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ममता की ममता के सहारे विपक्ष

ममता की ममता के सहारे विपक्ष

टीएमसी को पश्चिम बंगाल में जीत दिलाने में कामयाब रहीं ममता बनर्जी भले ही खुद अपना चुनाव नंदीग्राम से हार गई हैं, लेकिन विपक्ष अब उन्हीं में अपना सहारा ढूंढ रहा है। कांग्रेस धीरे-धीरे खात्मे की ओर है, ऐसे में भला विपक्ष ममता के अलावा आस भी किससे लगाए। मिशन 2024 के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ साझा विपक्ष के नेतृत्व को लेकर घमासान की स्थिति बनने लगी है। ममता बनर्जी ने अब खुले तौर पर घोषणा कर दी है कि साझा विपक्ष का नेतृत्व अब वो ही करेंगी। तृणमूल कांग्रेस ने बता दिया है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ विकल्प के रूप में उभरने में नाकाम रहे हैं। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के साझा विपक्ष की तैयारियों में जुटी तृणमूल कांग्रेस ने अपने बंगाली मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ में ‘राहुल गांधी विफल, ममता हैं विकल्प’ के हेडिंग से एक लेख के सहारे कांग्रेस सांसद की उन सभी कोशिशों को कमतर बताया, जो वह भाजपा के खिलाफ नेतृत्व की कमान पाने के लिए कर रहे हैं। वैसे, टाइम मैग्जीन की साल 2021 के 100 प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ममता बनर्जी का नाम शामिल होने के बाद तृणमूल कांग्रेस का उत्साहित होना सही है। लेकिन, इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि साझा विपक्ष के नेतृत्व पर ममता ने दावा तो ठोंक दिया, लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा?

इस साल हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एक बार फिर हाशिए पर सिमटती दिखी, तो बंगाल में बीजेपी को जीत से रोकने वाली तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी विपक्ष को एक नया चेहरा देने की कवायद में जुटी हैं। अब उन्होंने ख़ुल कर कांग्रेस पर हमला बोलना शुरू कर दिया है। दरअसल, हाल ही में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने मुंबई में एनसीपी प्रमुख शरद पवार से मुलाकात की। उसके बाद उन्होंने पत्रकारों के सवालों पर ये कहा था कि ‘अब कोई यूपीए नहीं है।’

संयुक्त प्रगतशील गठबंधन यानी यूपीए कांग्रेस की अगुआई में कई दलों को मिलाकर बना गठबंधन था। 2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने से पहले डॉक्टर महमोहन सिंह यूपीए में शामिल दलों के समर्थन से ही प्रधानमंत्री थे।

ममता बनर्जी ने मुंबई में ही राहुल गांधी का नाम लिए बगैर उन पर भी हमला किया। उन्होंने कहा कि, ‘अगर वो देश में रहते ही नहीं हैं, आधा टाइम विदेश में रहते हैं, तो राजनीति कैसे होगी। राजनीति में निरंतर प्रयास आवश्यक है।’

कांग्रेस को नकारते हुए यूपीए के घटक दलों को एकजुट करने के अभियान में ममता बनर्जी ने अपनी मुंबई यात्रा के दौरान शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं से मुलाकात की। कांग्रेस पर हमलावर ममता ने ये भी कहा था कि पार्टी ने सिविल सोसाइटी के मुद्दे पर उनकी बात नहीं सुनी। इस दौरान ममता ने कहा, ‘मैंने बहुत बार कांग्रेस को कहा कि एक एक्सपर्ट टीम बनाओ जो हमें गाइड करे लेकिन कांग्रेस ने नहीं सुना।’

पश्चिम बंगाल में मिली चुनावी सफलता और (बकौल ममता) कांग्रेस की बेरुखी के बाद से टीएमसी अन्य राज्यों में अपने पांव पसारने में लगी है। पार्टी ने त्रिपुरा और गोवा में बड़े स्तर पर कैंपेन शुरू किया है। गोवा में तृणमूल कांग्रेस को तब बड़ी सफलता हाथ लगी जब वरिष्ठ नेता लुइजिन्हो फलेरियो ने कांग्रेस और विधानसभा से इस्तीफा दे कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। यह अलग बात है की त्रिपुरा में उसे मुंह की खानी पड़ी है। वहीं इस अभियान के दौरान टीएमसी ने मेघालय कांग्रेस में भी सेंध लगाई है। यहां कांग्रेस पार्टी के 17 में से 12 विधायक तृणमूल कांग्रेस के खेमे में चले गए।

इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पिछले साल कांग्रेस में जी 23 ग्रुप का बनना और हाल के दिनों तक कई बड़े, छोटे नेताओं का इसका दामन छोडऩा इसके सबूत भी हैं। इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, प्रियंका चतुर्वेदी, अभिषेक मुखर्जी, सुष्मिता देव, मुकुल संगमा, कीर्ति आजाद, अशोक तंवर जैसे कई बड़े नाम भी रहे हैं।

हालांकि ममता बनर्जी की अगुवाई में जो नया मुद्दा उठा है, वो है विपक्ष के नेतृत्व का। जानकारों की नजर में ममता बनर्जी इस नेतृत्व की कवायद में ही अन्य राज्यों के दौरे कर सभी छोटे बड़े दलों के नेताओं से मिलकर समर्थन जुटाने का काम कर रही हैं।

क्या ममता बनेंगी मोदी का ऑप्शन?

