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अब मथुरा की बारी है …

अब मथुरा की बारी है …

उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव मौर्य का आह्वान श्रीकृष्ण की शाश्वत सत्ता को जन-चेतना से एकाकार करने का सराहनीय प्रयास

श्रीकृष्ण जन्मस्थान मुक्ति का विषय पुन: विमर्श के केंद्र में है। यद्यपि यह विमर्श भले ही मीडिया की सुर्खियों में अब आया हो, किंतु यह भारत के जन-मन की इच्छा का वह प्रकटीकरण है जो साढ़े तीन सौ वर्षों से पल रही है। उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस जन इच्छा को पुन: स्वर दे दिया है। केशव प्रसाद मौर्य की इस मुखरता के चाहे जो भी अर्थ निकाले जाएं, किंतु इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि अब श्री राम जन्मभूमि की भांति ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान की मुक्ति के लिये भी गतिशीलता बढ़ेगी।

केशव मौर्य का श्रीकृष्ण के मूल जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण का यह आह्वान श्रीकृष्ण की शाश्वत सत्ता को जन-चेतना के साथ एकाकार करने का काम कर रहा है। भगवान राम ने वंचितों, वनवासियों को जोडक़र आतंक रूपी लंका को ध्वस्त किया था और धर्मसत्ता का परचम लहराया था। भगवान श्रीकृष्ण ने जनसामान्य को अपने साथ रखकर, उनके सखा व सारथी बनकर आततायियों के विरुद्ध क्रांति की थी और अन्याय व अहंकार का नाश किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का नेतृत्व भी श्रीराम व श्रीकृष्ण के इन्हीं आदर्शों पर चलकर समाज के वंचित, दलित, शोषित, पीड़ित समूहों को जोडक़र अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, आतंक, तुष्टीकरण के नाश के साथ ही अंत्योदय अर्थात समाज के सभी व्यक्तियों एवं समूहों के उत्थान एवं भारतीय संस्कृति का उन्नयन व संवर्धन एवं समस्त विश्व में उसका जय-घोष करने की उसी नीति व लक्ष्य की प्राप्ति के लिये संकल्पित व प्रतिबद्ध है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में और अब उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव मौर्य के कार्यकाल व कार्यशैली को देखें तो स्पष्ट होता है कि वह श्रीकृष्ण के जीवन आदर्शों को आत्मसात् किये हुए हैं। वर्ष 2017 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पार्टी ने उन्हें जो उत्तरदायित्व व लक्ष्य दिया, उसे उन्होंने श्रीकृष्ण के सच्चे भक्त की भांति कर्मयोग समझकर पूरे परिश्रम व लगन से न केवल सफलतापूर्वक पूरा किया, अपितु जन-चेतना को कल्याणकारी आयाम देने एवं भारतीय संस्कृति के संवर्धन व जयगान करने की पार्टी के लक्ष्य व प्रतिबद्धता को भी आगे बढ़ाया। सर्व समाज एवं सभी समूहों में उनकी लोकप्रियता इसी का परिणाम है।

श्रीराम व श्रीकृष्ण इस राष्ट्र की आत्मा हैं तो शिव इसकी प्राण ऊर्जा हैं और भारतीय संस्कृति के आधार तत्व हैं। किसी राष्ट्र की उन्नति उसकी संस्कृति के आधारों की उपेक्षा करके नहीं हो सकती है। विशेष रूप से भारतीय संस्कृति की उपेक्षा तो इस राष्ट्र ही नहीं, अपितु समस्त विश्व के लिये घातक होगा, क्योंकि एकमात्र भारतीय संस्कृति ही ऐसी है जिसमें अपनी वैज्ञानिकता एवं शाश्वतता के कारण जीवित व प्राणवान् होने की क्षमता है। एक जीवित व प्राणवान् संस्कृति ही विश्व व मानव कल्याण का पथ प्रदर्शन कर सकती है। केशव जी ने जो यह कहा है कि अयोध्या, काशी में भव्य मंदिर का निर्माण जारी है, मथुरा की अब तैयारी है, तो यह भारत के आधार तत्वों पर गौरव बोध एवं उनकी पुनसर््थापना के लिये जन-मन के उद्गार का स्वर है।

