ब्रेकिंग न्यूज़ 

नए भारत का नया लेबर कोड

नए भारत का नया लेबर कोड

वर्षों से चले आ रहे नौकरी के तौर- तरीके बदलने वाले हैं। केंद्र सरकार जल्द ही नए लेबर कोड को लागू करने जा रही है। नए साल 2022 में ये नए श्रम कानून लागू हो सकते हैं। नया लेबर कोड लागू हो जाने के बाद कर्मचारियों की सैलरी से लेकर उनकी छुट्टियां और उनके काम के घंटे भी बदल जाएंगे। अब कर्मचारियों की छुट्टी हफ्ते में दिनों के हिसाब से नहीं बल्कि घंटों के हिसाब से तय होगी। इस नए कानून के तहत काम को घंटों के हिसाब से निर्धारित किया गया है। नया लेबर कोड लगने के बाद हफ्ते में दो की बजाय तीन छुट्टियां भी मिल सकती हैं, लेकिन इसके लिए काम ज्यादा करना होगा। इसमें ओवरटाइम का भी प्रावधान रखा गया है। नए लेबर कोड के तहत रोजाना काम करने के अधिकतम समय को बढ़ाकर 12 घंटे करने का प्रस्ताव रखा गया है। वहीं हफ्ते में कुल मिलाकर 48 घंटे ही काम करना होगा। यानी रोज आठ घंटे काम करने पर सप्ताह में छ दिन काम करना होगा। लेकिन अगर कोई रोज 12 घंटे तक काम कर सकता है तो उसे सिर्फ चार दिन ही काम करना पड़ेगा और उसे तीन दिन की छुट्टी मिलेगी। यानी अगर कंपनी चाहे तो इस तरह व्यवस्था भी कर सकती है कि कर्मचारी से हफ्ते में सिर्फ 4 दिन 12-12 घंटे काम करवा ले और बाकी 3 दिन छुट्टी दे दे। नए कानून के तहत अगर कोई अपनी शिफ्ट से 15 से 30 मिनट से ज्यादा काम करता है तो उसे 30 मिनट गिन कर ओवरटाइम में शामिल करने का प्रावधान है। यानी कर्मचारी को 15 मिनट भी अतिरिक्त काम करने पर ओवरटाइम दिया जाएगा। उस कर्मचारी की सैलरी के हिसाब से 30 मिनट की सैलरी का कैलकुलेशन करके उसे वो पैसे मिलेंगे। मौजूदा समय में जो नियम हैं, उनके चलते 30 मिनट ज्यादा काम करने को ओवरटाइम नहीं माना जाता है। नए लेबर कोड के नियमों के मुताबिक किसी भी कर्मचारी से पांच घंटे से ज्यादा लगातार काम नहीं कराया जा सकता है। पांच घंटे के बाद कर्मचारी को आधे घंटे का ब्रेक देना होगा।

दरअसल लंबे समय तक लगातार काम करने से कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ज्यादा वर्किंग आवर होने से नींद कम आना, खान-पान की अनियमितता आदि समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा लगातार एक ही जगह पर बैठे रहने के कारण भी कर्मचारियों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पांच घंटे के बाद ब्रेक मिलने से कर्मचारियों को काफी राहत मिलेगी। उनके ऊपर काम के बोझ का जो दबाव रहता है, वो कुछ कम होगा तथा उनका शरीर व दिमाग फ्रेश होकर दोबारा काम करने के लिए तैयार हो जाएगा। नए कानून से कर्मचारियों के मूल वेतन और प्रोविडेंट फंड की गणना का भी तरीका बदलेगा। कर्मचारियों के प्रोविडेंट फंड में हर महीने योगदान बढ़ जाएगा। दरअसल पीएफ का योगदान कर्मचारी की बेसिक सैलेरी पर निर्भर करता है। मौजूदा समय में कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी में बेसिक सैलरी का हिस्सा बहुत कम रखती हैं। कर्मचारियों की सैलरी का अधिकतम हिस्सा तमाम तरह के अलाउंस होते हैं। नए लेबर कोड के लागू होने के बाद बेसिक सैलरी का हिस्सा कम से कम 50 फीसदी होना चाहिए। बेसिक सैलरी अधिक होगी तो कर्मचारियों का पीएफ और ग्रेच्युटी में योगदान बढ़ जाएगा। वही अलाउंस कम होने की वजह से कर्मचारियों की इन हैंड सैलेरी कम हो जाएगी।

