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दुनिया की नई दहशत: ओमिक्रॉन

दुनिया की नई दहशत: ओमिक्रॉन

दक्षिण अफ्रीका से मिले कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन ने पूरी दुनिया में दहशत फैला दी है। ओमिक्रॉन अब तक 38 देशों में फैल चुका है। इसमें भारत, श्रीलंका, मलेशिया, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बोत्सवाना, ब्राजील, कनाडा, चेक गणराज्य, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, घाना, हांगकांग, आयरलैंड, इजराइल, इटली, जापान, मोजाम्बिक, नीदरलैंड नाइजीरिया, नॉर्वे, पुर्तगाल, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, स्पेन, स्वीडन, स्विटजरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई दूसरे देश शामिल हैं। ये सभी देश ओमिक्रॉन से बचने के उपाय करने में जुट गए हैं। गनीमत यह है कि दुनिया के 38 देशों में फैलने के बावजूद इस तेजी से फैलने वाले वेरिएंट से अभी तक किसी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यह नया वेरिएंट अगले कुछ महीनों में यूरोप के आधे से अधिक कोविड मामलों का कारण बन सकता है और वैश्विक आर्थिक सुधार को भी धीमा कर सकता है। दक्षिण अफ्रीका के शोधकर्ताओं ने 24 नवंबर 2021 को इस नए वेरिएंट की पहचान की और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दो दिन बाद इसे चिंता वाला वेरिएंट करार दिया। ओमिक्रॉन दूसरे वेरिएंट से बेहद अलग है, क्योंकि ये अब तक सार्स-सीओवी-2 का सबसे ज्यादा बदला हुआ स्वरूप है। इसकी आनुवंशिक संरचना में कुल 53 उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) हैं, जिनमें 32 म्यूटेशन अकेले स्पाइक प्रोटीन पर हैं।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार जो लोग संक्रमण से उबर चुके हैं, वे भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। यह वायरस अपने जीनोम के महत्वपूर्ण हिस्सों में इतना अधिक उत्परिवर्तित हो गया है कि वायरस के पुराने स्वरूपों से बचाने के लिए तैयार किए गए कोविड टीकों को भी ये मात दे सकता है। दुनियाभर में उपयोग होने वाली ज्यादातर वैक्सीन एमआरएनए और वेक्टर बेस वैक्सीन हैं। इनमें अमेरिका की फाइजर और मॉडर्ना वैक्सीन, ब्रिटेन की एस्ट्राजेनिका, जिसे भारत में कोविशील्ड के नाम से लगाया गया है और रसिया की स्पूतनिक वैक्सीन शामिल हैं। ये सारी वैक्सीन वायरस के स्पाइक प्रोटीन पर हमला करके वायरस को हराती हैं। लेकिन आशंका है कि ये वैक्सीन इस वैरिएंट पर कम प्रभावी या शायद बिल्कुल भी प्रभावी न हों, क्योंकि म्यूटेशन की वजह से वायरस के प्रोटीन का स्ट्रक्चर(स्वरूप) ही बदल चुका है और इसलिए इन वैक्सीनों को भी बदलना होगा। हालांकि राहत की बात ये है कि इस तकनीक पर आधारित वैक्सीनों के स्ट्रक्चर को बदलने में ज्यादा लंबा समय नहीं लगेगा, ये काम आसानी से कुछ ही महीनों में पूरा हो जाएगा। आईसीएमआर ने कहा है कि कोवैक्सीन ओमिक्रॉन वेरिएंट के खिलाफ प्रभावी साबित हो सकती है, क्योंकि यह वैक्सीन वायरस के निष्क्रिय सेल्स की तकनीक पर आधारित है। ये सिर्फ उसके स्पाइक प्रोटीन पर हमला न करके पूरे वायरस को ही नष्ट करने का काम करती है।

भारत में इससे संक्रमित लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और वर्तमान में इसके 23 केस भारत में आ चुके हैं। दिल्ली में एक, राजस्थान में 9 गुजरात में एक, महाराष्ट्र में 10 और कर्नाटक में 2 मामले हैं। ओमिक्रॉन जैसे-जैसे देश में प्रवेश कर रहा है, लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। आईआईटी कानपुर की एक नई स्टडी के मुताबिक ओमिक्रॉन भारत में तीसरी लहर की वजह बन सकता है, ये लहर जनवरी से लेकर फरवरी के बीच आ सकती है। इस स्टडी को करने वाले प्रोफेसरों के अनुसार संक्रमण की संख्या बढ़ेगी जरूर लेकिन पहले की तरह लोगों को अस्पतालों में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ेगी और ना ही ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। लेकिन अगले साल के शुरुआती महीनों में जब संक्रमण अपने पीक पर होगा तो हर रोज कोविड के एक से सवा लाख मामले दर्ज किए जा सकते हैं। यानी तीसरी लहर आने की काफी संभावना है लेकिन इसका प्रभाव दूसरी लहर की तरह तबाही लाने वाला नहीं होगा। अगर हल्के लॉकडाउन और नाइट कफर््यू लगाए जाएं और भीड़-भाड़ वाले आयोजनों पर पाबंदी लगा दी जाए तो ओमिक्रॉन को बढऩे से रोका जा सकता है। यूरोप के देशों में इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि अमेरिका के 50 में से 15 राज्य इसकी चपेट में आ चुके हैं। भारत समेत पूरी दुनिया में मांग हो रही है कि बच्चों के लिए वैक्सीनेशन जल्द शुरू किया जाए, क्योंकि बच्चों के पास अभी कोई इम्यूनिटी नहीं है और किसी को नहीं पता कि ये नया वेरिएंट बच्चों पर कैसा असर डालेगा।

