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आध्यात्मिक पुनर्जागरण का स्वर्ण युग

आध्यात्मिक पुनर्जागरण का स्वर्ण युग

13 दिसंबर 2021 के दिन काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का भव्य, अलौकिक, अकल्पनीय विशाल कार्यक्रम में लोकार्पण हो गया है, भगवान शिव के इस प्राचीन दिव्य धाम के भव्य आलौकिक लोकार्पण को पूरी दुनिया ने देखा है। इस लोकार्पण को लोग अलग-अलग चश्मे से देख रहे हैं जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का शिलान्यास करने की कोशिश है या यह 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी और हिंदुत्ववादी ताकतों की विजय का भूमि पूजन है अथवा हर घटना के फोकस में खुद को रखने की उनकी कार्यशैली का काशी नवीनतम स्क्रीनशॉट है, इत्यादि। लेकिन हिंदू और हिंदुत्व की खतरनाक बहस की शुरुआत के बीच 13 दिसंबर को काशीवासियों सहित पूरे देश और दुनिया भर के हिंदुओं ने जो देखा, उसे थोड़ा राजनीति से हटकर भी देखने की जरूरत है। क्योंकि राजनीति में विकल्प हो सकता है, कायाकल्प में नहीं।

दिव्य काशी-भव्य काशी के संकल्प की अवधारणा के साथ भगवान शिव के प्रिय काशी विश्वनाथ मंदिर के कॉरिडोर का भव्य अलौकिक लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा हो चुका है। वोट बैंक की भेदभावपूर्ण राजनीति के चलते देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के बहुत सारे लोगों कि यह एक आम धारणा बन गयी थी कि सरकारों के द्वारा वोटबैंक की राजनीति के चलते भारत में सनातन धर्म के पौराणिक प्राचीन मंदिरों व अन्य स्थलों का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। लेकिन जब केंद्र में मोदी व उत्तर प्रदेश में योगी की सरकार आयी तो कुछ लोगों को लगने लगा था कि अब शायद सनातन धर्म के अनुयायियों व उनके पौराणिक प्राचीन मंदिर व अन्य धर्म स्थलों की उपेक्षा नहीं होगी। केंद्र की मोदी सरकार ने बहुसंख्यक जनसमुदाय की इस बड़ी उम्मीद पर खरा उतरते हुए  देश में विभिन्न प्राचीन धर्म स्थलों के जीर्णोद्धार करवाने की एक बेहतरीन शुरुआत की। वैसे तो काशी विश्वनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप का पुनर्निर्माण ढाई सौ वर्ष पूर्व इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्ष 1780 में कराया था, वहीं वर्ष 1853 में महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को स्वर्ण से मंडित करवाया था। लेकिन तब से लेकर अब तक सदियां बीत जाने के बाद भी देश का यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हिंदू धर्म का अहम तीर्थ उपेक्षित रहा। लेकिन समय ने करवट ली और काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार देश के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बन गया और उन्होंने इसको धरातल पर साकार करने के लिए जी जान लगा दिया।

दरअसल बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी, विद्वानों की नगरी काशी, संत कबीर और महाकवि तुलसीदास की काशी, मूर्धन्य कवि जयशंकर प्रसाद और महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की काशी, पंडित मदन मोहन मालवीय और उस्ताद बिसमिल्ला खां की काशी, लाजवाब बनारसी साडिय़ों और उसे बुनने वाले कारीगरों की काशी, अलमस्तों की काशी और कल तक सांड, सीढिय़ों और सन्यासियों से गजबजाती काशी को अपने पौराणिक और प्राचीन चरित्र के साथ एक ऐसे आधुनिक चेहरे की भी तलाश थी, जिसे निस्संदेह नरेन्द्र मोदी की संकल्प शक्ति ने अमली जामा पहना दिया है।

