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बदलते अमेरिका की बदलती चुनौतियां

बदलते अमेरिका की बदलती चुनौतियां

मैं 6 जनवरी 2021 को अमेरिका में पहुंची ही थी कि कैपिटल हिल पर आक्रमण की अभूतपूर्व घटना हो गई। ठंड और बर्फबारी के बीच यह समझ पाना बेहद कठिन था कि वास्तव में हो क्या रहा है? अमेरिकी प्रजातंत्र पर आक्रमण के तौर पर इतिहास में लिखे जाने वाली इस घटना का वास्तविक सत्य राजनैतिक संघर्ष में छिप गया है। अमेरिका का लिबरल मानस यह मानता है कि पूर्व राष्टपति और उनके समर्थकों ने ही इस घटना की मूल मानसिकता को हवा दी। जबकि ट्रंप समर्थक धड़ा यह मानता है कि जनता में चुनाव परिणामों को लेकर अविश्वास ने गुस्से को जन्म दिया और यह घटना इसी गुस्से का प्रत्यक्ष परिणाम था।

न्यायिक और सदन की पड़तालों के मध्य झूलती इस घटना का सत्य जब सामने आएगा तब आएगा लेकिन फिलहाल इस घटना की वार्षिकी मनाते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति वाइडन ने इसे अमेरिका के लोकतंत्र पर होने वाली भयंकर घटना के तौर पर प्रतिपादित किया है। राजनैतिक दांव-पेच खेलते हुए उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति पर सीधा हमला बोला जिससे वो साल भर तक परहेज करते दिख रहे थे। उन्होंने अपने भावुक संबोधन में अमेरिकी जनमत को यह विश्वास भी दिलाया है कि इस प्रकार की घटना का दोहराव कभी भी अमेरिकी लोकतंत्र के लिए नहीं होना चाहिए क्योंकि यह अमेरिकी प्रजातंत्र व अमेरिकी मूल्यों पर छुरी जैसा वार है। ट्रंप की सार्वजनिक बुराई का शानदार मौका भी में इस भाषण के माध्यम से उन्होंने ढूंढ निकाला। अमेरिका में अब भी ट्रंप का एक डेडीकेटेड चाहने वाला वर्ग है।

इस वर्ग के तार श्वेत राष्ट्रवाद से जुड़े हैं। मीडिया का एक विशेष हिस्सा जिसमें फॉक्स न्यूज वन अमेरिका जैसे चैनल शामिल है इस श्वेतराष्ट्रवाद को बार-बार हवा देते हैं। यह ‘राष्ट्रवाद’ भारतीय राष्ट्रवाद’ की परिकल्पना से एकदम भिन्न है राष्ट्र के तौर पर अमेरिका का चरित्र भी भारतीय चरित्र से भिन्न है। विश्व  के इस सबसे पुराने प्रजातंत्र में संघवाद का अपना इतिहास है। इसलिए यहां बैठे यह समझ पाना मुश्किल है कि राष्ट्रवाद जैसा कोई भी शब्द अमेरिकन समाज या मानस में एकदम प्रतिक्रिया कैसे उत्पन्न कर देता है। पर अमेरिकी राजनीति और समाजशास्त्र की थोड़ी भी समझ रखने वाले विश्लेषक यह जानते हैं कि अमेरिका का राष्ट्र के रूप में विकास बहुत सारे संघर्षों के बाद संपन्न हुआ है और इन संघर्षों में श्वेत मानसिकता को जाने-अनजाने राष्ट्रवाद की भावना के साथ जोडक़र देखा जाने लगा है। देशभक्ति की भावना और राष्ट्रवाद वहां पर पूरी तरह से अलग अलग करके देखे जाने वाली अवधारणाएं है। यही कारण है कि ट्रंप कालीन राष्ट्रवाद को देशभक्ति के रूप में बेचा जाना या समझा जाना तब भी कठिन था और अब भी कठिन है पर यह भी स्पष्ट है कि अमेरिकी मूल्यों को लगातार चुनौती देते रहने वाला अति लिबरल पक्ष भी वहां जनमानस के गले नहीं उतर पाता।

