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विपक्ष : खलनायक की भूमिका में?

विपक्ष : खलनायक की भूमिका में?

मजबूत विपक्ष और पारदर्शी मीडिया लोकतंत्र की रक्षा की धुरी है। ये दोनो ही सरकार की कमियां उजागर कर सकते हैं और वक्त-बेवक्त उसे कटघरे में खड़ा कर सकते हैं। विपक्ष सरकार के प्रत्येक संविधानिक निर्णयों में हिस्सेदार होता है। अत: उसका काम है सरकार की कमियों पर नजर रखना और उन्हें उजागर करना, गलत मनमानें निर्णय लेने पर उसे रोकना। सरकार और विपक्ष दोनों के ही नेता जनता द्वारा चुने जाते हैं अत: दोनो की भूमिका जनहित में होनी चाहिये। पिछले कुछ समय से विपक्ष अपनी बुनियादी भूमिका छोड़ कर कुर्सी के लालच में कई बार अपने आचार विचारों से देशद्रोह की सीमा तक पहुंच गया। आजादी के बाद कई नेता ऐसे थे जिन्होने सरकार में रहकर या सरकार छोड़ कर विपक्ष में बैठना पसंद किया क्योंकि उन्हें कुर्सी से नहीं देश से प्यार था। महात्मा गांधी तो कुर्सी की कभी सोच भी नहीं सकते थे। जयप्रकाश नारायण भी कुर्सी से दूर रहे। राम मनोहर लोहिया भी चाहते तो सरकार का हिस्सा बन कर रह सकते थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश प्रेम के विचारों के कारण सरकार से मंत्री पद छोड़ कर आये और स्वयं एक नई पार्टी भारतीय जन संघ की स्थापना कर दी। तात्पर्य ये है कि एक वे नेता थे जो राष्ट्र के भले की सोच में कुर्सी छोड़ देते थे और आज के नेता विपक्ष में बैठ कर कुर्सी पाने के लिये राष्ट्र को हानि पहुंचाने से भी नहीं चूकते।

मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की रक्षा के लिये आवश्यक है। पिछले दो चुनावों से विपक्ष कमजोर हो रहा है, उसकी लोकसभा में नुमाइन्दगी कम होती जा रही है। शायद जनता का विपक्षी पार्टीयों से विश्वास उठता जा रहा है। इसके कई कारण हो सकते हैं। ऐसा माना जा सकता कि सरकार का नेतृत्व करने वाली भाजपा के नेता नरेन्द्र मोदी के समकक्ष दूर-दूर तक कोई नेता देश में दिखाई नहीं दे रहा। कूटनीति और दूरदर्शिता तथा कठोर निर्णय लेने की क्षमता ने उन्हें सबसे ऊपर एक अलग स्थान दिया पर इसका मतलब ये नहीं कि विपक्ष इससे हतोत्साहित होकर डिप्रेशन में चला जाये और ऊल-जुलूल बोलना चालू कर दे। ऐसे कई अवसर आये होंगे जहां विपक्ष को एकजुट होकर विवेक से काम लेना था और सरकार का उसकी कमियां या गल्तियां बता कर उस पर अंकुश लगाने का प्रयास करना था या कभी कभी प्रशंसा करने और पीठ ठोकने का भी मौका था। खासकर अंतराष्ट्रीय मंचो पर भारत का नाम रोशन हो रहा था या भारत को प्रतिष्ठा मिल रही थी या दुश्मन देश के दांत खट्टे करके हमारी जाबांज फौज लौट रही थी। पर विपक्ष ने ऐसे मुद्दे जिस पर देश के करोड़ों लोग खुशिया मना रहे थे उस पर भी मीन मेख निकालकर अपना मजाक बनबाया।

आज विपक्ष के माने यूपीए है जिसका सबसे बड़ा घटक कांग्रेस है। विपक्षी नीति निर्धारण में उसकी अहम भूमिका होती है जिससे विपक्ष द्वारा सरकार की खिंचाई की जाती है। कांगेस अकेली ऐसी पार्टी है जिसके पैर पूरे देश में पसरे हैं। ऐसी भी उसका मजबूत बना रहना देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिये आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी का लोक सभा में नेता ही विपक्ष का नेता हैं और विपक्ष के नेता को नियमानुसार विशेष दर्जा मिलता है यदि उस पार्टी को कुल लोकसभा सदस्यों की संख्या का 10 प्रतिशत प्रतिनिधत्व मिल जाता है। इधर कांग्रेस पार्टी के उतने सदस्य चुनकर नहीं आ सके इसलिये उसके नेता को विपक्षी नेता की संवैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी फिर भी उसे विपक्ष का नेता होने के कारण बहुत से अधिकार स्वत: प्राप्त है। इसलिये यहां कांग्रेस द्वारा लोक सभा में किये गये कुछ कार्यो पर नजर डालना अति आवश्यक है।

