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विखंडित होता पाकिस्तान

विखंडित होता पाकिस्तान

14 अगस्त 1947 को धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन से पाकिस्तान के रूप में चार प्रांत- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा -अस्तित्व में आये। इसके साथ ही पाकिस्तान ने पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान को भी अपने कब्जे में ले लिया, जिसे 01 नवम्बर 2020 को अस्थायी प्रांत का दर्जा भी दे चुका है। वर्ष 1956 के पाकिस्तान के संविधान में यह इस्लामी गणतंत्र था तथा 1973 में नई बात जुड़ी कि सभी कानून कुरान के अनुसार बनाए जाएंगे। भारतीय संस्कृति की विरासत की बात कहीं पर नहीं थी। अपने इस्लामिक राष्ट्र के पहचान को बनाने के लिए उर्दू को अपनी भाषा के रूप अपनाकर हजारों वर्षों की बलूचों, सिंधियों, पश्तूनों की भाषा व संस्कृतियों को नष्ट करना शुरू कर दिया, जो एक राष्ट्र के रूप में अपनी अस्मिता के साथ स्वतंत्र रहना चाहते थे। इसी प्रकार पाकिस्तान ने बांग्लादेश के बंगालियों की भाषा व संस्कृति का दमन करना शुरू कर दिया था तथा बंगाली भाषा के स्थान पर उर्दू थोपने की कोशिश की थी। परन्तु वर्ष 1971 में भारत ने बंगाली अस्मिता की रक्षा करते हुए बांग्लादेश को एक स्वतंत्रता राष्ट्र के रूप में स्थापित कर दक्षिणएशिया की भू-राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया,जो अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध है तथा इस वर्ष 2021 में अपनी स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती मना रहा है।

बलूचों की अपनी विशिष्ट सभ्यता और संस्कृति है। उनकी अपनी बलूची भाषा है, जिसको मिटाने के लिये पाकिस्तान ने जबरन उर्दू को थोपा, जो संघर्ष का प्रमुख मुद्दा रहा है। भारत के विभाजन से पूर्व 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बना लेकिन 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया और बलूचों की भाषा व संस्कृति को नष्ट करने लगे। किल एंड डम्प नीति के तहत बलूचों की कब्रे मिलने लगी, जो अपनी भाषा व संस्कृति की रक्षा के लिए एक राष्ट्र के रूप में अलग होना चाहते है। बलूचिस्तान मुक्ति आंदोलन को सफल बनाने के लिए बलूच राष्ट्रवादियों ने संघर्षों की शृंखला वर्ष 1948, 1958, और 1962 में की और 1970 के दशक से बलूच राष्ट्रवाद में सशक्त उभार आया। आज हर एक बलूची का सपना बलूचिस्तान को स्वतंत्र करना है।

मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण से लेकर भारत विभाजन की सर्वाधिक त्रासदी झेलने वाले सिंधियों ने कभी अपनी पहचान नहीं खोने दी। परन्तु पाकिस्तानी सेना व सरकार द्वारा सिंधी बहू-बेटियों का अपहरण व जबरन मतांतरण किये जाने तथा भाषा के रूप में उर्दू को थोपे जाने से पहचान का संकट पैदा हो गया, जिसके विरोध में वर्ष 1967 से सिंधु देश की मांग शुरू हुई। वर्ष 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद सिंधी नेता जी एम सैयद ने ‘जिए सिंध तहरीक’ संगठन बनाकर सिंधु की स्वतंत्रता की मांग शुरू की। 17 जनवरी 2021 को जीएम सैयद की 117वीं जयंती पर ‘जिये सिंध मुत्ताहिदा महाज’ नाम के संगठन ने ‘सिंध को पाकिस्तान से आजादी चाहिए’ नाम से एक विशाल रैली की तथा सिंधियों ने आजादी के नारे लगाए और कहा कि सिंधु, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक धर्म का घर है। इस पर पहले ब्रिटिश साम्राज्य ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया था और फिर आजादी के समय पाकिस्तान के इस्लामी हाथों में दे दिया।