मेदांता के चेयरमैन डॉक्टर नरेश त्रेहन ने बताया कि यह डेल्टा से तीन गुना अधिक तेजी से फैलता है। जो मरीज वैक्सीन के दो डोज ले चुके हैं उनमें इसके गंभीर लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं और जान का खतरा भी नहीं है, लेकिन जिन्होंने वैक्सीन नहीं ली है उन पर इसका खतरा ज्यादा है। इसलिए उन्होंने सलाह दी है कि सभी को जल्द से जल्द वैक्सीन लगवानी चाहिए। डॉक्टर त्रेहन ने बताया कि जो लोग स्वस्थ होंगे उन पर इसका खतरा कम होगा, लेकिन किसी भी कारण से जिनकी इम्यूनिटी कम होगी, उन पर इसका ज्यादा खतरा होगा। ज्यादा उम्र के लोगों की भी इम्युनिटी धीरे-धीरे कम होती जाती है। उन्होंने बताया कि एक रिपोर्ट से पता चला है कि 5-6 साल से कम उम्र के बच्चों पर इसका प्रभाव पड़ा है, बच्चों का वैक्सीनेशन न होने के कारण खतरा बढ़ सकता है।

ओमिक्रॉन की उत्पत्ति को लेकर कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि ये रोडेंट्स यानी चूहों जैसे जीव के जरिए इंसानों तक पहुंचा है, इस प्रक्रिया को रिवर्स जूनोसिस कहते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक ओमिक्रॉन में चूहों को संक्रमित करने वाला जीन पाया गया है। एक अन्य वैज्ञानिक माइक का कहना है कि अब तक जो बातें सामने आई हैं उनसे सौ फीसदी पुष्टि नहीं होती कि इसकी उत्पत्ति चूहे से ही हुई है। इसकी उत्पत्ति ऐसे इंसान से भी हो सकती है जिसकी इम्यूनिटी कम हो। एक अन्य वैज्ञानिक का मानना है कि ओमिक्रॉन की उत्पत्ति दक्षिण अफ्रीका में नहीं हुई है क्योंकि वहां पहले से ही बड़े स्तर पर जीनोम सिक्वेंसिंग चल रही थी, हो सकता है कि दक्षिण अफ्रीका से किसी दूर के इलाके में यह विकसित हुआ हो। वैज्ञानिकों ने बताया है कि ओमिक्रॉन कोरोना के पुराने वेरिएंट और सर्दी जुकाम के वायरस के साथ मिलकर बना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोना के नए वेरिएंट को ग्रीक अल्फाबेट के लेटर्स के मुताबिक नाम देता है। ओमिक्रॉन ग्रीक अल्फाबेट का 15 वां लेटर है। इस वेरिएंट के मिलने से पहले डब्ल्यूएचओ इसके 12 लेटर का इस्तेमाल कर चुका था और इस हिसाब से उसे नए वेरिएंट को तेरहवें लेटर का नाम देना था और यह 13 वां लेटर था एनयू, लेकिन इसे इसलिए छोड़ दिया गया, क्योंकि लोग इसे न्यू समझते। उसके बाद इसे 14 वें लेटर शी के नाम पर रखना था, लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नाम होने की वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसको भी छोड़ दिया फिर इस नए वेरिएंट के लिए ग्रीक अल्फाबेट का 15 वां लेटर चुना गया जिसे ओमिक्रॉन कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस के वेरिएंट को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया है। इनमें वेरिएंट ऑफ कंसर्न और वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट शामिल हैं। अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा और ओमिक्रॉन को वेरिएंट आफ कंसर्न में रखा गया है, वहीं लैम्बडा और एमयू जैसे वैरीएंट को वेरिएंट आफ इंटरेस्ट में रखा गया है।

