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नए भारत की दिव्य काशी

नए भारत की दिव्य काशी

भारत ने 13 दिसम्बर को सांस्कृतिक एवं धार्मिक रूप से ऐसे युग में प्रवेश किया है, जहां दिव्यता भी है और भव्यता भी। भारत ही नहीं पूरे विश्व का सबसे प्राचीन नगर कहां जाने वाला काशी, महादेव प्रभु श्री शिव के त्रिशूल पर स्थित काशी का कायाकल्प विश्व ने देखा। विश्व ने देखा कि कौन-कौन से मंदिर छिपे हुए थे। उन मंदिरों को क्यों छिपना पड़ा था? क्यों महादेव की काशी गलियों का नगर हो गयी थी? क्यों विकास की समस्त धाराएं बाधित हो गयी थीं?

भक्ति का नगर कैसे कुव्यवस्थाओं की बलि चढ़ता गया था। कैसे एक समय में भारत को सांस्कृृतिक रूप से समृद्ध करने वाला नगर बजबजाती नालियों का शहर हो गया था, जिसके विषय में स्वयं महात्मा गांधी को दु:ख व्यक्त करना पड़ा था। भारत के लिए या कहें हिन्दुओं के लिए काशी क्या है, यह हर कोई जानता है और यह भी हर कोई जानता है कि काशी ने कैसे इतने युगों तक हिन्दुओं की चेतना को जागृत रखा हुआ है।

काशी हिन्दुओं के संघर्ष और जागृत चेतना का नाम है।

तीर्थ के रूप में वाराणसी का उल्लेख महाभारत में भी प्राप्त होता है-

अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह।

दर्शनादेवदेस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया।।

(महाभारत, वन।, 84/18)

ततो वाराणसीं गत्वा देवमच्र्य वृषध्वजम्।

कपिलाऊदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत्

(महाभारत, वन।, 82/77)

ऐतिहासिक रूप से काशी विश्व की सबसे प्राचीन नगरी है। काशी की प्राचीनता और इसकी महिमा की गवाही ऋग्वेद भी देता है।

उताभये पुरूहत श्रवोभिरेको दरुहमवदो वृतहा सन।

इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत्संग्रिभ्यना मधवंकाशीरित्तो।। (ऋग्वेद 3/30/5)

अर्थात् पुरूहुत ऐश्वर्वान इंद्रदेव बल से युक्त होकर आपने अकेले ही वृतासुर का संहार करके जो वचन बोला है, वह सत्य से परिपूर्ण है। आपने दूर होते हुए भी द्यावा और पृथ्वी को संयोजित किया है। आपकी यह महिमा काशी के समान विख्यात है।

काशी ज्ञान की नगरी है तथा इसकी आध्यात्मिकता का सूत्र गंगा नदी है। काशी में प्राचीन काल से ही ज्ञान गंगा बहती आई है। महर्षि अगस्त्य से लेकर आदि गुरु शंकराचार्य के ज्ञान की साक्षी यह नगरी रही है। महर्षि अगस्त्य वेदों में वर्णित मन्त्र दृष्टा मुनि हैं। व्याकरण की रचना करने वाले महर्षि पाणिनि भी काशी के ही थे। उन्होंने काशी शब्द को गण के रूप में दिखलाया है :

काश्यादिभ्यष्ठञत्रिठौ-अष्टाध्यायी 4-2-116

महान चिकित्सक एवं चरक संहिता की रचना करने वाले पतंजलि भी काशी में ही निवास करते थे। यह काशी ही थी जहां पर अद्वैत दर्शन के महान आचार्य आदिगुरु शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ था।

परन्तु काशी की इस ज्ञान परम्परा को इस्लाम के आक्रमण के उपरान्त अत्यंत कठिन समय का सामना करना पड़ा था। भारत पर विधर्मियों की नजर मात्र इसके भौतिक वैभव के आधार पर ही नहीं थी, बल्कि वह इसकी सांस्कृतिक पूंजी को नष्ट करना चाहते थे। वह सब कुछ ध्वस्त कर देना चाहते थे। वह चाहते थे कि सब कुछ मिट जाए और शेष रह जाए उनका विध्वंस। और इसी क्रम में जब भारत पर कुतुबद्दीन ऐबक का राज हुआ तो उसने 1194 में बनारस पर विजय पाई और इस वैभवशाली एवं भव्य नगर को उन्होंने एक ऐसे अधिकारी के अधीन कर दिया जिसने बनारस से मूर्तिपूजा को हटाने का पूरा प्रयास किया।

‘काशी का इतिहास’ पुस्तक में डॉ. मोती चन्द्र लिखते हैं कि गुलाम वंश के सुल्तानों के समय में बनारस में कई मस्जिदें हिन्दू मंदिरों को तोडक़र बनवाई गईं। इनमें से मुख्य हैं दारानगर से हनुमान फाटक की सडक़ पर अढाई कमरे की मस्जिद, चौखम्बा मोहल्ले की चौबीसों खम्बों वाली मस्जिद, गुलजार मोहल्ले में मकदूम साहब की कब्रगाह और भदऊं मोहल्ले की मस्जिद भी हिन्दू मंदिरों के सामान से ही बनी है।

