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सोनिया परिवार के नागपाश से कांग्रेस को मुक्त करवाने का एक और प्रयास

सोनिया परिवार के नागपाश से कांग्रेस को मुक्त करवाने का एक और प्रयास

कांग्रेस को सोनिया परिवार के नागपाश से मुक्त करवाने का एक और प्रयास शुरु किया है। इस बार यह प्रयास कालीधाम बंगाल से शुरु हुआ है। ममता बनर्जी इसकी अगुआ बनी हैं। वे अपनी राजनीति का दायरा बढ़ाना चाहती हैं। वे स्वयं को क्षेत्रीय दल के बन्धन से निकाल कर अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करना चाहती हैं। वैसे भी ममता बनर्जी का स्वभाव और उसकी दृष्टि अखिल भारतीय ही रही है। वे संकुचित क्षेत्रीयता से मुक्त रही हैं। लेकिन तृणमूल के साथ वे अखिल भारतीय राजनीति नहीं कर सकतीं। ममता ने 1997 में सोनिया कांग्रेस को अलविदा कह दी थी। उसका मूल कारण कांग्रेस की राजनीति में ही ढूंढना पड़ेगा। दरअसल ज्यों-ज्यों सोनिया परिवार का कांग्रेस पर शिकंजा कसता गया त्यों-त्यों पार्टी की दृष्टि, स्वभाव और राजनीति अखिल भारतीय न रह कर परिवार के हितों तक ही सीमित होने लगी थी। इससे कांग्रेस के भीतर ही छटपटाहट बढऩे लगी। बहुत से कांग्रेसी क्षत्रपों को भी लगने लगा कि कांग्रेस अब देश के हितों का ध्यान न रख कर केवल सोनिया परिवार के हितों की रक्षा करने वाला एक दवाब समूह बनता जा रहा है। इसी के परिणामस्वरूप कांग्रेस से दूर होने की प्रक्रिया शुरु हुई। उधर सोनिया परिवार और भी तेजी से  कांग्रेस को अपने परिवार के हितों की रक्षा के लिए कवच की तरह इस्तेमाल करने लगा। स्थितियां यहां तक पहुंच गईं कि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं, यह खतरा भी स्पष्ट दिखाई देने लगा था। उस समय शरद पवार ने मेघालय के पूर्ण संगमा को लेकर मोर्चा खोला था कि वे सोनिया गांधी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे।

खैर अनेकानेक कारणों से सोनिया परिवार प्रधानमंत्री के पद पर तो कब्जा नहीं कर सका लेकिन कम्युनिस्टों की रणनीति के चलते सोनिया गांधी के नेतृत्व में अनेक राजनीतिक दलों का एक मोर्चा यूपीए के नाम से जरुर गठित हो गया, जिसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बने। उस समय कुछ काल के लिए ममता बनर्जी और शरद पवार भी अपने-अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों के लिए यूपीए में रहे। लेकिन जब यह स्पष्ट होने लगा कि मनमोहन सिंह तो नाम के प्रधानमंत्री हैं और भारत की सत्ता पर परोक्ष रूप से नियंत्रण सोनिया परिवार का ही हो गया था तो यूपीए के घटकों में भी बेचैनी बढऩी ही थी। कुछ घटक दल उससे छिटक भी गए। सोनिया परिवार द्वारा परोक्ष रूप से सत्ता संभाल लेने और उसकी गतिविधियों से आम भारतीयों में भी बेचैनी बढऩे लगी। हद तो तब हो गई जब यूपीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर दिया कि राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे, असल में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। तब यह स्पष्ट होने लगा था कि सोनिया परिवार अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए ही भारत की सत्ता का इस्तेमाल नहीं कर रहा है बल्कि वह भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को भी नष्ट करना चाहता है। सोनिया परिवार के इर्द-गिर्द जिन लोगों का घेरा था उससे यह शक और भी गहराने लगा था।

उसका परिणाम 2014 के लोकसभा चुनाव में स्पष्ट दिखाई देने लगा था। सोनिया परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस पूरे देश में केवल 44 सीटें जीत सकीं।

