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लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का फैसला ऐतिहासिक : सपनों की उड़ान को मिले नए पंख

लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का फैसला ऐतिहासिक : सपनों की उड़ान को मिले नए पंख

पिछले दिनों केंद्रीय केबिनेट द्वारा लड़कियो की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल कर दिए जाने का फैसला निश्चय ही देश में महिला सशक्तिकरण और बेटियों के सपनों की उड़ान को नए पंख देने वाला एक क्रांतिकारी कदम है। अपने 15 अगस्त के उद्बोधन में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका संकेत पहले ही दे दिया था। वैसे भी काफी समय से इसकी मांग की जा रही थी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभालने के बाद जो नारा दिया। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ उससे महिला सशक्तिकरण के लिए उनकी सोच स्पष्ट होती है। उन्होंने जब लड़कियों के जन्मदिन पर उनके साथ पिता की सेल्फी भेजने का आह्वान किया तो देश में बेटियों के प्रति नजरिए में न केवल बदलाव आया बल्कि एक उल्लास और आनंद का वातावरण बना।

जिस देश में कन्या भ्रूण हत्या एक कलंक बन गई हो और स्त्री-पुरुष अनुपात में जबर्दस्त असंतुलन पैदा हो गया हो, कुछ राज्यों में तो यह 1000 पुरुषों पर 800 महिलाओं तक आ गया हो तब बेटियों के जन्म और उनके संरक्षण के महत्व को आसानी से समझा जा सकता है।

हालांकि कुछ मजहबी कुंठाओं से ग्रस्त कट्टरपंथी और संकीर्ण सोच के लोगों ने इस फैसले पर अपनी बेहद कुत्सित प्रतिक्रिया भी दी, जबकि देश में अधिकांशत: सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत हुआ। समाजवादी पार्टी के एक सांसद जिनका भारतीयता विरोध अक्सर सामने आता रहा है चाहे वह वंदेमातरम का मुद्दा हो या कुछ अन्य, ने तो यहां तक कह दिया कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने से उनके ‘आवारा’ होने का खतरा बढ़ जाएगा। एक मौलवी साहब कह रहे थे कि इससे माता-पिता पर और लंबे समय तक लड़कियों को सुरक्षा करने की जिम्मेदारी बढ़ेगी। दुर्भाग्य से यह वहीं सोच है जो महिलाओं को केवल बच्चे पैदा करने की मशीन मानते हैं, अन्यथा भारतवर्ष में स्त्री शिक्षा, उनके जीवन का सम्मानपूर्वक उन्नयन, उनकी सुरक्षा व सशक्तिकरण प्राचीन काल से रहा है। भारतीय साहित्य ऐसी गौरवशाली कथाओं से भरा पड़ा है। यह अलग बात है कि भारत के पराधीनता काल में चाहे वे मुगल रहे हों या अंग्रेज, भारतीय समाज जीवन को अनेक विकृतियों का शिकार बनाया गया और बड़े अपमानजनक व गलत तरीके से उसे प्रस्तुत किया गया। एक आक्रांता मुगल शासक जिसे ‘महान’  पढ़ाया जाता है, का उल्लेख आता है कि वह आगरा में सिर्फ महिलाओं के लिए मीना बाजार लगवाया करता था ताकि वहां आने वाली सुंदर हिंदू स्त्रियों को उसके जासूस जो महिलाओं के रूप में वहां घूमते थे, चिन्हित करके हरम में भेज सकें। ऐसी घटनाओं से डरकर माता-पिता लड़कियों की सुरक्षा के लिए, चिंतित होकर परदा प्रथा या बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के शिकार हुए। लेकिन उस काल में भी स्त्री सशक्तिकरण की चेतना का स्फुलिंग दहकता रहा और केशवचंद्र सेन, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा ज्योतिबा फुले व सावित्री बाई फुले जैसे अनेक समाज सुधारक समय-समय पर सामने आते रहे।

मोदी सरकार के इतने प्रोग्रेसिव फैसले पर जो लोग उंगली उठा रहे हैं, उनकी मानसिकता को समझने के लिए इस पृष्ठभूमि को जानने की आवश्यकता है जिसे जानबूझकर कम्युनिस्ट इतिहासकारों व बुद्धिजीवियों ने न केवल कपटपूर्वक छिपाया, बल्कि इसके उलट झूठ प्रचारित किया जाता रहा। जैसे आज भी ‘फ्रीडम स्ट्रगल ऑफ इंडिया’ के नाम पर पढ़ाया जाता है कि भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी ‘रिवॉल्यूशनरी टेररिस्ट’ थे। इतिहासकार विंसेंट स्मिथ की पुस्तक  ‘अकबर द ग्रेट मुगल’ में लिखा है कि अकबर भारत में एक विदेशी था। उसकी नसों में खून की एक बूंद भी भारतीय नहीं थी। आगरा में मीना बाजार लगवाता था। विडंबना देखिए कि उसी अकबर को महान देशभक्त और वीर योद्धा और राणा प्रताप के मुकाबले महान बताया जाता है। कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीयों को हेय दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है और यौन नैतिकता का मजाक उड़ाया गया है। फिल्मकार महबूब खान जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, ने फिल्म मदर इंडिया बनाकर इसका कड़ा जवाब दिया और भारतीय स्त्री की नैतिक दृढ़ता का मानदण्ड प्रस्तुत किया। इसी परिप्रेक्ष्य में मोदी सरकार के इस फैसले के महत्व को समझने की जरूरत है।