जो काशी महादेव के मंदिरों का नगर था, वह अब धीरे-धीरे इस काल में स्वयं पर हुए विध्वंस से कांप उठा था। उसके बाद लोदी वंश तक बनारस पर आक्रमण होते रहे, बनारस के मंदिरों को तोड़ा जाता रहा। सिकंदर लोदी कट्टर मुसलमान था, और मुस्लिम इतिहासकार उसे सच्चा गाजी मानते थे। मंदिरों को नष्ट करने में वह सबसे आगे था और बनारस में भी शायद ही कोई भी ऐसा मंदिर न रहा हो, जो उसके इस अत्याचार से बच रहा हो।

परन्तु बनारस में हर विध्वंस के बाद जीवित होने की सामर्थ्य थी, यह सामर्थ्य थी महादेव के कारण। महादेव के भक्त दोगुनी श्रद्धा से अपने प्रभु का मंदिर बनवाने के लिए आगे आ जाते थे। अत्याचारों के उपरान्त भी अपनी पूर्ववत अवस्था, अपने पूर्व के वैभव में जाने का अद्भुत गुण है बनारस में।

इधर लोग मन्दिरों को तोड़ रहे थे तो वहीं चौदहवीं शताब्दी तक कई मंदिर अपनी पूर्ववत अवस्था में आ चुके थे।

काशी ने जहां अतीत में आदिगुरू शंकराचार्य को ज्ञान प्रदान किया था तो इसी विध्वंस काल में रामानंद, कबीर एवं वल्लभाचार्य अपने ज्ञान से आहत हिन्दुओं के कष्ट हर रहे थे। वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैतवाद मत प्रतिपादित किया। हिन्दुओं की चेतना पर प्रहार हो रहे थे तो उनकी चेतना को जागृत करने के लिए काशी में कई ऐसे संत महात्माओं का जन्म होता रहा है, जिन्होंने हर काल में हिन्दुओं को चेतना प्रदान करने का कार्य किया है।

बनारस के इतिहास में औरंगजेब का नाम सबसे अधिक प्रमुखता से लिया जाता है क्योंकि यह औरंगजेब ही था जिसने बाबा विश्वनाथ के मंदिर को तोड़ा ही नहीं बल्कि उस पर मस्जिद भी बना दी। कट्टर मुसलमान औरंगजेब ने अपने पिता को कैद में डालने के बाद सहिष्णुता का परिचय दिया था। परन्तु जब शिवाजी उसकी कैद से सकुशल छूटकर चले गए तो उसने उसका क्रोध काशी विश्वनाथ मंदिर पर निकाला एवं ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक शिक्षा दिए जाने का बहाना बनाकर सभी मंदिरों को तोडऩे का निर्देश दिया। शी के मंदिर को तुड़वाने का कारण पूरी तरह से धार्मिक था। मासिर-ए-आलमगीरी में लिखा है कि बनारस में ब्राह्मण काफिर अपने विद्यालयों में अपनी झूठी किताबें पढ़ाते हैं और जिसका असर हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों पर भी पड़ रहा है

फिर इसे पुसतक में आगे लिखा है कि आलमगीर के आदेश के उपरान्त मंदिर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है।

वर्ष 1699 में तोड़े गए मंदिरों का पुनर्निर्माण बाद में महारानी अहल्याबाई ने किया था। परन्तु उनका जो अधूरा स्वप्न था, अब वर्ष 2021 में भारत के यशशवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है।

अतीत के विध्वंस की पीड़ा मिट नहीं सकती है, परन्तु नव निर्माण से वह कम अवश्य हो सकती है। न जाने कब से हिन्दू चेतना पर मंदिरों के विध्वंस के कारण प्रहार होते आ रहे हैं, परन्तु महादेव के भक्त बार बार उसी चेतना के कारण वापस आ जाते हैं।

जब बाबा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर की संकल्पना एवं परिकल्पना की गयी थी तो समर्थन के साथ साथ यह भी चिंता थी कि क्या कहीं पुराने मंदिरों को तो नहीं कुछ होगा? गलियों में जो मंदिर आक्रमणकारियों के भय के कारण छिपा दिए गए थे क्या वह वह टूट तो नहीं जाएंगे? क्या वह विस्थापित ही तो नहीं रह जाएंगे?

परन्तु जब यह कॉरिडोर बनकर सामने आया तो उसी दिव्य काशी के दर्शन हुए जैसा वर्णन महाभारत के वनपर्व में किया गया है। बाबा की नगरी काशी, जहां पर लोग मोक्ष की तलाश में आते हैं, जहां पर लोग ज्ञान की तलाश में आते हैं। जहां पर मुस्लिम आक्रान्ताओं के आक्रमण भी आकर विफल हो जाते हैं और हर युग में कोई न कोई महादेव भक्त अपनी जिजीविषा लेकर आ जाता है, चेतना को जागृत करने!

बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना के माध्यम से एक बार फिर से भारत उसी दिव्यता का विस्तार करने जा रहा है, जैसा वह अतीत में करता हुआ आया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के भीतर उसी अध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर दिया है, जो शताब्दियों से प्रतीक्षित थी।

आज फिर से विध्वंस पराजित हुआ है और आज फिर से भारत की ऊर्जा, भारत की चेतना की विजय हुई है! काशी एक बार पुन: अपने वैभव को प्राप्त कर रही है ।

 

 

 

     अरविंद सिंह

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