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शादी की उम्र पर घमासान

शादी की उम्र पर घमासान

भारतीय लोकतंत्र ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत लिए गए फैसले पर अगर सवाल ना उठे तो हैरत ही होगी। अगर इन फैसलों पर राजनीति ना हो तो हैरत और भी ज्यादा होती है। कहना न होगा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र सीमा को 18 से बढ़ाकर 21 करने का फैसला क्या लिया, राजनीति शुरू हो गई है। इस फैसले के खिलाफ विशेषकर मुस्लिम समुदाय के नेता सामने आ गए हैं। एमआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओबैसी ने सवाल उठाया है कि अगर 18 साल की उम्र के युवा मतदान कर सकते हैं तो शादी की उम्र 21 साल क्यों होनी चाहिए। बात यहीं तक होती तो गनीमत होती। विवादित बयानों के लिए विख्यात समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने इससे भी आगे की बात कही है। उन्होंने कहा है कि लड़कियों की शादी की उम्र सीमा बढ़ाने के बाद वे और ज्यादा आवारगी करेंगी। समाजवादी पार्टी के ही महाराष्ट्र के नेता अबु आजमी तो इस विधेयक को जनसंख्या नियंत्रण की कोशिश से जोडऩे से भी नहीं रूके। अबु आजमी ने कहा कि यह कानून वे लोग ला रहे हैं, जिनके बच्चे नहीं हैं, उन्हें इसके बारे में क्या पता। झारखंड के भी एक मंत्री ने इस प्रस्तावित कानून का भी विरोध किया है। दिलचस्प यह है कि वे भी मुस्लिम समुदाय के ही हैं। झारखंड सरकार के मंत्री हफीजुल अंसारी ने कहा कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की कोशिश दरअसल असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसा कर रही है। कांग्रेस सांसद शक्ति सिंह गोहिल भी इस फैसले को चुनाव से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ध्रुवीकरण की राजनीति के तहत लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की तैयारी में है।

दरअसल सरकार ने यह फैसला समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता वाली टास्क फोर्स की सिफारिश पर लिया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने यह टास्क फोर्स जून 2020 में गठित की थी। इसके सह अध्यक्ष नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल थे। दस सदस्यीय इस समिति में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की कुलपति नजमा अख्तर, एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय मुंबई की पूर्व कुलपति वसुधा कामथ और गुजरात की जानी मानी महिला रोग विशेषज्ञ दीप्ति शाह समेते स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, महिला व बाल विकास, उच्च शिक्षा, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्रालयों के सचिव और कानून एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के अधिकारी शामिल थे। इस टास्क फोर्स को शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, कुल प्रजनन दर, जन्म के समय लिंग अनुपात, बाल लिंग अनुपात समेत पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित तमाम अन्य मुद्दों पर विचार करना था।

वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने इस कानून में बदलाव के संकेत पिछले साल के स्वाधीनता दिवस को लाल किले की प्राचीर से देश के नाम अपने संबोधन में दे दिए थे। उन्होंने तब कहा था कि कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए, सरकार लड़कियों की शादी की उम्र पर फिर से गौर कर सकती है। तब प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘हमने एक कमेटी का गठन किया है, जो ये सुनिश्चित करेगी कि बेटियां अब कुपोषण का शिकार न हों और उनकी शादी सही समय पर हो। जैसे ही कमेटी की रिपोर्ट सामने आएगी, बेटियों की शादी की उम्र के बारे में, उचित फैसले लिए जाएंगे।’

टास्क फोर्स की सिफारिश डॉक्टरों की उस राय पर आधारित है, जिसके मुताबिक पहले बच्चे के जन्म के समय, महिला की उम्र कम से 21 साल होनी चाहिए। टास्क फोर्स ने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि शादी में देरी से परिवारों, महिलाओं, बच्चों और समाज पर सकारात्मक आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी असर पड़ते हैं। टास्क फोर्स ने दावा किया है कि उसकी रिपोर्ट कम तथा मध्यम आय वाले पचास से ज्यादा देशों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उन शिशुओं की सेहत खराब होने का खतरा कम रहता है, जिनकी उम्र पहले बच्चे के जन्म के वक्त 27 से 29 वर्ष होती है। टास्क फोर्स ने माना है कि मां बनने की आदर्श आयु 21 से 35 वर्ष के बीच की होती है।