जब सरकार ने कश्मीर के मुद्दे को लेकर 370 धारा को और 32 ए को समाप्त किया था। कश्मीर के मुद्दे पर विपक्ष को सरकार के साथ खड़ा होना चाहिये था क्योंकि यह एक संवेदनशील मामला होनें के साथ देश की रक्षा से भी जुड़ा था। 370 लागू होने के कारण भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं था। भारत के झंडे की वहां प्रधानता नहीं थी, आदि। पर विपक्ष ने 370 का विरोध करना उचित समझा। विपक्ष यह भी भूल गया कि कश्मीर क्षेत्र से सारे गैर मुस्लिम लोगों को भगा दिया गया है अपने ही देश में बेघर हो गये थे। खैर विरोध करना उनकी अपनी सोच थी। कांग्रेस विरोध तक सीमित रह जाती तो शायद उसकी इतनी किरकरी न होती। विपक्ष के कांग्रेसी नेता अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा में 370 का विरोध करते यहां तक कह गये कि ‘कश्मीर का मसला राष्ट्र संघ में लम्बित है’ यानि उन्होंने ये कह दिया कि अभी इसका फैसला होना है कि कश्मीर क्षेत्र भारत में है या पाकिस्तान में। कांग्रेस कश्मीर को भारत का आभिन्न हिस्सा ही नहीं मानती तो क्या इसलिये कश्मीर से भगाये गये हिन्दुओं को वापिस बसाने की कोशिश नहीं की? क्या इसलिये हमारी फौज और पुलिस को आतंकियों की गोलियों और पत्थरों से मरवाते रहे? यदि कोई और ये कहता कि कश्मीर अभी हमारा हिस्सा नहीं है तो हम उसे तुरन्त देशद्रोही करार देते। अभी भारत के क्रिकेट मैच हारने पर पाकिस्तान के लिये बधाई देने, खुशियां मनाने वालों पर देशद्रोह लगाया गया है जबकि अधीर रंजन या विपक्षी नेताओं ने तो उससे कहीं बड़ा अपराध किया था। कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताकर राष्ट्रनीति के विरूद्ध बोले और भारत का अपमान पूरे विश्व में करवाया और पाकिस्तान को लड़ाई का एक हथियार थमा दिया। अधीर रंजन आज भी सलाखों के बाहर घूम रहे हैं, ये नरेन्द्र मोदी की दयालुता है फिर भी उन्हें विपक्ष तानाशाह कहता है।

विपक्षी पार्टी शिवसेना जिस बिल का लोकसभा में समर्थन करती है उसी का राज्यसभा में विरोध करती है और      अनुपस्थित हो जाती है। बच्चों द्वारा जिस तरह गुड्डे-गुड्यिों का खेल खेला जाता है बिल्कुल उसी तरह व्यवहार करती है।

नागरिकता कानून का विरोध भी विपक्ष ने किया था। पर कांग्रेस की विचारधारा में या नागरिकता कानून बिल खुद गांधी जी के कहने पर कि पाक में रहने वाले अल्पसंख्यक (यानि हिन्दू, सिख, ईसाई आदि सभी गैर मुस्लिम) आज या बाद में या कभी भी हिन्दुस्तान आना चाहे तो सरकार उन्हें आने में, बसाने में सहायता करेगी और ये कांग्रेस ने माना। इन्दिरा जी ने ब्रिटेन में प्रेस मे कहा था कि 1971 के बाद आये एक एक घुसपैठियों को वापिस जाना होगा। राजीव गांधी ने बहैसियत प्रधानमंत्री असम में समझौता किया था। फिर भी इस बिल का विरोध कांग्रेस ने किया। प्रियंका गांधी ने तो धरना भी रखा था। हद तो तब हो गयी जब कांग्रेस पार्टी ने सर्जिकल स्ट्राईक मनगणंत बता कर सरकार से सबूत मांगे। यहां तक कि सेना प्रमुख की बात को भी नहीं माना, गृहमंत्री की बात को भी नहीं माना आर्मी पर भरोसा नहीं जताया। इसके बाद सरकार ने सबूत पेश कर दिये। पूरे देश ने सर्जिकल स्ट्राईक देखी, पाकिस्तान में आतंकियों के अड्डों को भारत के सैनिकों द्वारा ध्वस्त होते देखी, तब भी कांग्रेस का मजाक बना था समूचा विपक्ष चौंक गया पर मनमसोस कर चुप हो गया। कोरोना वेक्सीन के मामले में तो विपक्ष ने पूरे खलनायक का काम किया। पहले वैक्सीन को फेल बताया कहा भारत में बन ही नहीं सकती फिर नरेन्द्र मोदी पर घटिया वेक्सीन बनवाने के आरोप लगाये। जब वैक्सीन सफल हो गयी तो उसे विदेश में बेचे जाने पर प्रश्न लगाये। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो वैज्ञानिकों का मजाक बनाया। वहीं सपा के एक नेता ने तो कहा कि वेक्सीन से लोग नपुंसक हो जायेंगे। कुल मिला कर देश को दुनिया की नजरों मे नीचा दिखाने का काम किया। जब प्रधानमंत्री ने कहा कि हम दिसम्बर तक 125 करोड़ वैक्सीन लगाने का काम करेंगे तो राहुल गांधी ने मजाक बनाते हुये कहा कि ये तीन सालों में भी नहीं लग पायेंगे पर आज देश अपने लक्ष्य को पूरा करने में सफल है।

