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अखंड होना भारत की नियति है

अखंड होना भारत की नियति है

‘अखंड भारत’ की सोच और संकल्पना एक बार पुन: सामाजिक-सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। 25 नवंबर को ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ पुस्तक के विमोचन के अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा-  ‘‘अखंड भारत, बल नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के जरिए संभव है। दुनिया के कल्याण के लिए गौरवशाली अखंड भारत की आवश्यकता है, इसलिए देशभक्ति को जगाए जाने की जरूरत है…छोटे किए गए भारत को फिर से एकजुट किए जाने की आवश्यकता है, भारत से अलग हुए सभी हिस्सों, जो स्वयं को अब भारत का हिस्सा नहीं बताते हैं, उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है।’’ इसके ठीक दो दिन पश्चात 27 नवंबर को ग्वालियर के प्रबुद्ध नागरिकों के बीच उन्होंने ‘अखंड भारत’ का संकल्प दुहराते हुए कहा- ‘भारत को यदि भारत रहना है तो इसे हिंदू रहना ही पड़ेगा और हिंदू को हिंदू रहना है तो भारत को अखंड बनना ही पड़ेगा।’’ ऐसा नहीं कि संघ प्रमुख पहले व्यक्ति हों जो इस सोच और संकल्पना को स्वर दे रहे हों। अतीत में भी महर्षि अरविंद, स्वातंत्र्य वीर सावरकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय,  राम मनोहर लोहिया एवं और भी अनेक मनीषी-महापुरुष इस दिशा में चिंतन करते रहे हैं। नेपथ्य की विवशता का पटाक्षेप तो तत्कालीन नेतृत्व ही कर सकता है, पर स्वयं गांधी जी 1946 तक यह दुहराते रहे कि चाहे उन्हें प्राण त्यागने पड़े, किंतु भारत-विभाजन उन्हें किसी मूल्य पर स्वीकार नहीं!  प्रश्न उठता है कि आज के परिप्रेक्ष्य में क्या अखंड भारत का चिंतन कोरी कल्पनाएं हैं या इनके पीछे कोई ठोस सामाजिक-सांस्कृतिक-भौगोलिक आधार भी हैं?

यदि हम तथ्यात्मक रूप से देखें तो स्वतंत्रता के ठीक पूर्व कम-से-कम आज के ये तीनों देश भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान तो एक थे। लगभग एक जैसी आकांक्षाएं, एक जैसे सपने, एक जैसे संघर्ष थे। एक जैसी बंदिशों, एक जैसी यातनाओं-प्रताडऩाओं से गुजरकर भी देश को संपूर्ण नहीं, खंडित आजादी ही मिली। भयानक रक्तपात, दंगे, आगजनी, लूटमार आदि, जिन कारणों से भयभीत एवं आशंकित हो तत्कालीन नेतृत्व द्वारा विभाजन स्वीकार किया गया, क्या विभाजनोपरांत वे कारण जड़-मूल से समाप्त हो गए या कर दिए गए? मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने स्वतंत्रता-पूर्व (और उसके बाद भी) क्या-क्या समझौते नहीं किए? 1919-20 में खलीफात को प्रारंभ करने से लेकर राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज, स्वभाषा, समान नागरिक संहिता, मंदिरों के जीर्णोद्धार, अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार- किस-किस पर हमने समझौता नहीं किया! क्या उन समझौतों से  विभाजन टल गया, अलगाव के बीज समाप्त हो गए? क्या किसी ने कल्पना में भी सोचा होगा कि उन समझौतों की त्रासद परिणति विभाजन में होगी? क्या मां व मातृभूमि को खंड-खंड विभक्त करके सुख-चैन से जिया जा सकता है? क्या हमने स्वतंत्रता का संघर्ष केवल आज की सीमाओं में फैले भारत के लिए किया था? इतना ही नहीं क्या कभी हमने सोचा कि क्या गुजरती होगी उन लाखों-करोड़ों लोगों पर जिन्हें केवल बंद कक्षों के त्वरित एवं निराधार समझौतों के कारण सिंध-लाहौर-पंजाब-पेशावर की अपनी भरी-पूरी दुनिया  छोडक़र महीनों-वर्षों शरणार्थी शिविरों में गुजारने पड़े! क्या चंद महत्वाकांक्षी नेताओं एवं कुछ हजारों-लाखों की हिंसक-अराजक भीड़ की हठधर्मिता के आगे गांधी-नेहरु एवं तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व का घुटने टेक देना तर्कसंगत एवं न्यायोचित था? आज जबकि देश में कानून का राज है, संविधान की सर्वोच्चता है, नागरिक-अधिकारों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त है, तब भी कथित उदारतावादी यदा-कदा देश के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न-भिन्न मुद्दों पर जनमत-संग्रह की पैरवी करते दिखाई देते हैं। क्या वे बताएंगे कि विभाजन जैसे बड़े एवं महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व जनमत-संग्रह क्यों नहीं कराया गया? राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा तो नहीं, जिसे किसी की मांग पर थाली में परोसकर सहर्ष सौंप दिया जाय! क्या खंडित प्रतिमा को देवालयों में स्थापित किया जा सकता है? मन भी तो मंदिर ही है, देश के सामूहिक मानस में स्थापित राष्ट्र-देव की प्रतिमा का खंडन कहां तक उचित था? जबकि केवल संस्कृति और परंपराओं ने ही नहीं, अपितु प्रकृति और भूगोल ने भी इस देश को एकता के अद्भुत सूत्र में पिरोया है। तभी तो वेदों-पुराणों के जमाने से हमारे सामने राष्ट्र का एक स्पष्ट एवं जीवंत स्वरूप रहा। हमारे पुराणकारों ने यों ही नहीं घोषणा की- ‘‘उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:।’’