पश्तूनों की भाषा पश्तो है, जो अपनी आदिवासी आचार संहिता पश्तून वाली की मर्यादा में जीवन व्यतीत करते है। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) को खत्म करने के पीछे की मनसा पश्तूनों की भाषा व संस्कृति को नष्ट करने की रही है, जिसके लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा हत्याओं का क्रम चलता रहा है। इसके विरोध में वर्ष 2014 में मंजूर अहमद पश्तीन ने पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) की शुरुआत की तथा डूरंड रेखा के दूसरी तरफ अफगानिस्तान में रहने वाले पश्तूनों के एकीकरण की बात की। इसके साथ ही सांस्कृतिक रूप से एक कहे जाने वाले तथा पाकिस्तान का लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्रफल पर रह रहे पश्तून और बलूच समुदाय को मिलाकर ग्रेटर अफगानिस्तान की मांग कर पाकिस्तान के विघटन की आधारशिला रख दी।

वैदिक काल में शारदा पीठ अध्ययन का प्रमुख केंद्र था तथा खुद की शारदा लिपि विकसित थी, परन्तु आज पीओके पाकिस्तान के अत्याचार, शोषण व उपेक्षा से बदहाल है। जुलाई 2021 में पीओके में हुये चुनाव में धांधली के विरोध में पीओके की नीलम घाटी में उग्र प्रदर्शन हुए, पाकिस्तानी झण्डा भी जलाया गया। ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’, ‘ये जो दहशतगर्दी है उसके पीछे वर्दी है’, ‘पीओके मांगे आजादी’ जैसे नारे लगे है। पाकिस्तान के अत्याचारों के खिलाफ आजादी के लिए पिछले 74वर्षों से पीओके में संघर्ष जारी है और वे भारत में शामिल होना चाहते है। इसी प्रकार पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों के साथ अन्याय किया। नादर्न एरिया के नाम से गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तानी संविधान का हिस्सा कभी नहीं रहा बल्कि ‘मिनिस्टरी आफ कश्मीर अफेयर्स एंड गिलगित-बाल्टिस्तान’ नाम का एक विशेष मंत्रालय है जिस पर पाकिस्तानी सेना व आईएसआई का कब्जा है। प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के साथ ही जो लोग मुखर होते है उनका दमन कर दिया जाता है। इसलिए ये पाकिस्तान से अलग होकर भारत के साथ बेहतर अपना भविष्य देख रहे है।

मूलभूत सुविधाओं के नाम पर विकास सिर्फ पंजाब में हुआ है, जो पूरे पाकिस्तान का पर्याय बना हुआ है। बलूच, सिंधी व पश्तूनों के संसाधनों को लूट कर पंजाब व पंजाबी संस्कृति को चमकाया जा रहा है। परन्तु देश रक्तपात और सेना द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से नहीं चलते। सरकार के ऊपर की सरकार पाकिस्तानी सेना है, जो आतंकवाद का जनक, पोशक व निर्यातक है। आर्थिक रूप से कंगाल हो चुके पाकिस्तान ने विकास के नाम पर सिर्फ आतंकवाद का ही विकास किया है। छद्म इस्लामिक राष्ट्रीयता के कारण आज पाकिस्तान की भाषाई, सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान का संकट गहरा हो चुका है, जिससे वह आर्थिक व भौगोलिक रूप से एक विघटित राज्य के रूप में दिखने लगा है। अपनी भाषा व संस्कृति की रक्षा के लिए स्वतंत्र राष्ट्र का सपना संजोए सिंधी, बलूच और पश्तून आंदोलित है और बांग्लादेश की तरहउनके भी सफल होने तथा भू-राजनीतिक परिवर्तन की उम्मीद की जानी चाहिए।

 

डॉ. नवीन कुमार मिश्र

 

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