विपक्ष पर जनता का भरोसा उठ गया है। विपक्ष का काम हर अच्छे बुरे सरकार के निर्णय का विरोध करना हो गया है। जहां राष्ट्र की रक्षा, एकता, अभिन्नता का सवाल आता है वहां भी देश की भलाई या हितों की परवाह किये बिना विपक्ष उसका विरोध करता। मोदी सरकार गिराने के लिये कुछ विरोधी दल के नेता खाश तौर से फारूख अब्दुल्ला चीन की मदद लेने से भी परहेज नहीं करते। महबूबा मुफ्ती तो उससे भी आगे पाकिस्तान की दोस्ती बनती है उसको बेहतर बताती हैं। ऐसे विपक्ष को जो कुर्सी के लिये देश को ताक पर रखता है, जनता अगले चुनाव में साफ कर सकती है। भले उससे लोकतंत्र की जड़े कमजोर होने का अंदेषा होगा। विपक्ष की ये देष विरोधी हरकतें खलनायक की तरह भूमिका के कारण जनता उसे पूरी तरह नकार दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कई बार विपक्षी एकता बनानें की कोशिश हुयी यहां तक कि उत्तर प्रदेश में घोर विरोधी दलों ने आपस में समझौता कर भाजपा के खिलाफ चुनाव भी लड़े पर सभी गठजोड़ मात खा गये। विपक्ष के पास कोई नीति, रणनीति नहीं थी, कोई एजेन्डा नहीं। मात्र मोदी हटाओ कुर्सी पाओं चाहे जैसे हो। ये एजेन्डा नहीं चल पा रहा है न ही कभी चल पायेगा।

हाल में राष्ट्रीय पटल पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उभरने की कोशिश की है। वे महाराष्ट्र, गोवा आदि का चक्कर लगाती हुयी दिल्ली आयी। कांग्रेस की कमजोरी का लाभ लेने में लग गयी। कमजोरी के समय हमला करना हमेशा ठीक होता है। कांग्रेस पार्टी बुरे दौर से गुजर रही है, उसके अपने नेता ही नेतृत्व के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। राहुल गांधी को गंभीरता से स्वीकार नही किया जा रहा है ऐसे में ममता का हमला बड़ा घातक होगा। ममता बनर्जी को राष्ट्र कभी भी स्वीकार नहीं करेगा उन पर तो मुस्लिम तुष्टीकरण की मोहर कांग्रेस से भी गहरी लगी है। जो काम सपा नेता मुलायम सिंह मुलायमखां बनकर और राम भक्तों पर गोली चलाकर भी नहीं कर पाये उससे अधिक ममता ने बंगाल मे खाला बनकर कर डाला। ऐसा लगने लगा है कि वे हिन्दु विरोधी ही नहीं, सनातन धर्म विरोधी और आतंकवादी राजनीति का पर्याय के रूप में देखी जाने लगी। हिन्दु विरोधी राजनीति के आरोपों के कारण लालू यादव और मुलायम सिंह की पार्टियों का जो हश्र हुआ है वही एक दिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का भी होगा। देश में कहीं से चुनाव लड़ उनकी तृणमूल पार्टी कहीं से भी नहीं जीतेगी। बंगाल में उनकी सरकार भले बन गयी है पर भाजपा ने वहां पैर जमा लिये हैं। अगले चुनाव में बंगाल ही संभालना कठिन होगा। लोकसभा में भाजपा के साथ लगभग बराबरी का हिस्सा है।

लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी लोग एक मजबूत विपक्ष होने का समर्थन करतें हैं। मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष होना प्रजातंत्र के लिये लाभ प्रद है। किसी भी सरकार का सम्पूर्ण रूप से बेलगाम होना प्रजातंत्र व्यवस्था के लिये शुभ संकेत नहीं होता है। दिशाहीन विपक्ष कुर्सी के लिये पागल बनकर अपना कर्तव्य भूल कर केवल और केवल नरेन्द्र मोदी की बुराई करनें पर केन्द्रित रहता है। नोटबन्दी पर चिल्ला-चिल्लाकर गला बैठ गया, राफेल पर राहुल गांधी ने तरह तरह के हथकंडे मोदी को बदनाम करने में अपनाये पर जनता ने एक नहीं सुनी और नरेन्द्र मोदी के फैसलों पर मुहर लगायी। कांग्रेस ही एक राष्ट्रीय पार्टी है जो विपक्ष की भूमिका ठीक से निभा सकती है। पर वह राह भटक गयी है कमजोर नेतृत्व देख कर कांग्रेस के ही दूसरे नेता सर उठाने लगे हैं। हाल में पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने 26/11 पर तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंशा और निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल उठाकर पार्टी को कटघरे में खड़ा कर दिया। सलमान खुर्शीद ने एक किताब में आपत्तिजनक टिप्पणी लिख कर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचायी। कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब के नेता नवजोत सिंह सिद्धू के आगे घुटने टेके यहां तक कि मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह द्वारा पार्टी छोडऩा भी गंवारा किया। ये सब कांग्रेस के कमजोर नेतृत्व के कारण हो रहा है।

ऐसे हालातों में कांग्रेस का विघटन, पतन हो जाना निश्चित है। कांग्रेस पार्टी खुद समाधि लेने की ओर बड़ रही है। जिस पार्टी ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी उसका ऐसे हश्र होने की कल्पना भी नहीं थी। आज की कांग्रेस महात्मा गांधी की कांग्रेस से कोसों दूर है। नेहरू गांधी का तमगा लगाकर भी राहुल गांधी कुछ नहीं कर पाये। सिद्धू जैसे मक्खन बाज चमचू नेताओं को गले लगाते है और जीवन भर कांग्रेस के सिपाही बने रहने वाले अमरेन्द्र सिंह को हटाते हैं। आखिर क्या डर लगता है उन्हे। इसी डर को दिखाकर दिग्विजय सिह ने राहुल गांधी को अपने समय के सबसे शक्तिशाली लोकप्रिय नेता अर्जुन सिह से दूर करवा दिया था।

पूरा विपक्ष मोदी टीम के रणनीतिकार अमित शाह, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी की शक्ति को पहचानता है। राहुल गांधी इसे समझ ही नहीं पा रहे। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की नेशनल कांग्रेस और कम्युनिष्ट पार्टी आदि से अधिक लोगों का भरोसा कांग्रेस पर है। राहुल गांधी को चाहिये कि वे नरेन्द्र मोदी को गरियाना छोडें़ उनकी रट-रट छोड़ें। अम्बानी, अडानी, राफेल, नोट बन्दी और कोरोना पर गलत व्यान बाजी बंद करके एक जिम्मेदार विपक्ष का दायित्व संभाले।

राहुल गांधी को समझना चाहिये कि वे मोदी जी की बराबरी में रूपये में चबन्नी भी नहीं है पर इसमे ंहताश होने की जरूरत नही। विपक्ष का कर्तव्य निभा कर लोकतंत्र मजबूत करें। वे भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, वीरप्पा मोयले, सुशील कुमार शिन्दे (सभी पूर्व मुख्यमंत्री) जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे सकते हैं। अल्पसंख्यक राजनीति के लिये मोहसिना किदवई और तारिक अनवर जैसे अनुभवी नेताओं की राय को महत्व दें। बाहर जाने वाले कांग्रेसियों से माफी मांग कर उन्हें वापिस ला सकते हैं। गंभीरता से एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभायें। यदि राहुल गांधी ऐसा करने में असमर्थ रहे तो अगले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की 400 से अधिक सांसदों के साथ प्रधानमंत्री बनने की स्थिति साफ दिखाई दे रही है।

 

 


डॉ.
विजय खैरा

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