उस समय कांग्रेस से छिटक कर गए लोगों मसलन ममता बनर्जी, शरद पवार इत्यादि को लगता होगा कि अब सोनिया परिवार स्वयं ही कांग्रेस पर से अपना शिकंजा ढीला कर देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके विपरीत सोनिया परिवार ने कांग्रेस पर अपना शिकंजा और कसना शुरु कर दिया। इससे दो प्रकार की प्रतिक्रिया हुई। जो लोग सचमुच कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े हुए हैं, उन्होंने पार्टी के भीतर ही जी-23 के नाम से एक समूह बना कर सोनिया परिवार पर दवाब डालना शुरु किया कि वह पार्टी पर से अपनी गेंडुली समाप्त कर पार्टी को एक बार पुन: जिन्दा होने का अवसर प्रदान करे। लेकिन सोनिया परिवार ने अपनी गेंडुली ढीली करने के बजाए उसे और कसना शुरु कर दिया। कांग्रेस में बहुत से लोग ऐसे हैं जो सोनिया परिवार के सामने केवल इसलिए नतमस्तक होते थे क्योंकि इस परिवार के पास आम कांग्रेसी को जिता कर विधान सभा या लोक सभा पहुंचाने की क्षमता थी। उन्होंने जब देखा कि इस परिवार के पास अब वह जादुई क्षमता नहीं रही, भारत के लोगों ने इस परिवार से वह क्षमता छीन ली है। इतना ही नहीं परिवार का कुंवर राहुल गांधी को ही लोगों ने परिवार की परम्परागत सीट अमेठी से पराजित कर दिया। तब आम कांग्रेसी भाग कर अन्य अन्य दलों में शामिल होने लगे। और तो और रायबरेली सीट की विधायक पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गईं।

लेकिन बहुत से कांग्रेसी ऐसे हैं जो सचमुच विचारधारा के कारण कांग्रेस के भीतर हैं। यह विचारधारा कितनी प्रासंगिक है और कितनी नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है। ऐसे कांग्रेसी अपनी वैचारिक आस्था के कारण पार्टी छोड़ कर दूसरी राजनीतिक दलों में भी नहीं जा सकते हैं। लेकिन सोनिया परिवार के व्यक्तिगत हितों के लिए सम्पूर्ण पार्टी के दुरुपयोग को देखते हुए, उनके लिए पार्टी के भीतर रहना भी कठिन होता जा रहा था। ममता बनर्जी ने इस प्रकार के कांग्रेस जनों के लिए अपना दरवाजा यह कह कर खोल दिया है कि तृणमूल कांग्रेस ही वास्तव में कांग्रेस की विरासत की उत्तराधिकारी है। यह सचमुच नया प्रयोग है। सोनिया परिवार की मुख्य चिन्ता यह है कि बहुत से कांग्रेस जनों ने ममता बनर्जी की इस व्याख्या को स्वीकार भी कर लिया है और पिछले कुछ अरसे से अनेक प्रमुख कांग्रेसी तृणमूल में शामिल भी होना शुरु हो गए हैं। और अब ममता बनर्जी ने शरद पवार को भी अपने इस अभियान से जोड़ लिया है। इन प्रयासों से कांग्रेसी विरासत कितना जिन्दा होती है, इसका उत्तर तो भविष्य ही देगा लेकिन सोनिया परिवार का राजनैतिक अस्तित्व संकट में पड़ सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।

सोनिया परिवार और ममता बनर्जी के बीच की यह लड़ाई वास्तव में इस मूल प्रश्न को लेकर है कि असली कांग्रेस कौन सी है? सोनिया परिवार के कब्जे वाली कांग्रेस या फिर उससे टूट कर अलग हुए समूह की तृणमूल कांग्रेस? सोनिया परिवार अपनी कांग्रेस को असली कांग्रेस बता रहा है और ममता बनर्जी अपनी कांग्रेस को असली कांग्रेस बता रही है। लेकिन एक प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि ममता बनर्जी तो कांग्रेस के एक धड़े को लेकर 1997 में ही अलग हो गईं थीं फिर इतने साल बाद उसने असली कांग्रेस होने का दावा क्यों किया? इस बीच वे सोनिया परिवार वाली कांग्रेस से कहीं न कहीं सहयोग भी करती रही हैं। इसका शायद एक ही कारण हो सकता है। ममता को लगता होगा कि कांग्रेस की दिन प्रतिदिन गिरती जा रही स्थिति को देखते हुए शायद सोनिया परिवार इसे अपने नागपाश से मुक्त कर देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि सोनिया परिवार का आचरण तो इसके विपरीत ही हुआ। ऐसा नहीं कि कांग्रेस को सोनिया परिवार के नागपाश से मुक्त करवाने का प्रयास कांग्रेस के भीतर नहीं हुआ। यह प्रयास नरसिम्हा राव और सीता राम केसरी ने किया था। लेकिन सोनिया परिवार ने उनके साथ जो किया, उसे कोई भूला नहीं है। परिवार ने नरसिम्हा राव का दाह संस्कार तक दिल्ली में नहीं होने दिया। सीता राम केसरी को तो कार्यकारिणी से ही घसीट कर बाहर निकाल दिया गया था।  यही कारण है कि अब अंतिम उपाय के तौर पर आखिर ममता ने अपनी कांग्रेस के असली होने का दावा ठोक दिया है। यह लड़ाई कुछ-कुछ उसी प्रकार की है जिस प्रकार की लड़ाई इंदिरा गांधी के समय में इंडीकेट और सिंडीकेट के बीच हुई थी। कांग्रेस के बीच इंदिरा गांधी के धड़े को इंडीकेट कहा जाता था और मोरार जी भाई, निजलिंगप्पा और कामराज इत्यादि धड़े को सिंडीकेट कहा जाता था। आज कांग्रेस में सोनिया परिवार सिंडीकेट कहा जाता है और उसके खिलाफ लडऩे वाले धड़े को तृणमूल कहा जा सकता है। कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि उस समय सिंडीकेट हारी हुई लड़ाई लड़ रहा था। क्या कांग्रेस का इतिहास इस बार भी अपने आप को दोहराएगा?