अयोध्या जी में मुगल आक्रांताओं के बाबरी कलंक को नष्ट कर उसके स्थान पर भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण उन्हीं आधार तत्वों की पुनर्स्थापना का सफल व सराहनीय प्रयास था और शीघ्र ही वहां भव्य मंदिर पूर्णत: साकार होने वाला है। विश्व का एकमात्र प्राचीन जीवित नगर काशी का वैभव लौट रहा है। इस कड़ी में मथुरा में आतंकवादी औरंगजेब के कलंक को हटाकर कृष्ण लला को उनके मूल जन्मस्थान पर विराजित करने के लिये विधिक संघर्ष चल रहा है। ब्रिटिश काल के प्रख्यात इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि 9 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने काफिरों (मूर्ति पूजा करने वाले) की समस्त गुरुकुल व पाठशालाएं एवं मंदिरों को ध्वस्त करने एवं हिंदुओं की धार्मिक शिक्षाओं व क्रियाकलापों को बंद करने का आदेश दिया था। औरंगजेब की इस ध्वंसकारी प्रवृत्ति का शिकार सोमनाथ मंदिर, बनारस का विश्वनाथ मंदिर और मथुरा का केशव राय मथुरा का मंदिर भी बना। केशव राय मंदिर वही था जो श्रीकृष्ण का मूल जन्मस्थान है और इसी मंदिर पर आज वहां ईदगाह खड़ा है।

कुतुब मीनार से लेकर बनारस के ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा के ईदगाह सहित बहुत सारे इस्लामी ढांचों में आज भी मंदिर के साक्ष्य स्पष्ट दिखते हैं। किंतु अयोध्या, मथुरा व काशी वो पवित्र स्थान हैं, जो केवल हिंदुओं की आस्था से ही नहीं जुड़े हुए हैं, अपितु ये राष्ट्र की आत्मा और संस्कृति के आधार से जुड़े हुए हैं, अत: सबसे पहले इनको इस्लामी अतिक्रमण के मुक्त कराने की भावना भारतीयों में प्रबल है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

जहां तक भाजपा की बात है, तो वह मातृ संगठन आरएसएस द्वारा अपनी स्थापना के साथ ही निर्धारित किये गये भारत के सांस्कृतिक पुनत्र्थान के लक्ष्य को आगे ले जाने को संकल्पित है। भाजपा का घोषित मत है कि अयोध्या, मथुरा और काशी हिंदू समाज का पवित्र स्थल है और हिंदू समाज को उन्हें प्राप्त करने का पूर्ण नैतिक अधिकार भी है और संवैधानिक अधिकार भी। भाजपा इन तीनों पवित्र स्थलों पर हिंदू समाज के पूर्ण अधिकार के संघर्ष की कानूनी लड़ाई में साथ है।

लोकतंत्र भी जनभावना के सम्मान के मूल्य पर आगे बढ़ता है और जनभावना यही है कि अयोध्या, मथुरा व काशी आक्रांताओं के कलंक से मुक्त हों और भारत का संविधान भी यही कहता है कि किसी के साथ अन्याय न हो। विगत एक हजार वर्षों से इस्लामी आक्रांताओं के अत्याचार व अनाचार का दंश आज भी देश झेल रहा है। हिंदुओं के पवित्र धर्मस्थानों को तोडक़र बनाये गये इस्लामी ढांचे आज भी न केवल भारतीयों को आहत कर रहे हैं, अपितु गरिमा व सम्मान से जीने एवं अपने धर्म व परंपराओं का पालन करने के संवैधानिक अधिकार से भी वंचित कर रहे हैं। तुष्टीकरण की नीति के कारण हिंदुओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन अनुचित है और संवैधानिक रूप से इस अन्याय से मुक्ति मिलनी चाहिए, यही जनभावना कहती है। केशव मौर्य ने इसी जनभावना को प्रकट कर देश के एक अरब से अधिक हिंदुओं की इच्छा व चेतना को बल प्रदान किया, जिसकी न केवल सराहना होनी चाहिए, अपितु इस पर विचार मंथन कर इस जनभावना के सम्मान का उपाय भी ढूंढा जाना चाहिए।

हरीशचंद्र श्रीवास्तव

 

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