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आस्था के साथ खिलवाड़!

आस्था के साथ खिलवाड़!

कुछ ऐसा जरूर है जिससे भगवान जगन्नाथ तमाम हिंदू देवी-देवताओं की पांत में कुछ अलग दिखते हैं। यह नाम ही चमत्कारिक आकर्षण पैदा करता है। जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ जगत यानी ब्रह्मांड का स्वामी है। यह अनोखा है कि किसी भी धर्म में किसी भी देवता का ऐसा नाम सुनने को नहीं मिलता है। देवों के नाम संसार में दृश्य चीजों के आधार पर हैं, लेकिन जगत या ब्रह्मांड तो असीम है।

जगन्नाथ की संस्कृति में कई शताब्दियों के मिथक, किवदंतियों और इतिहास का महामिश्रण है। जगन्नाथ की भक्ति किसी एक धार्मिक पंथ का मामला नहीं है बल्कि, यह पूरे संसार के लिए एक जीवंत दर्शन है, जिसका प्रसार भी विश्व भर में है। ओडीशा के लोगों के लिए जगन्नाथ एकांतिक भक्ति की धार्मिक आकांक्षा के स्वाभाविक प्रतीक हैं। जगन्नाथ की भक्ति में आर्यस्वरूप में घुली गैर-वैदिक परंपराओं और शैव, शक्ति, वैष्णव, जैन तथा बौद्ध दर्शनों का संगम है।

हर युग के भक्तों को चमत्कृत करने वाले भगवान जगन्नाथ का एक दूसरा पहलू उनका शारीरिक रूप है। उनका शरीर किसी मनुष्य या जानवर की देह से मेल नहीं खाता। 1506 में गुरु नानकजी पुरी में भगवान को देखकर चकित रह गए थे। भक्ति परंपरा के गुरु नानक निरंकार के उपासक थे। जगन्नाथ को देखकर वे बोले, ”ना आकार, ना निराकार, किंकर’’। किंकर के जरिए उन्होंने तीन रंगों, तीन अलग आकारों की व्याख्या की जो कल्पनातीत है। अंत में यह देखिए कि हिंदू धर्म में भला किसी भगवान की नश्वर मनुष्य की तरह मृत्यु कैसे संभव है। पुरी के भगवान मृत्यु के चक्र में फंसते हैं और हर चौदह साल बाद जन्म लेते हैं। इस कर्मकांड को नवकलेवर कहते हैं। किसी भी तर्क से इस विचित्र पहलू को नहीं समझा जा सकता। किसी दूसरी संस्कृति या प्रथा-परंपरा में यह नहीं देखा गया है। जगन्नाथ आम जन के भगवान हैं। भगवान की यह मानवता रथयात्रा के दौरान देखी जा सकती है, जिसे पतितपावन यात्रा कहते हैं। इसमें पुरी के राजा गजपति भी सफाईकर्मी की भूमिका निभाते हैं और रथ की सफाई करते हैं जिसमें भगवाल यात्रा पर निकलते हैं।

कहीं और ऐसा देखने को नहीं मिलता कि राजा भगवान की सेवा के लिए आम जन जैसा बन जाता हो।

श्री जगन्नाथ मंदिर की पूजा विधि किसी और मंदिर से एकदम अलग है। इसमें हिंदू धर्म के तमाम पहलुओं को एक मंच पर इकट्ठा किया जाता है। ये कार्यक्रम बेहद मुश्किल हो गए हैं। इस बार नवकलेवर कर्मकांड के दौरान सेवादारों द्वारा की गईं अनियमितताएं तो हद ही पार कर गईं। इससे ओडीशा के लोगों की भावनाएं आहत हुईं और समूचे राज्य में भारी हो-हल्ला मचा गया। सरकार और मंदिर प्रशासन ने पुरोहितों के अपवित्र कार्यों से आहत हुईं भावनाओं पर मरहम लगाने की कोशिश की। इस गोपनीय कर्मकांड के समय सिर्फ चार निर्धारित पुरोहितों को ही मौजूद रहने की अनुमति होती है, लेकिन उनके दर्जनों भाई-बंधु वहां घुस गए, जिसे पाप माना जाता है और क्षमा योग्य नहीं होता।

यह कोई इकलौती घटना नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि तो पिछले साल से ही तैयार हो रही थी। पिछले साल रथ यात्रा के दौरान पुरी के शंकराचार्य के साथ जैसा व्यवहार किया गया, वह बता रहा था कि आगे कैसे-कैसे नजारे दिखेंगे। उसी रवैए का नतीजा हाल की घटना के रूप में सामने आया है। हालात ऐसे बन गए थे लगता था कि मामला हाथ से निकल जाएगा। शंकराचार्य भौचक्के रह गए। गजपति राजा ने हैरान होकर अपने हाथ खड़े कर दिए। मंदिर प्रशासन को काटो तो खून नहीं था। मुख्यमंत्री कहीं छुप गए। सेवादार और दैतापति विद्रोह कर उठे। ओडीशा के लोगों के और जगन्नाथ भक्तों के आंसू निकल आए।

जो हुआ वह शर्मनाक था। ओडीशा हमेशा गलत वजहों से ही सुर्खियों में रहता है, चाहे चक्रवात हों, घोटाले हों या आदिवासियों की हत्या वगैरह। नवकलेवर कर्मकांड ओडीशा की समृद्ध संस्कृति और उसकी सुंदरता को दुनिया के सामने दिखाने का अनोखा मौका था। वहां लोगों की भीड़ कुंभ की तरह उमड़ती है। सरकार के पास 40 लाख भक्तों की व्यवस्था करने का पर्याप्त समय था। यहां तक कि केंद्र ने भी अपना खजाना खोल दिया था, रकम की कोई कमी नहीं थी। लेकिन, वे हर मोर्चे पर नाकाम हुए। मर्फी का नियम भी यही कहता है कि जिसे गलत होना है, वह गलत होकर ही रहेगा। नुकसान भरपाई की कोशिशें भी बेमानी थीं। अब ओडीशा के लोग, मौजूदा सरकार और जगन्नाथ भक्त सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं कि नवकलेवर और रथ यात्रा सामान्य ढंग से हो जाए।

अभी भी उम्मीद है। जगन्नाथ बेहद करूणामय हैं। पंडित नीलकंठ दास ने कहा है, ”यहां किसी धर्म को खारिज नहीं किया जाता। सभी देवी-देवताओं को मंदिर में स्थान मिला है। जगन्नाथ ने सबका स्वागत किया और सबको गले लगाया, लेकिन किसी के भाव में नहीं बहे और स्वयं को किसी में मिलाया नहीं।’’ लेकिन, हमें यहां ऋगवेद का वह वाक्य नहीं भूलना चाहिए कि ”एकम् सत विप्रा वहुदा वदंति’’ (सत्य एक है, बुद्धिमान उसे अलग-अलग तरह से बताते हैं)। जय जगन्नाथ।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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