ट समझ कभी खुश होकर कभी मजबूरी में बच्चो को मोबाइल थमा देते है।

वर्चुअल मतलब आभासी जो असली नही है जब स्क्रीन का उपयोग दिमाग के विकास को सुन्न कर दे और बच्चे मानसिक कमजोर हो जाए व असामान्य व्यवहार करे तब वर्चुअल ऑटिज्म ग्रस्त कहलाते है।

यह एक अस्थाई मानसिक अवस्था है किंतु समय रहते पहचान व सही इलाज के अभाव में यह खतरनाक साबित हो सकता है व बच्चे हमेशा के लिए मानसिक विक्षिप्त हो सकते है।

बच्चे खुद के साथ माता-पिता व अपनी जरूरत भी पहचान नही पाते। हर वक्त स्क्रीन पर देखी सुनी बाते दोहराते है पर पूछने पर बोलते नही। शब्दो व रंगो को पहचानते है पर परिवार व आसपास को नही। पैरेंट्स असमंजस मे रहते है की बच्चा सामान्य है या नही? बच्चे का चिढ़चिढ़ा व हाइपर एक्टिव स्वभाव समझ से परे हो जाता है। समय पर अगर पैरेंट्स ध्यान न दे तो अपने ही बच्चे से हाथ धो बैठेंगे।

सुरक्षा ही उपाय है

  • बच्चों के साथ क्वालिटी समय गुजारें।
  • उन्हें कम से कम मोबाइल/टीवी के हवाले करें।
  • बचपन से पढ़ाई (एबीसीडी आदि) सिखाने के बजाय परिवार पड़ोस व प्रकृति से मेल कराएं।
  • उन्हें उनकी जरूरत व्यक्त करने दें हर चीज हाथों पर देना सही नहीं।
  • खाने को मजेदार बनाए, मोबाइल के सहारे ‘काम खत्म’ का तरीका छोड़ें।

आपके बच्चे आपका भविष्य है उन्हे संवारने मे स्वयं वक्त दे। मशीनों पर निर्भर होकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह न मोड़ें। सावधान रहिए, स्वस्थ रहिए।

 

 


डॉ.
रूचि जैन

(लेखिका शोधकर्ता, न्यूरो-पिडियाट्रिक फिजीयोथेरेपिसट हैं)

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