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कमजोर विपक्ष, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

कमजोर विपक्ष, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों में सत्तारूढ़ दल पर प्रभावी नियंत्रण के लिए एक सशक्त विपक्षी दल का होना आवश्यक होता है। मजबूत विपक्षी दल के रहने के कारण लोकतंत्र लगातार जीवंत बना रहता है। सशक्त  विपक्ष के रहते सरकार या सत्तारूढ़ दल किसी नीति-निर्माण के समय बहुत ही सोच समझकर कदम बढ़ाता है। उसे हर समय यह भय बना रहता है कि विपक्ष कहीं उसकी कमियों को उजागर करके जनता के समक्ष उसकी कमजोरी न प्रकट कर दे। ऐसे में वह किसी तरह की राष्ट्रव्यापी नीति-निर्माण के लिए विपक्ष को पहले ही से विश्वास में ले लेता है अथवा सदन में बहस के दौरान विपक्ष के सकारात्मक सुझाव को स्वीकार कर लेता है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र और जनता के लिए अति हितकारी होता है।

लेकिन कमजोर या नगण्य विपक्ष के रहने पर लोकतंत्र में हर समय विकृतियां आने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में सत्तारूढ़ दल अपने प्रचंड बहुमत के बल पर विपक्ष की बातों की यहां तक कि सकारात्मक सुझाव तक की अनदेखी कर देता है। जिसके कारण तानाशाही प्रवृत्ति पनपने की आशंका बनी रहती है। लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दलों की तानाशाही अत्यंत घातक सिद्ध होती है। 80 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा अपने बहुमत के बल पर आपातकाल लगाना और अनेकों तानाशाही निर्णय तथा कई संविधान संशोधन विधेयक इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

संयोग से वर्तमान समय में भी देश में विपक्ष नगण्य और प्रभावहीन है। राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर कोई भी दल मोदी या इनकी पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। इसे केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता का भाग्य कहें या संयोग की लोकसभा में कोई मान्यता प्राप्त विपक्षी दल ही नहीं है। विपक्षी दल ना होने के कारण लोकसभा में कोई मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता भी नहीं है। यह स्थिति पिछले 2014 के लोकसभा के चुनाव के समय से ही बनी है। आश्चर्यजनक बात यह है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों से देश में स्वतंत्रता के समय से ही सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को देशभर में इतनी सीटें भी नहीं मिल रही है कि उसे विपक्षी दल की मान्यता मिल सके। वैसे नियमानुसार देश की लोकसभा में कुल संख्या की 10 प्रतिशत सदस्य संख्या जीतना आवश्यक होता है। कांग्रेस पार्टी अपने कारनामों के कारण पूरे देश में लोकसभा की 55 सीटें भी नहीं प्राप्त कर पा रही हैं। इसे कांग्रेस के नेतृत्व की विडंबना माने या देश के लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहें।

फिलहाल इस समय देश में मान्यता प्राप्त विपक्षी दल का ना होना लोकतंत्र समर्थकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। लेकिन इसके लिए देश की आम जनता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। वास्तव में इसके लिए विपक्ष के दल ही जिम्मेदार हैं। उसकी नीतियां ही इतनी लचर और लोकतंत्र विरोधी है कि देश की जनता में इनका विश्वास ही नहीं पैदा हो पा रहा है।

आज देश में राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की स्थिति अत्यंत दयनीय व कमजोर है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस स्वयं अपने नकारे नेतृत्व के चलते प्रभावहीन हो चुका है। परिवारवाद के चलते लगभग सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस पार्टी आज अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। नेहरू गांधी खानदान के इतर किसी अन्य पर विश्वास न होने के कारण एक विदेशी मूल की महिला दशकों से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर कुंडली मारे बैठी हुई है। उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी, जो कुछ दिनों के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं, अपनी कमजोर समझ और अनुभव हीनता के कारण जनता के बीच हंसी का पात्र बने रहते हैं। अन्य विपक्षी दल भी क्षेत्रीय स्तर पर ही सीमित होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कोई भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। क्षेत्रीय दलों की स्थिति यह है कि किसी भी दल या उसके नेता का एक प्रांत से दूसरे प्रांत में कोई पहचान तक नहीं बन पाई है। जैसे उत्तर प्रदेश की सपा या बसपा का अपने पड़ोसी राज्यों बिहार और मध्य प्रदेश तक में कोई पहचान नहीं है।