सरकार ने 29 केंद्रीय लेबर कानूनों को मिलाकर चार नए कोड बनाए हैं, जिनमें वेज और सोशल सिक्योरिटी के कोड भी शामिल हैं। इन चार लेबर कोड में वेतन/मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंधों पर संहिता, काम विशेष से जुड़ी सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थल की दशाओं पर संहिता, और सामाजिक व व्यावसायिक सुरक्षा संहिता शामिल हैं। इसमें वेज की परिभाषा का विस्तार किया गया है। यह परिभाषा चारों लेबर कोड में एक ही तरह की है, इसका कर्मचारियों पर व्यापक असर होगा। नए कोड्स में बेसिक पे, डीए, रीटेनिंग और स्पेशल भत्तों को वेज में शामिल किया गया है। एचआरए, कनवेंस, बोनस, ओवरटाइम अलाउंस और कमीशंस को इससे बाहर रखा गया है। नए नियम के तहत तमाम भत्ते कुल सैलरी के 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकते हैं। अगर ये 50 फीसदी से अधिक होते हैं तो ज्यादा राशि को वेज का हिस्सा माना जाएगा। उदाहरण के लिए पहले ग्रेच्युटी की गणना मूल वेतन यानी बेसिक सैलरी के हिसाब से होती थी, लेकिन अब यह वेज के हिसाब से मिलेगी। कर्मचारियों का सीटीसी वही रहेगा, जो अभी है लेकिन उनकी बेसिक सैलरी बढ़ जाएगी और स्पेशल अलाउंस घट जाएगा। फिक्स्ड टर्म वाले कर्मचारियों पर कंपनी का खर्चा बढ़ जाएगा क्योंकि ग्रेच्युटी अनिवार्य हो जाएगी। हाई सैलेरी और मिड सैलरी ग्रुप में कंपनियों पर कम बोझ पड़ेगा, लेकिन लोअर सैलरी रेंज ग्रुप में कंपनी का खर्च 25 से 30 फीसदी बढ़ सकता है। इससे कर्मचारियों का इंक्रीमेंट प्रभावित हो सकता है। यानी इन चार लेबर कोड के लागू होने के बाद कर्मचारियों को तो फायदा होगा, लेकिन कंपनियों का बोझ कुछ बढ़ सकता है, जिन कंपनियों में स्पेशल अलाउंस की व्यवस्था नहीं है, वहां पर सैलरी स्ट्रक्चर बदल कर उसे इस तरह बनाया जाएगा कि कंपनियों को नुकसान ना हो।

बड़ी संख्या में कई राज्यों ने इनके मसौदा नियमों को अंतिम रूप दे दिया है। केंद्र ने फरवरी 2021 में इन संस्थाओं के मसौदा नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन लेबर के समवर्ती सूची का विषय होने की वजह से केंद्र सरकार इसको राज्यों के साथ लागू करना चाहती है। व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थित पर लेबर कोड के मौजूदा नियमों को कम से कम 13 राज्य तैयार कर चुके हैं। मजदूरी पर लेबर कोड के मसौदा नियमों को 24 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने तैयार कर लिया है। सामाजिक सुरक्षा संहिता के मसौदा नियमों को 18 राज्यों ने तैयार कर लिया है और इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड्स के मसौदा नियमों को 20 राज्यों ने तैयार कर लिया है।

नए कानून से कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन घट जाएगा, लेकिन उन्हें रिटायरमेंट पर ज्यादा रकम मिलेगी। असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी न्यू वेज कोड लागू होगा। हर इंडस्ट्री और सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में समानता आएगी। कंपनियों को उनके पीए दायित्व का बोझ उठाना पड़ेगा। सरकार ने नए नियमों को कुछ ऐसा बनाने की कोशिश की है कि इससे कर्मचारियों को अधिक से अधिक फायदा पहुंचे और कंपनियां किसी भी तरह से कर्मचारियों का शोषण न कर सकें। अभी बहुत से राज्यों ने इन चार संहिताओं के तहत नियमों को अंतिम रूप नहीं दिया है। केंद्र और राज्य दोनों को इन नियमों को अधिसूचित करना होगा तभी संबंधित राज्यों में ये कानून लागू हो पाएंगे। सरकार इसे जल्द लागू करके कंपनियों और प्रतिष्ठानों को इसके क्रियान्वयन के लिए कुछ समय देना चाहती है। नए नियम लागू होने के बाद कंपनियों का खर्च बढ़ सकता है, इसलिए कंपनियां इसका विरोध कर रही थीं। हालांकि नए नियमों के लागू होने के बाद कर्मचारियों को इससे फायदा होगा।

 

रंजना मिश्रा

Leave a Reply

Your email address will not be published.