काशी को स्कंद पुराण में भगवान शिव ने खुद ही अपना शाही महल बताया है। एक ऐसी पवित्र नगरी जहां खुद बाबा विश्वनाथ रहते हैं।  लेकिन अपनी इस तमाम धरोहरों के बावजूद दुनिया का सबसे पुराना शहर वाराणसी अपनी तंग और गंदी गलियों के रुप में भी जाना जाता था।  महात्मा गांधी ने 1916 में अपनी वाराणसी यात्रा के दौरान ये बातें कहीं थीं, जब वे बीएचयू का उद्घाटन करने आए थे। नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद से ही काशी को उसके स्तर के मुताबिक बुनियादी ढांचा देने का ऐलान कर दिया।  8 मार्च 2019 को पीएम मोदी ने काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार का काम शुरु कर दिया। पीएम मोदी ने आर्किटक्ट से कहा कि एक ऐसा रास्ता बनाओ जिससे तीर्थ यात्रियों का मन प्रफुल्लित हो जाए। मंदिर के चारों ओर बने घरों से जिससे मंदिर परिसर से सीधा घाट दिखना बंद हो गया था। पीएम मोदी ने इसलिए बस यही मंत्र दिया कि दर्शन करने आए लोगों को घाट से पानी लेकर सीधा मंदिर में आना पड़े ऐसा रास्ता बनना चाहिए।  पीएम मोदी हर वक्त इसके निर्माण कार्य की निगरानी करते रहे और जरुरी दिशानिर्देश जारी करते रहे। भूमि के अधिग्रहण में भी कोई मुकदमा नहीं हुआ जो एक बड़ी उपलब्धि थी।  मंदिर के चारो तरफ इमारतों के गिराए जाने के बाद कम से कम 40 प्रचीन मंदिरों का भी पता चला जिनका जीर्णोद्दार किया गया। नतीजा है है पूरी तरह से नया बना हुआ भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर। और वो पूरा हुआ भी रिकार्ड चार साल में।

काशी विश्वनाथ में कॉरिडोर निर्माण से पहले किसी दर्शनार्थी के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, उसको बेहद भीड़भाड़ से जद्दोजहद करते हुए बेहद तंग गलियों वाले रास्तों पर अव्यवस्थित व्यवसायिक गतिविधियों वाली अतिक्रमणयुक्त गलियों से निकलकर जाना होता था, इन तंग गलियों से निकलकर लंबी लाइन में घंटों इंतजार करना होता था। प्रसाद वाले, फूल वाले और सुरक्षा में लगे पुलिस वालों की अव्यवस्थित भीड़ को देखकर दर्शनार्थियों को डर लगता था। लेकिन नवनिर्मित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर अब भक्तों को इन सब समस्याओं से मुक्ति दिलायेगा। उसी उद्देश्य के लिए कभी बनारस की तंग गलियों में स्थित बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द मोदी-योगी सरकार ने बहुत बड़े स्तर पर अधिग्रहण करके बड़े बदलाव किये हैं, प्राचीन व आधुनिकता के अनूठे दिव्य अलौकिक संगम के साथ मोदी-योगी की सरकार ने भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने का कार्य किया है, विश्वनाथ धाम के विस्तारीकरण और सुंदरीकरण परियोजना के तहत 5 लाख 27 हजार 730 वर्ग फीट में भव्य निर्माण किया है। इसका उद्देश्य बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के इलाकों को आधुनिक व प्राचीन के संगम के साथ दोबारा भव्य बनाना था, जिसमें केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार काफी हद तक कामयाब होती नजर आ रही है, मंदिर के पुनर्निर्माण में भव्यता प्रदान करने के लिए पत्थर वैसे ही लगाए जा रहे हैं जैसे हजारों वर्ष पहले लगाये जाते थे। मुख्य मंदिर परिसर के चार भव्य द्वार हैं, इनसे आप मंदिर, घाट और शहर की तरफ से आ सकते हैं, लेकिन परिसर में घुसते ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन नहीं होंगे, गंगा घाट की तरफ से भी पहले पायदान पर दर्शन नहीं होगा, दर्शन के लिए श्रद्धालु को मंदिर के भीतर आना ही होगा, भव्य परिसर में विश्वनाथ मंदिर के आसपास में खुली जगह बनाई गई है, मुख्य परिसर के बाहर भी एक बड़ा परिसर है जहां शॉपिंग व श्रद्धालुओं के लिए अन्य सुविधाओं की व्यवस्था होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबा विश्वनाथ धाम में पर्यावरण संरक्षण का पूरा ध्यान रखा गया है, मंदिर के आंगन में भगवान भोलेनाथ का सबसे प्रिय पौधा रुद्राक्ष लगाया जा रहा है। इसके अलावा पारिजात, अशोक, बेल के पौधे भी अपनी प्राकृतिक हरियाली बिखेरेंगे। बाबा के दिव्य मंदिर के दर्शन के लिए भक्त जब मां गंगा में श्रद्धा के गोते लगाकर जल लेकर बाबा विश्वनाथ के दरबार की तरफ आस्था से परिपूर्ण अपना एक-एक कदम बढ़ाएंगे, तब श्रद्धालु को दोनों तरफ हरियाली का अद्भुत मनमोहक दृश्य बार-बार शिव धाम आने के लिए प्रेरित करेगा और मानसिक शांति व सुकून प्रदान करेगा।