प्रकृति और भूगोल ने जिसे अद्भुत एकता सिरजी थी, उस मातृभूमि के विभाजन की यह टीस, यह वेदना कदाचित हर संवेदनशील एवं देशभक्त भारतीय को रह-रह कचोटती अवश्य होगी! क्या केवल मानचित्र पर लकीरें खींच भर देने से देश बन जाता है? उन लकीरों के आर-पार बसे लोगों की भावनाओं, सदियों से चली आ रही परंपराओं, उस भूगोल के साथ जुड़ी अतीत की सांस्कृतिक जड़ों-स्मृतियों का कोई मोल नहीं होता, न केवल अतीत की अपितु सीमाओं के आर-पार बसे लोगों की गुलामी के दौर की पीड़ा व संघर्ष की साझी अनुभूतियां, साझी विरासत, साझी परंपराएं, साझे पुरखे कोई मायने नहीं रखते? पाकिस्तान चाहने वाले अधिकांश लोगों व नेताओं के पुरखे भी तो चंद सौ-दो-सौ वर्ष पूर्व हिंदू ही थे। इस नाते उनकी संस्कृति भी तो हिंदू या सनातन संस्कृति ही थी। पंथ व पूजा पद्धति बदलने से राष्ट्र व संस्कृति तो नहीं बदलती? न बदलनी चाहिए।

क्या यह सत्य नहीं कि अखंड भारत के आम नागरिकों ने 1905 में साम्राज्यवादी शक्ति द्वारा चली गई विभाजन की कुटिल चालों को पारस्परिक समझ एवं सहयोग से ध्वस्त किया था? क्या इसमें भी कोई दो राय है कि 1857 के स्वातंत्र्य-समर को पंथ-मजहब की सीमाओं से परे सबने मिलकर लड़ा और अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए? यही नहीं 1937 में अंग्रेजों  ने पहली बार मजहब व समुदाय के आधार पर सीटें आरक्षित कर हिंदू-मुसलमानों के बीच दूरी व अलगाव पैदा करने की असफल कोशिश की। उस समय भी मुस्लिम लीग को आरक्षित सीटों पर केवल 20 प्रतिशत वोट ही मिले, क्योंकि भारतीय समाज मजहब  आधारित था ही नहीं, वह संस्कृति आधारित था। फिर कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने क्यों केवल पाकिस्तान चाहने वाले मुस्लिम नेतृत्व को संतुष्ट-संबोधित किया, उनके साथ ही मंत्रणा की, शेष मुसलमानों के साथ उन्होंने कोई संवाद क्यों नहीं आगे बढ़ाया, उन्होंने सभी पक्षों के साथ बिना किसी व्यापक चर्चा के विभाजन क्यों स्वीकार कर लिया? क्या इसके औचित्य को किसी भी आधार पर सही ठहराया जा सकता है? क्या उन्हें विभाजन के अलावा अन्य विकल्पों पर सहमति नहीं बनानी चाहिए थी, आम सहमति बनानी तो दूर तत्कालीन नेतृत्व ने इसे टालने के लिए कोई गंभीर एवं ठोस पहल तक नहीं की। जिन्ना के डाइरेक्ट एक्शन के आह्वान के पश्चात भी ये पर्याप्त सचेत नहीं हुए, और अदूरदर्शिता की पराकाष्ठा तो यह है कि जनसंख्या के हस्तांतरण तक के लिए कोई सुरक्षित-समयबद्ध योजना नहीं बनाई गई! पाकिस्तान के हिस्से में तय किए गए भूभाग के हिंदुओं पर न केवल मनमाने निर्णय थोप दिए गए, बल्कि उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। अनेक शहरों-क्षेत्रों को विभाजन के कई-कई दिनों-मासों बाद तक यह जानकारी ही नहीं थी कि वे किस ओर हैं? नेतृत्व की अदूरदर्शिता और अनीतिपूर्ण विभाजन के कारण लाखों निर्दोषों की जानें गईं, वे घर से बेघर हुए, उन्हें अपनी जड़-जमीन छोडक़र रातों-रात भागकर भारत आना पड़ा, बच्चे अनाथ हुए, महिलाएं विधवा हुईं, कितनी ही मां-बहनों की मर्यादाएं भंग हुईं, कुल मिलाकर संपूर्ण मनुष्यता कलंकित हुई। विभाजन की भयावह विभीषिका के ऐसे क्रूर-काले अध्याय कदाचित विश्व-इतिहास में कहीं और न मिलें!

