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खुशहाल जीवन के लिए सात्विकता

खुशहाल जीवन के लिए सात्विकता

खुशहाल जीवन के लिए सात्विकता यानी सात्विक भोजन, सात्विक विचार और सात्विक कर्म प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है।

सात्विक भोजन क्या है?

सात्विक भोजन वह है  जो आयु बढ़ाता है, यह प्राकृतिक है, शक्तिदायक है, ऊर्जावान है, खाने में आनंददायक है, और सकारात्मकता देता है। इसे देखने पर अच्छी  भावनाएं जाग्रत होती हैं,  इसमें नमी है, रसदार है, यह ताजा है।

उदाहरण- दूध, गाय का घी, सब्जी, फल, गुड़, गेहूं, जौ, चावल, और अधिकांश हरी सब्जियां और फल। मौसम अनुसार ताजे  फल,  ताजी सब्जियां, अंकुरित अनाज और मेवे आदि।

पका हुआ खाना  

खाने को पका कर खाने से  उसके पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं और नष्ट हुआ खाना विजातीय/विषैला हो जाता है। यह विषैला पदार्थ शरीर के अंगो में जम जाता है और उन अंगो का कार्य शिथिल कर देता है, और बिमारियों का जन्म होता है।

अपनी जिह्वा की तुष्टि के लिए/स्वाद के लिए  पकाया हुआ खाना राजसिक खाना माना जाता है। इस खाने से शरीर रोगाणु होता है। जिह्वा  पर  जब नियंत्रण नहीं रहता तब इन्द्रियों पर भी नियंत्रण नहीं रहता और मन की इच्छायें पनपती हैं। इच्छा की पूर्ति न होने पर मन में द्वेष और क्रोध उत्पन्न  होता है और इस  प्रकार मन अशांत रहता है।

रेडीमेड खाना, पेय द्रव्य जैसे कोका कोला आदि, डिब्बा बंद खाना, फ्रिज में रखा हुआ खाना, बासा खाना, तला हुआ खाना, चटपटा  मसालेदार खाना, चॉकलेट, मिठाइयां आदि सभी राजसिक खाना कहलाते हैं।

हमें  प्रेशर कुकर में पके हुए खाने के बजाय भाप द्वारा  खाना बनाना चाहिए। भाप द्वारा बना खाना शीघ्र ही बन जाता है और समय की भी बचत होती है। यह खाना अधिक पौष्टिक भी होता है। भाप वाले खाने को तेल आदि में फ्राई करने की आवश्यकता नहीं, खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए  थोड़ा लहसुन, अदरक, जीरा आदि को थोड़े से सरसों के तेल में भून कर मिला लें। मिर्च, मसालों आदि से दूर रहें ।

तामसिक खाना (मांसाहारी भोजन) मनुष्य के लिए नहीं बना क्योंकि हमारी पाचन प्रणाली शाकाहारी खाना खाने के लिए ईश्वर ने डिजाइन की है। मांसाहारी खाना हिंसा कर के खाया जाता है, इसलिए उस के खाने से हिंसक मानसिक प्रकृति बन जाती है।

सात्विक विचार

सात्विक खाना खाने से मन शुद्ध  होता है और मनुष्य  को अच्छे कर्म करने की प्रेरणा  आती है और अच्छे विचार उदय होते  हैं। मन शांत रहता है और शरीर में सकारात्मक सोच की उपज होती है। सकरात्मक सोच से शरीर में हैप्पी हार्मोन ज्यादा बनते है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है और बीमारियां दूर रहती हैं।

सात्विक कर्म

गीता में बताये  हुए तीन प्रकार के कर्म सात्विक (जो अपने लिए नहीं समाज कल्याण के लिए किये जाएं), राजसिक (जो अपने स्वार्थ या अपनी इच्छापूर्ति के लिए किये गयें हों) अथवा  तामसिक (जो किसी को नुक्सान दे कर किये गयें हों) हैं। आप को देखना होगा की कौन सा कर्म ऐसा है जो ज्यादा से ज्यादा सात्विक हो। हमेशा याद रखें।

जैसे कर्म नर करे, वैसे फल को पाय।

खायी खोदे अन्य हित, गिरे कूप में जाय।।

आप उसी मार्ग को चुने जिसमें सात्विक कर्म ज्यादा से ज्यादा हों। सात्विक खान-पान और सात्विक विचारधारा से विवेक, बुद्धि विकसित होती है और सात्विक कर्मों को करने की प्रेरणा स्वयं आ जाती है।

अक्सर लोग कहते हैं हम तो सदियों से पका हुआ खाना खा रहें हैं सात्विक भोजन की प्रणाली में कैसे आएं? इसके लिए आप धीरे-धीरे अपने को तैयार करें और पका हुआ खाना कम करें और कच्चा खाना जैसे सलाद, फल सब्जी का जूस, अंकुरित दाने, भाप की हुई  दाल  और सब्जियां लेनी शुरू करें। कुछ ही महीनों में आप सात्विक खाना खाने के अभ्यस्त हो जाएंगे और आप को सात्विक खाने  का आनंद आना  शुरू हो जायेगा और इसका जीवन में स्पष्ट  फायदा नजर आने लगेगा। इस प्रकार सात्विकता में ही खुशहाली जीवन का रहस्य है, और सात्विकता अपनाये।

 

रमेश कुमार

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