यह काल है पुनर्जागरण का। अध्यात्म भारत की आत्मा है। पिछले छह दशकों के निर्लज्जतापूर्ण अनदेखी से इस देश में अध्यात्म अपना दम तोडऩे लगा था लेकिन वर्ष 2014 ने इसमें फिर से प्राणवायु का संचार किया है। 20 साल पूरे हो चुके पीएम मोदी को सरकार का मुखिया बने हुए लेकिन इस भूमिका में उन्होंंने भारत की अंतरात्मा के केंद्र ऐसे कई मंदिरों के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार का काम अपने हाथ में ले, मानों इस देश की धमनियों में एक नयी ऊर्जा का संचार किया है। इसमें कोई शक नहीं की प्रधानमंत्री मोदी इस बात में यकीन रखतें हैं कि 1000 साल के विदेशी आक्रांताओं के शासन में जो सभ्यता का संघर्ष चला, जो ज्यादतियां हुईं और इन सबके बीच भारत के इन पवित्र मंदिरों ने आस्था और धर्म को बचाए रखने और उसके फिर से उत्थान में बड़ी भूमिका निभायी है। इसलिए पद संभालते ही नरेंद्र मोदी उनके पुनरोद्धार में लग गए।  सनातन धर्म, सभ्यता और सांस्कृतिक परंपरा को पूरी दुनिया में फिर से स्थापित करने का काम पीएम मोदी ने किया है। यह देश के आध्यात्मिक पुनर्जागरण का स्वर्णिम काल है।

हिन्दू तन-मन

इसमें शक नहीं कि बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने करोड़ों हिंदुओं के मन में अपना स्थान फिर से आरक्षित कर लिया है। इस पूरी और आगे तक चलने वाली परियोजना का संदेश भले चुनावी ही क्यों न हो, लेकिन इस सवाल को जन्म देता है कि इसके पहले किसी ने ऐसा करने का साहस क्यों नहीं दिखाया? आस्था पर संकल्प शक्ति हावी क्यों न हो सकी? किसी भी देश के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत और धरोहर को पहचानना और उस पर गर्व करना कितना आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी ने काशी यात्रा के जरिए भारत के लोगों का उनकी विरासत से एक नया परिचय करवाया।  इस दौरान उन्हें दुनिया को ये बताते हुए जरा भी संकोच नहीं हुआ कि वो एक हिन्दू हैं और हिन्दुत्व की जीवन पद्धति का पालन करते हैं।  इससे पहले हमारे देश के प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े नेता अपने आपको खुल कर हिन्दुत्व से जोडऩे में संकोच करते थे और अपने धर्म को लेकर हमेशा बैकफुट पर रहते थे।