लगातार तीसरी बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद पर पहुंची ममता बनर्जी ने इसी साल हुए सूबे के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सत्ता में आने के ख्वाब को बुरी तरह से चकनाचूर कर दिया था। चुनाव के दौरान ही ममता बनर्जी ने ‘एक पैर पर पश्चिम बंगाल और दो पैरों पर दिल्ली’ जीतने की घोषणा कर दी थी। बंगाल में मुख्यमंत्री बनकर फतेह हासिल करने के साथ ही उन्होंने दिल्ली के लिए तैयारियां शुरू कर दी। नरेंद्र मोदी सरकार के हर फैसले को कटघरे में खड़ा करने से लेकर राज्य में ऑपरेशन ग्रास फ्लावर चलाकर ममता बनर्जी ने भाजपा को हरसंभव तरीके से घेरने की कोशिश की है। कहना गलत नहीं होगा कि पीएम मोदी के सामने ‘दीदी’ एक ताकतवर चेहरा बनकर उभरी हैं, जो भाजपा से लोहा लेने में पीछे नहीं हटता है।  लेकिन, ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो पश्चिम बंगाल से बंधी हुई नजर आती हैं। हालांकि, हिंदी दिवस पर ट्वीट के सहारे उन्होंने इस ‘बंगाल की बेटी’ वाली छवि से निकलने की कोशिश जरूर की है।  लेकिन, उन पर लगा बंगाल का टैग इतनी आसानी से नहीं हटेगा। क्योंकि, पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान मां-माटी-मानुष से लेकर बंगाली अस्मिता और संस्कृति तक पूरे चुनाव प्रचार में उन्होंने बांग्ला भाषा में भाजपा को बाहरी साबित किया था। हिंदी प्रेम दर्शाकर ममता बनर्जी लोकसभा की तैयारी तो कर सकती हैं, लेकिन केवल पश्चिम बंगाल में ही।

कांग्रेस मुक्ति आसान नहीं  

कांग्रेस को दरकिनार करने की कितनी भी कोई कोशिश कर ले, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता पिछले छह दशकों से देश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस देश की नब्ज नब्ज से वाकिफ है। बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की जीत पर उत्साह से लबरेज तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने अपने लेख में राहुल गांधी को असफल बताया है।  लेकिन, वो ये भूल रहे हैं कि पश्चिम बंगाल केवल एक राज्य है।  अगले साल की पहली तिमाही में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से इतर 2024 से पहले 14 राज्यों में चुनाव होने हैं।  इनमें से 10 राज्यों में चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होना है। राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में ममता बनर्जी की मौजूदगी की बात छोडि़ए। इन राज्यों में शायद ही कोई उनके नाम पर किसी तरह की चर्चा भी करता होगा।  अगर इन तमाम राज्यों में राहुल गांधी कोई करिश्मा कर देते हैं, तो साझा विपक्ष का वैकल्पिक चेहरा बन रहीं ममता बनर्जी का सपना टूटने में जरा भी देर नहीं लगेगी।  कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी होने के साथ ही करीब 20 फीसदी वोट बैंक बेस रखती है, जो ममता बनर्जी समेत यूपीए के कई घटक दलों की कल्पना से भी ज्यादा है।

नेहरू युग के बाद 1971 में इंदिरा गांधी के दोबारा जीत कर आने के बाद से नरेंद्र मोदी केवल दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें जनता ने दोबारा पूर्ण बहुमत से चुना है। वो अब भारत के ऐसे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन गए हैं जिसे इंदिरा गांधी के बाद देश ने देखा है।  बीते सात साल के कार्यकाल के दौरान काम करने में विफल रहे सांसदों और पार्टी के भीतर मौजूद कई खामियों के बावजूद मोदी आसानी से सभी बाधाओं को पार करते हुए मतदाताओं से सीधी अपील करने में कामयाब रहे हैं।

इसका मतलब है कि सभी वर्गों, ग्रामीण और शहरी विभाजन, जाति आदि को देखते हुए जिस सामाजिक गठबंधन के आधार पर विपक्ष बड़ी सावधानी से एकजुट होता आया है, प्रधानमंत्री से सामना होते ही बिखर जाता है। ऐसे में नरेंद्र मोदी के सामने खड़ी पार्टियों को ममता में ही ये आस दिख रही है। कभी चंद्रबाबू नायडू, तो कभी नीतीश कुमार, तो कभी राहुल गांधी में विपक्ष अपने लिए उम्मीद तलाशता रहा है, वैसी ही उम्मीद उसे अब ममता से होगी। कांग्रेस भी शायद इसके लिए तैयार हो जाए, क्योंकि खुद में तो ताकत बची नहीं, जो कर पाए, उसी के साथ लग जाएं, यही भाव है। जहां तक भाजपा का सवाल है, उसे ये हमेशा अच्छा लगेगा। मुस्लिम तुष्टीकरण, हिंसक राजनीति और सिंगुर से नैनो को भगाने वाली ममता अगर सामने रहती हैं, तो मोदी की अगुआई में बीजेपी को सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ आगे बढऩे में परेशानी नहीं होगी, विश्वास तो उसे यही है।

 

नीलाभ कृष्ण

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