वैसे इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए वर्ष 2004 में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए का गठन किया गया था। जो कि 2014 के लोकसभा चुनाव तक केंद्र में सत्तारूढ़ भी रहा। लेकिन यूपीए में शामिल दलों के भ्रष्टाचार के कारनामों के चलते जनता ने उसे बुरी तरह से नकार दिया। परिणाम स्वरूप आज यूपीए पूरी तरह से बिखर कर अस्तित्व हीन हो चुका है। तभी तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष सुश्री ममता बनर्जी कह रही हैं कि आज यूपीए नाम की कोई चीज नहीं बची है। वे खुद राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की नेता बनना चाह रही हैं लेकिन अपनी तुष्टीकरण की नीति के चलते ऐसा होना संभव नहीं लगता।

वास्तव में ममता बनर्जी का कहना सही है। आज यूपी में कांग्रेस के अतिरिक्त कौन सा ऐसा दल है जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखता हो। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, केरल जैसे प्रांतों में सत्तारूढ़ दलों के नेताओं की अपनी-अपनी सीमाएं हैं। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रसार की कोई संभावना नहीं लगती है। वे अपने क्षेत्रीय हितों को साधने में ही उलझे रहते हैं। भाषा भी क्षेत्रीय दलों की सीमाएं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करने की स्थिति में ना तो वर्तमान में हैं और भविष्य में भी इसकी कोई संभावना नहीं है।

पूर्वोत्तर के प्रदेशों में भी भारतीय जनता पार्टी अकेले अथवा स्थानीय दलों के साथ मिलकर कांग्रेस का सफाया कर चुकी है। इन प्रांतों में अपना पैर जमाने के प्रयास में लगी तृणमूल कांग्रेस को भी त्रिपुरा के चुनाव में जबरदस्त झटका लगा है। मेघालय में कांग्रेस के 12 विधायकों को तोडक़र मुख्य विपक्षी दल बन जाने के बावजूद भी इसकी संभावना नहीं बन पा रही है कि वह पूर्वोत्तर में कांग्रेस का स्थान ले सके।

इसी तरह देश की राजनीति को संचालित करने वाले हिंदीभाषी प्रांतों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि में भी विपक्षी दलों की स्थिति सत्तारूढ़ दल को कड़ी चुनौती ना दे पाने की ही है। वैसे तो राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में कांग्रेस की सरकारें हैं, लेकिन उनके नेताओं में आपस में ही इतनी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है कि उनका खुद का अस्तित्व ही खतरे में है। केंद्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी का कमजोर नेतृत्व अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी अनुशासन में नहीं रख पा रहा है। ऐसे में इन राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी का कोई पुरसा हाल नहीं है।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की सबसे पस्त हाल तो देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश में है। 80 लोकसभा क्षेत्र वाला यह प्रदेश देश को नेतृत्व देने वाला होता है। लेकिन आज यहां कांग्रेस के पास मात्र एक सीट बची है, वह भी उस के कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी की रायबरेली सीट। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो हाई-प्रोफाइल परिवार की परंपरागत सीट कही जाने वाली अमेठी की सीट भी हार चुके हैं। आज वे सुदूर दक्षिण के केरल के वायनाड सीट से सांसद हैं। कहने का आशय यह है कि संपूर्ण हिंदी भाषी उत्तर भारत के प्रांतों में कांग्रेस की स्थिति नगण्य और प्रभावहीन हो चुकी है। उसके पास आज ना तो संगठन है और ना ही नेता जो उसे फिर उसका पुराना स्थान दिला सके।

संक्षेप में कहें तो आज राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की कमजोर स्थिति लोकतंत्र के हित में कतई हितकर नहीं है। लेकिन इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? वास्तव में इसके लिए क्षेत्रीय नेताओं और दलों की जातिवादी, परिवारवादी और बहुसंख्यक हिंदू आबादी को चिढ़ाने वाली उसकी नीतियां ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। विपक्षी दलों के नेताओं का भ्रष्टाचार और उनकी कमजोरियां और तुष्टीकरण की राजनीति देश के लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुकी है। ऐसे में यदि देश में लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखना है तो विपक्षी दलों को अपने चाल-चरित्र और चेहरे को पूरी तरह से बदलना होगा। उसे जनता के बीच यह सिद्ध करना होगा कि वह बिना किसी भेदभाव के जनहित में कार्य करेगा, यदि ऐसा नहीं होता तो विपक्ष का संपूर्ण सफाया निश्चित है।

 

 

रमाकांत पांडेय

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