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धर्म विज्ञान

धर्म विज्ञान

धर्म यदि धन, धरती व्यक्ति समाज पर अतिक्रमण करने लगे तो वह अधर्म बन जाता है। आज दुनिया के लगभग सभी धर्म इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। इसीलिए इस दुनिया के विनाष और पतन का मूल कारण धर्म तंत्र ही बनने जा रहा है। अत: अगला विश्व युद्ध जल, जमीन, जंगल व अन्न आदि के लिए नहीं होगा बल्कि धर्म के नाम पर ही होगा।

पहले धर्म धारणा और धर्म सेवा का एक ही मापदंड निर्धारित था कि व्यक्ति तप करे। अक्षरज्ञान ज्ञान का परिचय मात्र होता है यथार्थ ज्ञान तो आत्मबोध और आत्म अनुभूति से प्राप्त होता है।

अत: ऋषि आत्मा आत्म अनुभूति के द्वारा प्राप्त ज्ञान को अर्जित कर ज्ञानदान किया करते थे, इस प्रकार धर्म सेवा ही उत्तम कार्य था। आज ऐसा नहीं हैं, धर्म सेवा व धर्म कार्य करने के लिए पहले आध्यात्मिक फाइव स्टार आश्रम बनाना पड़ता है। फिर अलग से एक पंथ खड़ा करना पड़ता है।

फिर समता, एकता की बात करते हुए विभेदता के आधार पर अपने द्वारा निर्मित धर्म व्यवस्था का प्रचार किया जाता है। ऐसा करने के लिए धर्म को सबसे पहले धन की आवश्यकता होती है। जिसके लिए धर्म को औद्योगिकीकरण और अपराधीकरण किया जाता है। इसीलिए आज कई संतो को सलाखों के पीछे खड़ा होना पड़ रहा है।

इस प्रकार धर्म के दो आधार हैं :

पहला परमात्मा के द्वार बनाई गई धर्म व्यवस्था

और दूसरा मानव निर्मित धर्म व्यवस्था

परमात्मा की धर्म व्यवस्था के अंतर्गत वेद, यज्ञाग्नि, और गाय के सम्मान का विशेष महत्व होता है।

मानव की धर्म व्यवस्था में – कई मत, पंथ संस्था और गुरुवाद का थोक व्यापार चलते है। इसके अंतर्गत धर्म को एक प्रोजेक्ट कंपनी के रूप में विकसित कर पल्लवित एवं पुष्पित किया जाता है। जहां व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार भगवान और भक्ति को पसंद करते हैं। फिर उस धर्म व्यवस्था का अनुसरण करते हुए धर्म प्रचार करते हैं।

पहले धर्म का विस्तार गाय से हुआ करता था, आज धर्म का विस्तार व्यक्तिवाद, धन, व्यापार और विवाद से होता है। हिन्दू धर्म पूजा पद्धति में गत भिन्नता एवं उसका परिणाम – वैदिक काल में हम प्रकृति और प्राणी जगत के पुजारी थे, तत्पश्चात् पौराणिक युग व्यवस्था के अंतर्गत मूर्ति पूजा पर आ गये, वर्तमान समय में व्यक्ति पूजा प्रधान बन गया है।

  1. व्यक्ति पूजा से धर्म के अंतर्गत स्वार्थ की भावना प्रबल होती है जिससे समाज में धार्मिक विभेद उत्पन्न होता है। धर्म कुंठित हो जाता है। इसीलिए व्यक्ति पूजा को अधर्म कहा गया है।
  2. तांत्रिक पूजा – तमोगुण है- इससे धर्म के अंर्तगत हिंसा, हत्या और विनाश की प्रवृति उत्पन्न होती है। जिसे देवपूजा के नाम पर असुर पूज कहा जाता है। जिसके अंतर्गत धर्म विकृत हो जाता है।
  3. मूर्ति पूजा – रूप, रंग, श्रृंगार, शोभा, भोग-भव्यता आदि व्यवस्था मूर्ति पूजा में सम्मिलित किया गया है। जो रजोगुण से संबंधित है, इसीलिए मूर्ति पूजा को रजोगुण कहा गया है।
  4. वेद, यज्ञाग्नि, सूर्यदेव और गौमाता की पूजा को – सतोगुण कहा गया है। यह चारों मिलकर प्रकृति और प्राणी जगत को धारण करता हैं। एवं सृजन की शक्ति प्रदान करता है। अत: इन चारों पूजा पद्धतियों में सतोगुण प्रधान वेद, यज्ञाग्नि सूर्य देव और गौमाता की पूजा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

 

 साभार : गौ संहिता

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