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कारीडोर के जरिए सामाजिक बदलाव का संदेश

कारीडोर के जरिए सामाजिक बदलाव का संदेश

लक्ष्मीकांत वर्मा की एक किताब है, उत्तर प्रदेश में गांधी। इस किताब के मुताबिक, अपने राजनीतिक गुरू गोपालकृष्ण गोखले के सुझाव पर रेल यात्रा करते हुए जब गांधी पहली बार वाराणसी पहुंचे थे, तब उन्हें काशी विश्वनाथ मंदिर में दुखद अनुभव हुआ था। गुजराती समझ वहां के एक पंडे ने उनसे मोटी दक्षिणा की उम्मीद की थी। गांधी से मनचाही दक्षिणा नहीं मिली, तो पंडे ने उनसे बदसलूकी की थी। वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में दिए गांधी के भाषण का जिक्र तो इतिहास की मशहूर घटना है। इस भाषण में उन्होंने विश्वनाथ मंदिर जाने वाली गलियों की गंदगी की तरफ ध्यान दिलाया था।

यह संजोग ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गांधी के गुजरात से ही आते हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में तीन लोकन ते न्यारी काशी की नुमाइंदगी करने वाले प्रधानमंत्री मोदी बनारस और गांधी से जुड़ी इन घटनाओं को नहीं जानते होंगे। तो क्या काशी विश्वनाथ कारीडोर के विकास की कहानी को बनारस से जुड़े गांधी के इन ऐतिहासिक अनुभवों से जोड़ा जा सकता है? क्या बाबा विश्वनाथ के ऐतिहासिक मंदिर के पुनरूद्धार और उसे चमाचम बनाने के लिए मोदी को प्रेरणा गांधी के इन अनुभवों से ही मिली। इसकी संभावना तो बनती है, क्योंकि प्रधानमंत्री अक्सर हर मौके पर गांधी को याद करते हैं। गांधी जयंती के ही दिन साल 2014 में उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की खुद फावड़ा उठाकर शुरूआत की थी।

काशी विश्वनाथ कारीडोर से गुजरने और इसके जरिए मंदिर जाने वाले लोग बता रहे हैं कि आखिर वाराणसी में क्या बदला है। वाराणसी की जिस गंदगी की तरफ गांधी ने बसंत पंचमी के दिन 14 जनवरी 1916 को ध्यान दिलाया था, कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने पहली बार ध्यान दिया। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, सदानीरा गंगा भगवान शिव की जटा से ही निकली हैं। प्रतिश्रुति है कि यही वजह है कि वह वाराणसी स्थित शिव का अभिषेक करने के लिए उत्तरमुखी रूख अपना रखी हैं। गंगा और भोले का रिश्ता सनातन समाज के हर व्यक्ति को पता है। याद कीजिए, 2014 का आम चुनाव। वाराणसी से पर्चा दाखिले के बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, मुझे मां गंगा ने बुलाया है। ऐसा कैसे हो सकता है कि गंगा मां जिसे बुलाए, वह व्यक्ति गंगा की पौराणिक धारा को ही भूल जाए। अतीत में गंगा स्नान करने वाले श्रद्धालु धारा के बीच से ही मंदिर का दर्शन करते थे और वहां से जल भरकर सीधे मंदिर पहुंचते थे। लेकिन बाद के दौर में हुए अतिक्रमण और कुछ अत्याचारी शासकों द्वारा मंदिर में हुई तोडफ़ोड़ के बाद यह मार्ग लगातार सिकुड़ता चला गया। लेकिन गंगा मां के बुलावे पर पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस राह को बेहद साफ बना दिया है।

यह सच है कि जब काशी विश्वनाथ कारीडोर का काम हुआ तो स्थानीय राजनीति की ओर से इसे उकसावे का कार्य बताने की कोशिश हुई। जिनके कब्जे में कारीडोर बनाने वाली जमीन थी, उनकी ओर से विरोध की आवाजें उठने-उठाने के प्रयास भी हुए। लेकिन वाराणसी के लोगों को जब समझ में आया कि करीब तीन सौ साल से बदहाल बाबा के कारीडोर की सफाई के पीछे कोई राजनीति नहीं है, विरोध के सुर खुद-ब-खुद शांत हो गए। जिन्हें काशी का स्वभाव पता है, वे जानते हैं कि वाराणसी के लोगों के मन में बाबा यानी विश्वनाथ को लेकर कैसी भावना है। शिवरात्रि के दिनों में जैसे पूरा वाराणसी ही शिव भक्ति में झूमता नजर आता है। शायद विरोध की राजनीति इस तथ्य को समझने का प्रयास नहीं करती। यही वजह है कि बिना किसी विरोध और वितंडा के इच्छित जमीन का अधिग्रहण हुआ और काशी विश्वनाथ कारीडोर का निर्माण पूरा हुआ।

काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के लिए जमीन अधिग्रहण करना आसान भी नहीं था। इस इलाके में 400 परिवार रहते थे, जिनके 1400 लोगों को शिफ्ट कराना सामान्य बात नहीं थी। इस प्रक्रिया में सरकारी खजाने से 370 करोड़ रूपए खर्च हुए। शिफ्ट कराए जाने वाले परिवारों के लिए सरकार ने 314 मकान खरीदे,  जिसमें 370 करोड़ रूपए लगे। हालात का जटिलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक प्रॉपर्टी के 70 मालिक थे, जिन्होंने उसे किराये पर चढ़ाया था। लेकिन सरकारी प्रक्रिया ने चुस्ती और चतुराई दोनों दिखाई। इस प्रॉपर्टी को खाली कराया गया और इसकी राह में कोई कानूनी दांव-पेंच भी नहीं आया। खाली कराए गए घरों को जब तोड़ा गया तो उन घरों से करीब 40 प्राचीन मंदिरों की जानकारी मिली। यानी ये घर मंदिरों पर बनाए गए थे। बहरहाल अधिग्रहण के बाद बाबा विश्वनाथ मंदिर का परिसर 2000 वर्ग मीटर से बढक़र 52 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा हो गया है। जाहिर है कि ऐसा कर पाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संजीदा दृष्टि और निर्देशन से ही संभव हो पाया।

नरेंद्र मोदी के हाथों संपन्न काशी विश्वनाथ कारीडोर का कामकाज सफलता पूर्वक पूरा होने के मौके पर इतिहास की गलियों की कुछ घटनाओं की ओर फिर से झांक लेना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से सच है कि औरंगजेब के आदेश पर काशी विश्वनाथ मंदिर को तोडऩे का काम शुरू हुआ और दो सितंबर 1669 को इस कार्य के पूरा होने की उसे सूचना दी गई। लेकिन इस मंदिर की मुक्ति की संजीदा कोशिश इसके करीब 93 साल बाद 1752 से 1780 के बीच शुरू हुई। इन कोशिशों के पीछे मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया और मल्हारराव होल्कर रहे। लेकिन असफलता ही हाथ लगी। बाद में 1777 से 1780 के बीच इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का पुनरूद्धार कराया। जिस पर महाराजा रणजीत सिंह ने बाद में सोने का छत्र लगवाया, जबकि नेपाल नरेश ने विशाल नंदी की मूर्ति बनवाई। यानी कह सकते हैं कि करीब 241 साल बाद जाकर विश्वनाथ मंदिर के पुनरूद्धार का कार्य पूरा हो पाया है।

गांधी हाशिए पर पड़े व्यक्ति को दरिद्र नारायण कहा करते थे। उनका कहना था कि दरिद्रनारायण के आंसू पोंछे बिना स्वाधीनता मुकम्मल नहीं। उनके सपनो के भारत में आम आदमी की क्या हैसियत थी, इसे उनकी लिखी पुस्तिका हिंद स्वराज से लेकर बाकी लेखों में देखा जा सकता है। यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान और कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर होने के बावजूद सामाजिक स्तर पर बराबरी और सम्मान का यह लक्ष्य अभी तक हासिल नहीं किया जा सका है। भगवान भोले औघड़दानी हैं। वे आशुतोष हैं और उनकी मंडली में जो भूत-प्रेत हैं, वे दरअसल हाशिए के लोगों के ही प्रतीक हैं। काशी विश्वनाथ कारीडोर के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने जो किया, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। कारीडोर के कार्य में लगे मजदूरों का सम्मान करने में लोगों को चाहे जितनी भी राजनीति नजर आ रही हो, यह सच है कि इस कदम के जरिए प्रधानमंत्री ने ना सिर्फ बराबरी और सम्मान का संदेश दिया है, बल्कि कमजोर लोगों के बीच भरोसा बढ़ाने का भी काम किया है। इससे कमजोर तबके को लगता है कि अब राजनीति बदल रही है। पता नहीं सच है कि गलत, लेकिन यह आम धारणा है कि ताजमहल बनाने वालों के हाथ काट लिए गए थे। जिस देश में ऐसी धारणा हो, वहां का प्रधानमंत्री अगर कारीडोर को सजाने और तराशने वाले हाथों को थामता है, उन पर फूल वर्षा करता है और उनके साथ वही भोजन करता है, जो वे कर रहे हैं, इससे बड़ा समता का संदेश क्या होगा? वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब प्रधानमंत्री ने ऐसा किया है। 26 फरवरी 2019 के दिन वाराणसी से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर प्रयागराज में भी ऐसा ही काम किया था। तब उन्होंने प्रयाग कुंभ की सफाई व्यवस्था में लगे लोगों के पांव धोए थे। इन कदमों से प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी के दरिद्रनारायण के आंसू पोंछने के सपने को ही विस्तार दिया है।

अगर राजनीति कोई कदम उठाती है तो उसके सियासी नफा-नुकसान होते ही हैं। प्रधानमंत्री मोदी चूंकि इसी राजनीतिक व्यवस्था के एक हिस्से हैं, इसलिए उनके इन कदमों के पीछे राजनीति देखी ही जाएगी। वैसे भी जिस तरह 2014 से भारतीय राजनीति का विपक्षी खेमा अपनी सफलता की राह खोज रहा है, ऐसे में उसके समक्ष प्रधानमंत्री के कदमों में राजनीति ढूंढऩे के अलावा दूसरा कोई आधार होना भी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि आज के बीस-पच्चीस, पचास साल बाद जब इन कदमों की चर्चा होगी, वे इतिहास के बड़े कदमों के तौर पर याद किए जाएंगे।

 

 

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं)

 

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