यदि अलग हुए देशों को विकास एवं सुशांति की कसौटी पर कसें तो विभाजन की निरर्थकता और स्पष्ट होकर सामने आती है। मजहब के आधार पर अस्तित्व में आए पाकिस्तान और कालांतर में उससे विलग होकर बने बांग्लादेश के मुसलमानों की स्थिति में क्या कोई विशेष परिवर्तन आया? शिक्षा, सुरक्षा, समानता, स्वतंत्रता, नागरिक-अधिकारों एवं जीवन-स्तर के विभिन्न मानकों पर क्या उन दोनों देशों के मुसलमानों की स्थिति भारत में रह रहे मुसलमानों से बेहतर है? भारत में अल्पसंख्यकों के विकास एवं उत्थान के लिए जितने प्रयास और प्रयत्न किए जाते हैं शायद ही कहीं और किया जाता हो! कला जगत के कुछ राजनीति-प्रेरित कलाकार और तथाकथित पंथनिरपेक्षतावादी प्राय: असहिष्णुता के राग भले अलापने रहते हों पर सत्य यही है कि जितनी स्वतंत्रता और अधिकार मुस्लिमों को यहां प्राप्त हैं, वह संभवत: बहुसंख्यकों को भी नहीं। विश्वास न हो तो चीन के उईगर मुसलमानों से लेकर फ्रांस, अमेरिका तक दृष्टि दौड़ाई जा सकती है। यदि इतनी दूर न जाना चाहें तो श्रीलंका और बर्मा की स्थितियों का अवलोकन किया जा सकता है। मुस्लिम तो फिर भी लगभग 25 प्रतिशत होने को हैं, देश के कई जिलों में तो वे वास्तविक बहुसंख्यक हैं। जबकि भारत में जिन अल्पसंख्यक समूहों की संख्या नगण्य भी है, उन्हें भी कभी किसी प्रकार की असुरक्षा या असमानता का सामना नहीं करना पड़ा। केवल संविधान में ही नहीं तो व्यवहार में भी देश के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, मंत्री से लेकर विभिन्न संस्थाओं-समितियों तक में सर्वोच्च पदों पर अल्पसंख्यक समुदाय के सुयोग्य जन  विराजमान होते रहे हैं। स्वतंत्रता-पूर्व के दौर में भी भारत के बहुसंख्यकों ने कभी किसी के साथ पूजा-पद्धत्ति या पंथ-मजहब के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं किया। परंपरा से ही पारसी, यहूदी, इसाई, मुसलमान सभी के लिए यहां की सह-अस्तित्ववादी संस्कृति में समान स्वीकार्यता-बोध रहा है। एक ओर शक-हूण-कुषाण-यवन जैसी विदेशी जातियों ने पार्थक्य-बोध त्यागकर यहां की सर्वसमावेशी संस्कृति में अपना विलय तो स्वीकार किया ही किया, वहीं दूसरी ओर बौद्ध-जैन-सिख जैसे पंथ सदियों से यहां की सनातन संस्कृति के अभिन्न अंग हैं, बिना किसी टकराव के साथ-साथ चल और बढ़ रहे हैं। क्यों, क्योंकि भारत की सनातन संस्कृति ने भिन्न-भिन्न पूजा-पद्धत्तियों को स्वीकार करते हुए भी सबमें एक और एक में सबको  देखने की सह-अस्तित्ववादी जीवन-दृष्टि विकसित की है। ‘एकम् सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति’ का सतत एवं व्यावहारिक बोध भारत के अखंड होने की संभावनाओं को पुन:-पुन: जागृत एवं उत्प्रेरित करता रहेगा। भिन्न आस्था-विश्वास और पूजा-पद्धत्ति के बावजूद सांस्कृतिक एकता के सहमति-बिंदु तलाशे जा सकते हैं, भारत और भारतीयता में विश्वास रखा जा सकता है, शत्रु-मित्र के साझे अवबोध विकसित किए जा सकते हैं, अतीत की भूलों को सुधार, वर्तमान का सुदृढ़ निर्माण कर भविष्य का पथ प्रशस्त किया जा सकता है। पर इसके लिए सबसे पहले हिंदू-समाज को संगठित और शक्तिशाली बनना होगा। शक्ति व संगठन संतुलन एवं सुशांति के लिए, औरों के भय और त्रास के लिए नहीं। क्या यह सत्य नहीं कि देश से बाहर मुसलमानों की भी पहचान ‘भारतीय’ या ‘हिंदू’ मुसलमान के रूप में ही की जाती है? छोटी पहचान को त्याग बड़ी पहचान, बड़ी अस्मिता से क्यों नहीं जुड़ा जा सकता? कभी शासक होने-बनने के मिथ्या दर्प या वायवीय कल्पना को त्याग, ग्रंथियां-गांठें खोल, निश्चित जुड़ा जा सकता है। मुहम्मद कुली खान (नेताजी पालकर), सुगमावती सुकर्णोपुत्री, वसीम रिजवी जैसों ने तो मार्ग प्रशस्त किया ही है, यदि इस मार्ग पर लौट पाना कठिन भी हो तो राष्ट्रीय परंपराओं, आदर्शों, मानबिंदुओं एवं शत्रु-मित्र, जय-पराजय की साझी अनुभूतियों को तो आत्मसात किया ही जा सकता है।