शफीकुर्रहमान बर्क शादी की उम्र बढ़ाने को लेकर चाहे जो भी विवादित बयान दें, लेकिन इस प्रस्ताविक कानूनी बदलाव के बाद एक सवाल मुंह बाए खड़ा रहेगा। दरअसल सहमति से सेक्स की कानूनी उम्र सीमा 18 साल है। जाहिर है कि जब शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल की जाएगी तो सहमति वाला यह प्रावधान भी आड़े आएगा। सवाल यह उठेगा कि क्या बिना शादी के सहमति से किया गया सेक्स जायज है या नहीं। लेकिन टास्क फोर्स ने इस विषय पर कोई सिफारिश दी ही नहीं है। सूत्रों का कहना है कि टास्क फोर्स ने सेक्स पर आलोचनात्मक नजरिया अपनाने की बजाय, सेक्स काउंसलिंग और सेक्स शिक्षा पर फोकस करने पर जोर दिया है।

राजनीतिक विवादों से परे विवाह की मौजूदा उम्र सीमा और उसके कानूनी पहलुओं के साथ ही इसके इतिहास की भी पड़ताल करनी चाहिए। दरअसल अभी लड़कियों की शादी की वैधानिक उम्र 18 साल है, जबकि लडक़ों की 21 साल निर्धारित है। वैसे 1872 के पहले तक विवाह के लिए अपने देश में कोई कानून नहीं था। इसकी वजह से बाल विवाह भी खूब होते थे। इसे रोकने की दिशा पहला प्रयास समाज सुधारकों ने किया, जिनकी मांग पर अंग्रेज सरकार ने 1872 में नेटिव मैरिज एक्ट पारित किया। इस कानून के मुताबिक 14 वर्ष से कम उम्र वाली लड़कियों की शादी पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन यह कानून बहुत प्रभावी नहीं रहा। इसके बाद पारसी समाज सुधारक वी. एम. मालाबारी की कोशिशों के बाद साल 1891 में सम्मति आयु अधिनियम पारित किया गया। जिसके तहत 12 वर्ष से कम आयु वाली लड़कियों के विवाह पर रोक लगा दी गई।

बहुचर्चित शारदा अधिनियम 1930 में पारित हुआ। इसके लिए समाज सुधारक हर बिलास शारदा ने भरपूर कोशिश की थी, इसीलिए इसे शारदा एक्ट भी कहा जाता है। इस अधिनियम ने पहली बार शादी की उम्र को स्वास्थ्य के आधार पर तार्किक बनाने की कोशिश की। इसके तहत 18 वर्ष से कम आयु के लडक़ों और 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों की शादी को अवैध घोषित कर दिया गया। इसके बाद आजादी के बाद 1954 में विशेष विवाह अधिनियम आया, जिसमें विवाह के लिए लड़कियों की उम्र 18 और लडक़ों की उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गई। इसी तरह 2006 में आए बाल विवाह अधिनियम के तहत भी लड़कियों और लडक़ों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु क्रमश: 18 और 21 वर्ष निर्धारित की गई।

वैसे विवाह को लेकर तमाम धर्म अपने कानूनों को का भी हवाला देते हैं, जिनके अपने-अपने मानक भी हैं। जैसे इस्लाम में यौवन प्राप्ति के लिए नाबालिग के विवाह को भी सही माना जाता है। शफीकुरहमान बर्क हों या दूसरे मुस्लिम नेता, विवाह सुधार के कानूनी प्रस्ताव के उनके विरोध की असल वजह उनकी इस्लामी मान्यता ही है। वैसे हिंदू विवाह अधिनियम भी लड़कियों और लडक़ों के विवाह के लिए न्यूनतम आयु क्रमश: 18 और 21 साल ही मानता है। वह अपनी किसी संहिता का कभी हवाला नहीं देता।

बहरहाल शादी के कानूनों में प्रस्तावित इस विवाद के बावजूद लगता नहीं कि सरकार पीछे हटने के मूड में है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मंडी में एक सभा में प्रधानमंत्री ने कह भी दिया कि जब हर मौके पर बराबरी की बात होती है तो शादी के लिए बराबरी की बात क्यों ना हो। वैसे भी सरकार का मकसद लड़कियों की सेहत पर गौर करना ज्यादा है। हालांकि राजनीतिक दल इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। वैसे विरोधियों को सोचना चाहिए कि आज दुनिया संहिताओं से कहीं आगे निकल गई है। अब महिला और पुरूष हर मोर्चे पर साथ खड़े हैं। ऐसे में सवाल यह है कि लडक़ों की उम्र ज्यादा और लड़कियों की कम क्यों हो? यह तर्क भी बेमानी है कि जब 18 साल का लडक़ा या लडक़ी प्रधानमंत्री चुनने की पात्रता रखते हैं तो शादी की उम्र क्यों बढ़ाई जानी चाहिए? इस तर्क में एक झोल यह है कि अब भी लडक़ों की शादी की उम्र 21 साल ही है, भले ही 18 साल का लडक़ा वोट दे सकता है।

 

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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