बीएचयू के वैज्ञानिकों ने जीनोम सीक्वेंसिंग के अध्ययन के बाद कहा है कि ओमिक्रॉन वेरिएंट भारत के लोगों को संक्रमित भले ही कर दे, लेकिन इसका बहुत ज्यादा घातक असर देखने को नहीं मिलेगा। बीएचयू के वैज्ञानिक प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया, चूंकि डेल्टा वेरिएंट से भारत के 70 प्रतिशत लोग संक्रमित होकर ठीक हो चुके हैं, इसलिए अगर बहुत तेजी से यह वेरिएंट भारत में फैला भी तो बहुत कम लोगों को रिइंफेक्शन होगा और भारत के लोग इस वेरिएंट से बचे रहेंगे। लेकिन रोहतक पीजीआई के डॉक्टर इससे अलग राय रखते हैं, उनके मुताबिक लोगों को ओमिक्रॉन के संक्रमण से बचने के लिए जितनी जल्दी हो सके वैक्सीन की दोनों डोज लगवा लेनी चाहिए। पीजीआई रोहतक के डॉ रमेश वर्मा ने कहा कि डब्ल्यूएचओ ने इसे ‘वेरिएंट ऑफ कंसर्न’ बोला है। आने वाला डेटा ये बताएगा कि ये कितना खतरनाक है। हमारे देश में जो भी वैक्सीन उपलब्ध हैं, वो सभी प्रभावशाली हैं, इसलिए लोगों को इस वेरिएंट से बचने के लिए दोनों डोज जरूर लगवानी चाहिए।

ओमिक्रॉन पर कई देशों के वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं। इस बीच अमेरिका के शीर्ष वैज्ञानिक एंथनी फाउची ने ओमिक्रॉन को लेकर कहा कि शुरुआती संकेतों से पता चल रहा है कि ये वेरिएंट तेजी से फैलता जरूर है, लेकिन ज्यादा हानिकारक नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि इसके तेज संक्रमण को गंभीरता से लेने की जरूरत है। इस वेरिएंट के प्रभावों को समझने में अभी कुछ हफ्तों का समय और लग सकता है। उन्होंने कहा है कि ये डेल्टा जितना खतरनाक नहीं है। फाउची ने कहा कि कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ओमिक्रॉन वेरिएंट काफी गंभीर है, लेकिन फिलहाल यह कहा जा सकता है कि ये डेल्टा वेरिएंट से ज्यादा खतरनाक नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकारों में से एक फाउची के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में ये वेरिएंट हाल ही में नवंबर में रिपोर्ट किया गया था, इसलिए ये देखने में अधिक समय लग सकता है कि इसकी गंभीरता का स्तर क्या है।

ओमिक्रॉन पूरी दुनिया में तेजी से फैल रहा है, नए डाटा के अनुसार 261 केस इंग्लैंड में हैं, 71 स्कॉटलैंड में हैं और चार वेल्स में हैं, यानी ओमिक्रॉन के कुल मामले 336 हैं। इनमें वो केस भी शामिल हैं, जिन्होंने विदेश यात्रा नहीं की, इसके अनुसार यह कहा जा सकता है कि अब इंग्लैंड में कम्युनिटी ट्रांसमिशन शुरू हो चुका है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों से स्पष्ट कर दिया कि ओमिक्रॉन वेरिएंट डेल्टा से अधिक संक्रामक है। ब्रिटेन में मंगलवार को ओमिक्रॉन वेरिएंट के 101 नए मामले सामने आए, जिसके बाद इन मामलों की संख्या बढक़र 437 हो गई है। वहीं इससे पहले ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जावेद ने संसद में कहा था कि कोरोना वायरस का नया रूप ओमिक्रॉन देश के क्षेत्रों में सामुदायिक स्तर पर फैलना शुरू हो गया है। वैज्ञानिक विशेष रूप से स्पाइक प्रोटीन पर 30 से अधिक म्यूटेशन के कारण चिंतित हैं। अमेरिका में

ओमिक्रॉन वेरिएंट के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन कोरोना वायरस के अधिकतर मामलों का कारण अब भी डेल्टा वेरिएंट ही बताया जा रहा है।

कोरोना की पिछली लहर में डेल्टा वेरिएंट ने यहां भारी तबाही मचाई थी। डेल्टा से संक्रमित होने के बाद सांस लेने में दिक्कत, तेज बुखार, कमजोरी, खाने का स्वाद और सुगंध न पता चलने जैसे कुछ लक्षण दिखाई दे रहे थे। हालांकि ओमिक्रॉन के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। ओमिक्रॉन वेरिएंट के लक्षण काफी अलग हैं। ओमिक्रॉन के बारे में कहा जा रहा है कि ये अब तक के सभी वेरिएंट में सबसे ज्यादा खतरनाक और संक्रामक है। इसके मरीजों में कोविड-19 के आम लक्षण नहीं पाए गए हैं। किसी में भी बुखार की समस्या नहीं देखी गई है, जबकि डेल्टा वेरिएंट में सबसे प्रमुख लक्षण यही था। दक्षिण अफ्रीकी मेडिकल एसोसिएशन की अध्यक्ष एंजेलिक के अनुसार ओमिक्रॉन के तीन प्रमुख लक्षण सिर दर्द, बहुत ज्यादा थकान और बदन दर्द है। इससे संक्रमित मरीजों को न तो तेज बुखार हो रहा है और ना ही खाने-पीने का स्वाद और सुगंध जा रही है।

 


रंजना
मिश्रा

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