अमेरिकी समाज बाहर से जितना सरल दिखता है उतना सरल या लीनियर नहीं है पहले ही से नस्ल मूल और भौगोलिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर बंटे हुए अमेरिका को पिछले कुछ वर्षों ने बहुत गहरे तक बांट दिया हैं। राष्ट्रपति बाइडन ने अपने आर्थिक कार्यक्रमों के माध्यम से एक बार फिर अमेरिका की बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का वादा किया है। वायरस के परिणामों से जूझ रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए लगातार रिलीफ इंस्टॉलमेंट और आधारभूत ढांचे में निवेश करने की बड़ी योजनाओं बनाने की देंनेतृत्व की चुनौती को स्वीकार अवश्य किया है किंतु, राजनैतिक तौर पर अभी भी उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। बाइडन अब भी राजनैतिक वैधता पाने के संघर्ष में लगे है यही कारण है की उन्होंने ‘ट्रम्पिस्म’ पर सीधा प्रहार करने की वक्री चाल का सहारा लिया है।

अभी हाल ही में डेमोक्रेसी पर हुए संगोष्ठी में आमंत्रित देशों के चयन पर प्रश्नचिन्ह लगे ठीक इसी तरह उनके 6 जनवरी की वार्षिकी पर भी आलोचनात्मक व्यक्त किए गए। भाषण इधर उनके विरोधी और रिपब्लिकन या तो इस वार्षिकी से दूरी बनाए रहे या फिर उन्होंने मीडिया के माध्यम से इसे एक फुटनोट जैसी घटना से अधिक स्थान देने से इनकार कर दिया। पिछले 1 वर्ष से अमेरिका वास्तव में अमेरिका जैसा ही नहीं दिख रहा। राजनैतिक गतिरोध ने अमेरिका की सामाजिक स्पेस को गहरे तक प्रभावित कर दिया है। एक और आमजन जहां वायरस लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति सप्लाई चैन में लगातार होने वाले अंतर्विरोधो, बेरोजगारी और बहुत व्यथित करने वाली नस्लवादी घटनाओं के परिणामों से जूझता रहा है वहीं राजनीतिक परिदृश्य में पोलराइजेशन असहिष्णुता विभाजन और नागरिकता बढ़ता अंतर्विरोध लगातार परिलक्षित होता रहा है। हालांकि आम अमेरिकी अब 6 जनवरी की घटना के विषय में लगभग शर्मिंदा सा है पर तब भी उसकी व्यथा बातचीत से उभर आती है। जहां इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण कहने में कोई भी अमेरिकन पीछे नहीं रहता। पर यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है इसकी पहेली में कोई गहरे तक उतरना नहीं चाहता क्योंकि शायद यह अब तक के अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा आत्मविश्वास तोडऩे वाला घटना है।

एक आम अमेरिकन को अपने प्रजातंत्र चुनाव की पद्धति नागरिकता और आजादी और बोलने की आजादी पर गहरा अभिमान है। व्यक्तिवादी समा होते हुए भी समाज की आजादी और उस आजादी के प्रति रक्षा के लिए अमेरिकन संविधान और उससे जुड़ी हुई समस्त सिविल संस्थाएं प्रतिबंद्ध दिखाई देती हैं। कम-से-कम अवधारणा के स्तर पर ऐसा जरूर दिखाई देता है भले ही इस विषय में अमेरिका के प्रजातंत्र में अपने और अन्य देशों के लिए व्यवहार में अंतर लगातार दिखता है तब भी अमेरिका के भीतर स्वतंत्रता आजादी और खासकर बोलने की आजादी और व्यक्त करने की आजादी को लेकर जिस प्रकार की गहरी कमिट मेंट दिखाई देती है 6 जनवरी की बदसूरत घटना इन सब तथाकथित अमेरिकन मूल्यों पर सीधा प्रतिघात थी।