करीब 43 साल बाद लड़कियों की शादी की उम्र में यह बदलाव हुआ है। सन् 1978 में शारदा एक्ट में संशोधन कर लड़कियों की शादी की उम्र 15 से 18 वर्ष की गई थी और अब जब जीवन की परिस्थितियां आधुनिक संदर्भ में काफी कुछ बदल गई हैं, तब यह आयु सीमा बढ़ाना एक नई सोच का परिचायक है। प्रधानमंत्री कहते हैं- देश की महिलाओं को जब भी मौका मिला, उन्होंने देश को मजबूत करने में योगदान दिया। बेटियों को कुपोषण का शिकार होने से बचाने में कानून के इस बदलाव से मदद मिलेगी। वास्तव में देखें तो दो-तीन कारणों से इस कानून संशोधन की अहमियत को समझा जा सकता है। देश में जच्चा-बच्चा मृत्यु दर का आंकड़ा चिंताजनक है। अमूमन 18 साल की उम्र तक लड़कियां शारीरिक व मानसिक रूप से शादी और मातृत्व के लिए परिपक्व नहीं हो पाती है। सामाजिक दबाव में माता-पिता बेटी की शादी कर उसके सुरक्षित भविष्य की कल्पना करते हैं, पर वह वास्तव में अपनी वैवाहिक भूमिका के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाती है। इसका बेहद प्रतिकूल असर उसके जीवन और संतान पर पड़ता है। अत: यह तर्क बेमानी हैं कि जब 18 साल में मताधिकार मिल गया तो कन्याओं की शादी इस उम्र में क्यों नहीं? इस उम्र में जच्चा-बच्चा के कुपोषण का खतरा काफी रहता है। इसके आंकड़े काफी चिंताग्रस्त करने वाले हैं, विशेषकर अपेक्षाकृत सुविधा-संपन्न शहरी क्षेत्रों के तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रधानमंत्री ने स्वयं कुपोषण पर चिन्ता जताई है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात- अब समय बहुत बदल गया है। यह करियर और शिक्षा की उत्कृष्टता का युग है जिसमें हमारे देश की बेटियां नित नया इतिहास रच रही हैं। अंतरिक्ष से लेकर मंगलयान और प्रशासनिक, सामाजिक व शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भूमिका हमें गर्वोन्नत करने वाली है। इस बदलते दौर में उनके सपनों को उड़ान देने के लिए नूतन अवसरों की जरूरत है ताकि वे शिक्षा, सफलता और करियर की महान ऊंचाइयों को छू सकें। विवाह निश्चय ही भारत की एक विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था है जो विश्व में अनुपम है। पर, वो बेटियों के आर्थिक सामाजिक उन्नयन में बाधा न बने। उनका जीवन आत्मनिर्भर, ज्यादा सुरक्षित और सम्मानित बने, इसके लिए नए अवसर दिए जाना आवश्यक है। आजकल तो आमतौर पर प्रोफेशनल महिलाएं 30 की उम्र के बाद ही शादी करती हैं। तो सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम इस दृष्टि से बेहद अहम है ताकि बेटियों के लिए नए क्षितिज के द्वार खुलें। इसलिए भारत में सामाजिक सुधारों की परम्परा में यह एक और कड़ी जुड़ती है। इससे महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा व करियर के नए रास्ते बनेंगे। इससे उनके शारीरिक व मानसिक विकास के स्तर को मजबूत होने का अवसर बढ़ेगा।

बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियां स्त्रियों के सामाजिक उन्नयन में बड़ी बाधाएं रही हैं। यह उसी घृणित मानसिकता का विस्तार है, जो ‘लड़कियां पढेंग़ी तो बिगड़ जाएंगी’ जैसी सोच स्थापित करने का प्रयास करती रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का सूत्र देकर इसकी कड़ी काट प्रस्तुत की है। स्त्री के अपमान और उत्पीडऩ को रोकने के लिए इस सरकार ने तीन तलाक जैसी निर्ममता के विरुद्ध कानून बनाया। जबकि इसके विपरीत एक अन्य प्रधानमंत्री ने सत्ता स्वार्थों के लिए मजहबी ताकतों के सामने घुटने टेकते हुए शाहबानो मामले में स्त्रियों के भरण-पोषण की सुरक्षा देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को संसद में अपनी पार्टी की ताकत से बदल दिया। इससे तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं के लिए जो एक सुअवसर आया, वह फिर उनके नारकीय जीवन का अंदेशा बन गया।

इस नए कानून के बाद यह समझना भी जरूरी है कि केवल कानून बन जाने या सरकारों की सकारात्मक भूमिका से ही सब कुछ नहीं बदलेगा, बल्कि इसके प्रति सामाजिक जागरूकता और परिवार की सजग सक्रियता अत्यंत आवश्यक है। कोई भी समाज स्त्रियों के सम्मान, उनकी सुरक्षा व उनके लिए शिक्षा व आत्मनिर्भरता के अवसरों को सुदृढ़ करके ही आधुनिक व प्रगतिशील बन सकता है। भारत में तो स्त्री परिवार व समाज की धुरी रही है। भारत की इस ऋषि परंपरा को मोदी सरकार का यह फैसला निस्संदेह और मजबूती देगा। गांव-गांव यह संदेश और जागरूकता फैलाने की जरूरत है।

 

प्रो. बल्देव भाई शर्मा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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