सनद रहे कि किसी भी राष्ट्र के जीवन में 100-200 वर्षों का कोई विशेष महत्व नहीं होता। भाव और विचार तथा साधना व संकल्प जीवित रहने चाहिए। क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि 2000 वर्ष पूर्व नष्ट हुआ  इजरायल 1948 में एक मजबूत राष्ट्र के रूप में सामने आएगा? प्रबल एवं सामूहिक इच्छाशक्ति यदि हो तो पिछली सदी में सुदृढ़ दीवारों को तोडक़र भी 1989 में जर्मनी को एक होते हमने देखा है। दोनों वियतनाम एक हुए। मजहब बदलने के बाद भी विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने अपनी संस्कृति नहीं बदली। तात्कालिक आंदोलनों एवं कमजोर-कृत्रिम आधारों पर साथ आए 15 मध्य एशियाई देशों को हमने सोवियत संघ से विलग होते हुए देखा। हमें यह याद रखना होगा कि भारत का विभाजन स्वाभाविक नहीं था। यह अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति, आनन-फानन में सत्ता हस्तांतरण और तत्कालीन नेतृत्व की अदूरदर्शिता, कतिपय नेताओं की अति महत्त्वाकांक्षा एवं भयावह तुष्टिकरण का परिणाम था। जबकि यहां की प्रकृति, परंपरा, जीवनदृष्टि, संस्कृति और भूगोल- सभी इसकी अखंडता के लिए मजूबत आधार तैयार करते हैं। जनरल करियप्पा ने कहा था कि भारत फिर से एक होगा। प्रसिद्ध लेखक वान वाल्वोनबर्ग ने कहा था कि भौगोलिक दृष्टि से भारत और पाकिस्तान का विभाजन इतना तर्कहीन है कि आश्चर्य होता है कि यह कितने समय तक चल सकेगा? निष्कर्षत: महर्षि अरविंद के शब्दों में प्रत्येक भारतीय के मन में यह स्वप्न और संकल्प पलना चाहिए – ‘‘भारत फिर से अखंड होगा, यह तय है, क्योंकि यही इसकी नियति है।’’

 

प्रणय कुमार

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