प्रधानमंत्री मोदी के पहले केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई सभी सरकारें मंदिरों का पुनरोद्धार करना तो दूर उन कामोंं पर चर्चा तक नहीं करती थी।  पिछले कुछ दशकों में एक के बाद एक बनी केंद्र सरकारों का ऐसा नकारात्मक रवैया देश की प्राचीन अध्यात्मिक परंपरा को ठेस पहुंचाने का ही काम किया है। आजादी के बाद के इतिहास को खंगालें तो इसके पीछे भी एक ही मुख्य कारण था। हिन्दू कहलवाने से परहेज।  सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए के एम मुंशी ने पहल की थी। उनके प्रयासों से ही एक प्रांत का मुद्दा राष्ट्रीय और हिंदू गौरव के रुप में दुनिया भर में जाना गया। उस दौर के सभी नेता जानते थे की तत्कालीन पीएम नेहरु मंदिरों के पुनर्निर्माण को पसंद नहीं करते थे। नेहरु ने के एम मुंशी को कहा था कि उन्हें सोमनाथ के जीर्णोद्धार की कोशिश अच्छी नहीं लगी क्योंकि इससे हिंदू धर्म फिर से जागृत होगा। लेकिन फिर भी सोमनाथ मंदिर बना और पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को उसके उद्घाटन में जाने से रोकने की नेहरु की कोशिश भी असफल रही। भव्य सोमनाथ मंदिर बना लेकिन मोदी के पीएम बनने तक सोमनाथ की तर्ज पर किसी भी मंदिर के जीर्णोद्धार का काम शुरु नहीं हो पाया।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्थितियां बदलनी शुरु हो गयी। पिछले 20 सालों में मोदी ने कई प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम शुरु किया और उसे पूरा कर के दिखाया है। प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों, हमारी सभ्यता, संस्कृति के प्रतीक रहे इन मंदिरों के पुन: निर्माण का काम पीएम मोदी को महान हिंदू रानी अहिल्या बाई होल्कर की श्रेणी में डाल रहा है जिन्होंंने 18वींं सदी में मंदिरों के निर्माण और उनके जीर्णोद्धार का अभूतपूर्व कार्य किया था जो आने वाली पीढिय़ों के लिए एक उदाहरण बना। पूरी दुनिया जानती है कि पीएम मोदी अपनी भक्ति लोगों के सामने ही करते हैं। साथ ही सूत्र बताते हैं कि पीएम मोदी ये मानते हैं कि देश का आध्यात्मिक जागरण तभी होगा जब यहां कि धार्मिक और पावन स्थलों को उनकी पुरानी पहचान लौटाई जाएगी। इसलिए पीएम मोदी का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है कि पूरे देश में बने धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केन्द्रों का पुनर्निर्माण कर उन्हें भव्य बनाया जाए। इसलिए पीएम मोदी हर मंदिर के पुनर्निर्माण के काम की अध्यक्षता कर रहे हैं। काशी के कायाकल्प को महज चुनावी चौपड़ के सीमित दायरे में देखना सही नहीं होगा। यकीनन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल के दौरान ही असंभव से लगने वाले इस काम को शुरू करके उसे अंजाम तक पहुंचाया है।

परंपरावादियों और अधार्मिकों की आलोचना काम में रोड़े अटकाती ही है। क्योंकि इसमें उनके निहित स्वार्थ जुड़े होते हैं। लेकिन मोदी ने विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के साथ न सिर्फ आलोचकों का मुंह बंद किया बल्कि उन तमाम राजनेताओं के सामने यह नजीर भी पेश कर दी है कि संकल्प शक्ति हो तो कुछ अच्छे स्थायी काम भी किए जा सकते हैं।

नीलाभ कृष्ण

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