गोवा में कांग्रेस के एक बड़े स्तम्भ  पूर्व मुख्यमंत्री एवं फिलेरियो ममता के साथ आ मिले हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता संतोष मोहन देव की बेटी सुष्मिता देव भी ममता के साथ खड़ी हो गई हैं। लेकिन इस अवसर पर उन्होंने जो कहा वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। उसने कहा कि उन्होंने अपने पिता के विचार और दिशा को त्यागा नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि उनके पिता भी मानने लगे थे कि सोनिया परिवार अब कांग्रेस की विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि अपने व्यक्तिगत हितों के लिए कांग्रेस का दुरुपयोग कर रहा है। यहां तक की पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी और बेटा अभिजीत मुखर्जी भी बनर्जी के समर्थन में आ गए हैं। मेघालय में तो पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा के नेतृत्व में विधान सभा के बारह विधायक ममता के खेमे में चले गए और इस धड़े को वहां मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी मिल गया है। त्रिपुरा के अधिकांश कांग्रेस जन ममता के तृणमूल से जुड़ गए और हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में सोनिया कांग्रेस का अधिकांश वोट बैंक भी ममता की कांग्रेस को ही असली मानकर उसके पक्ष में चला गया। अभी हाल ही में कांग्रेस के पुराने और वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरेन्द्र सिंह कांग्रेस से अलग हो गए। उन्होंने अपनी अलग कांग्रेस, पंजाब लोक कांग्रेस के नाम से बना ली है। उनका कांग्रेस की विचारधारा से इतना विरोध नहीं है। उनका भी यही आरोप है कि कांग्रेस पर सोनिया परिवार का केवल शिकंजा ही नहीं कसा बल्कि यह परिवार उन कांग्रेसियों का अपमान भी करता है जो उनके पारिवारिक हितों की पूर्ति नहीं करते। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने स्पष्ट आरोप लगाया कि परिवार के बच्चों ने उनका अपमान किया। सोनिया परिवार को नवजोत सिद्धु जैसे लोग चाहिए जो सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि वे मरते दम तक सोनिया परिवार के स्वामिभक्त रहेंगे। यह तो निश्चित था कि सोनिया परिवार के खिलाफ भीतर बगावत होनी ही थी। ममता बनर्जी का विद्रोह भी कांग्रेस के भीतर का विद्रोह ही मानना चाहिए।

ममता बनर्जी के इस अभियान में सोनिया कांग्रेस से छिटक कर अलग हुए अन्य गुट भी धीरे-धीरे जुडऩे लगे हैं। शरद पवार का साथ ममता बनर्जी को मिलना इस अभियान की दिशा में महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। शरद पवार अपने समूह के कांग्रेसियों को लेकर 1999 में सोनिया कांग्रेस से अलग हो गए थे। उस वक्त उन्हें राजनीतिक कारणों से अपना क्षेत्रीय दल नैशनल कांग्रेस पार्टी बनानी पड़ी। लेकिन उनका चिन्तन और दृष्टि भी अखिल भारतीय ही थी। अब वे भी ममता के साथ खड़े हो गए हैं। हो सकता है निकट भविष्य में सोनिया कांग्रेस से छिटके कुछ और समूह और व्यक्ति भी ममता के इस अभियान में जुड़ जाएं। देखना है ये पुराने कांग्रेसी मिल कर कांग्रेस को सोनिया परिवार के नागपाश से मुक्त करवा सकेंगे?

 

 


प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला, के कुलपति हैं)

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