‘अमेरिकन ड्रीन’ का यह पतन का समय था। पर लिबरल डेमोक्रेट और रिपब्लिकन जब इस घटना की व्याख्या करते हैं तो वह व्याख्या तथ्यों के आधार पर नहीं होती भावुक राजनैतिक पक्षपात के आधार पर होती है। और यही कारण है कि पिछले 1 वर्ष में जब जब इस घटना की चर्चा होती है तो समाज के राजनैतिक अंतर्विरोध और उसके आधार पर नया-नया बढ़ता हुआ बंटवारा लगातार मुखर होकर सामने आता है। यह बंटवारा अब कैसे कार्यस्थलों से आगे जाकर चर्च, सामाजिक संगठनों, सिविल सोसाइटी, थिंक टैंक मिडिया और जनमानस में संस्थागत होता जा रहा है। देशभक्त अमेरिकन नैराश्य में है जो समझ में आता है। न्यायिक जांच और सदन के आधार पर चलने वाली जांच के समक्ष जवादियो का एक अंबार है जिस विषय पर चर्चा लगातार राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया में होती रही है पर प्रमुख प्रश्न यही है कि इस इस घटना का सामाजिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य यह तो नहीं सिद्ध करता के एक व्यक्तिवादी प्रजातंत्र के स्थान पर अमेरिका अब एक अजीबो-गरीब सामूहिकता पर आधारित टुकड़ों में बठी मानसिकता का एक बचकाना लोकतंत्र बनता जा रहा है। जहां संस्थाओं की प्रतिबद्धता विश्वस्तरीय है लेकिन वास्तविक प्रतिबद्धता कुछ भी नहीं जहां विश्व डेमोक्रेसी के सेमिनार और गोष्टिया तो होती है लेकिन आंतरिक लोकतंत्र की चिंता लगभग गोण है।

अधिकांश अमेरिकी थिंक टैंक भी इस घटना से जुड़े पहलुओं पर या तो मौन केवल अति संयमित प्रतिक्रिया ही दे पाए क्या अमेरिका हमेशा के लिए बदल गया है? क्या अब अमेरिकन नागरिकवाद और सामाजिकता की चुनौतियां बदल रही है क्या राजनैतिक परिदृश्य सदा के लिए विकृत हो गया है? क्या संविधान की संवैधानिक ता राजनैतिक हितों की बलि चढ़ गई है? क्या जिन नागरिक अधिकारों के बल पर अमेरिकी प्रजातंत्र विश्व भर में प्रजातंत्र की बात करता है उसी पर प्रश्न चिन्ह लग गया है?

आने वाले समय में नागरिकवाद अमेरिका को इन सब प्रश्नों के उत्तर न केवल खोजने ही होंगे बल्कि उन्हें जनमानस में स्वीकृति दिलवाकर अमेरिका के बदलते आर्थिक और राजनीतिक स्वरूप और पहचान को अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में भी किसी तरह फिट बैठना होगा। चीनी आर्थिक विस्तारवाद सैन्य महत्वकांक्षा प्रतिक्रियावादी मानसिकता रूस की अति वारी देने वाली अंतरराष्ट्रीय नीतियों और विश्व परिदृश्य में उभरते अन्य शक्ति केन्द्रो के संदर्भ में अमेरिका को अपनी भी अपनी राजनैतिक स्थिति और उभरते नयी चुनौतियों और मूल्यों को आत्मसात करने का और जनसाधारण में उनके प्रति फिर से आस्था जगाने का पुरजोर प्रयत्न करना होगा। तभी अमेरिका विश्व की राजनैतिक और आर्थिक परिदृश्य में अपने स्वि स्थान को शायद फिर से प्राप्त कर सकेगा। पिछले कुछ वर्षों में भारत अमेरिकी संबंधों के आयामों में विस्तार हुआ है पर भारत अमेरिकी संबंधों के आने वाले समय में सारी गत्यात्मकता इन्ही प्रश्नों के उत्तरों में छिपी है। एक सशक्त भारत अमेरिका के हित में है, उसी तरह एक सुदृढ़ अमेरिका भारत के विकास में अधिक सार्थक एवं साझेदार हो सकता है।

 

डॉ. ज्योति किरण शुक्ल

(लेखिका पूर्व अध्यक्षा वित्त आयोग, राजस्थान हैं)

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