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पहला कन्यादान, पहला सिन्दूरदान…

पहला कन्यादान, पहला सिन्दूरदान…

बारी ब्रह्मांड के प्रकट होने की थी। संसार का सृजन होने को ही था। करोड़ों अरबों वर्षों की प्रतीक्षा के बाद शरद के महासागर के गर्भ में ठंडी काली कराली रात्रि में प्रकट हुई उस सूक्ष्म अण्ड के ऊपर पसरी पूस की परत छंटने लगी थी। पृथ्वी आकार ले चुकी थी और सद्य:स्नात होकर महासागर के घुंघट से बाहर झांकने को तैयार थी। सृजन का वह साक्षात अमृत समय देखने समस्त देवगण तब उस महासागर के जल के आस-पास एक जुट हो गए थे कि मानो माघ महीने में जैसे संगम किनारे सारा जगत सिमट आता है।

सप्त ऋषियों ने लगन पत्रिका सुनाकर जैसे ही बताया कि संसार को निराकार से साकार प्रकट करने वाली वह महान नवरात्रि आने ही वाली है, सारे देवता खुशी से झूम उठे और फाल्गुन मनाने लगे। चारों ओर रंग बरसने लगा और उस रासलीला जैसे नृत्य में समस्त ब्रह्मांड डूबने लगा था। शिव और शक्ति की जो निराकार से आगे कुछ नए विस्तार की इच्छा थी, उसे साक्षात दृश्य रूप के कर्म में बदलने में देव अपनी शक्तियों के साथ अरबों वर्ष से जुटे थे। सृष्टि के सृजन का जो कार्य अब तक अप्रकट, अनभिव्यक्त था, जो क्रिया निराकार में हो रही थी, अब वही क्रिया प्रकट होने जा रही थी, अव्यक्त व्यक्त होने को उतावला था। मिलन की वह महान मंगलबेला आखिरकार आ ही गई।

शिव और पार्वती स्वयं नारायण के हाथों में इच्छा रूपी लाडली वसुन्धरा का हाथ रखकर कन्यादान कर चुके थे। अबतक चतुर्दिक अंधकार में जो जगत निराकार समाया था, उस संसार को मूर्तिमंत प्रकट करने का संकल्प नारायण ने सूर्यनारायण बनकर और लक्ष्मी ने सौभाग्यवती वसुधा-लक्ष्मी बनकर साकार कर दिखाया था। ब्रह्मांड का कण-कण तब नृत्य में मगन हो उठा था। देवों की पत्नियां मंगलाचार गाने लगी थीं, और ऋषियों के मुख से वेदमंत्र फूट रहे थे।

तभी देवों समेत समस्त विश्व ने एक विचित्र दृश्य देखा। महासागर से उठती अनन्त सौंदर्यवती पृथ्वी के गहरे काले भाल पर उस पहली प्रातबेला में जीवन प्रकट करने वाली वह एक महान सिन्दूरी रेखा तब भगवान सूर्यनारायण ने खींच दी थी। सागर के घुंघट से झांकता उस स्नानवती देवी का मुखमंडल अपने नारायण के हाथों सुहागन होकर इतना प्रदीप्त हो उठा कि सारा ब्रह्मांड ही लहालोट हो गया।

आकाश से पाताल तक समस्त देवों की आंखें चकाचौंध थीं, सृजन का वह पहला चित्र देवों की आंखों में सदा के लिए अंकित हो गया। जिस क्षण वह सुनहरा चित्र प्रकट हुआ तो ऋषियों ने उसे ही चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में चित्रा नक्षत्र की उपस्थिति में सदा के लिए धन्य माना था। निराकार अवस्था में जो विवाह कभी शिव-पार्वती का जन्म-जन्मांतर से होता आया था, उसका यह जो पहला साक्षात प्रयोग अंतरिक्ष में गगन मंडल के आंगन में  चल रहा था, उसे देख हर कोई मन ही मन मगन था,  वह अदभुत सिंदूर दान शिव के प्रथम पुत्र गणपति की अगुवाई में निर्विघ्न मंगलगान के साथ सफल हो चुका था।

शिव के दूसरे पुत्र चंद्रमा से तब नहीं रहा गया। गणपति ने जिसे निर्विघ्न कर दिखाया, उसमें उनकी भागीदारी भला क्यों पीछे रहती। अपनी बहन वसुंधरा के पास दौड़े चले आए। शिव ने वचन लिया कि जब तक बहन भूमि रूप में रहेगी तब तक तुम सूर्य के साथ रहने वाले सारे ग्रहों से इसकी रक्षा का कारण बनकर इसके चारों ओर परिक्रमा करते रहना। सूर्यनारायण ने भी मंदस्मित मुस्कान से वसुंधरा और चंद्रमा के भाई-बहन के प्रेम को ह्रदय से स्वीकार किया।

भाई जब चाहे, बहन से मिले और सुख-दुख करे। भारतीय सभ्यता को गढऩे वाले ऋषियों ने इसी मंगलबेला को देख समझकर रिश्तों नातों की अटूट डोर बनाई जिसके प्रीति बंधन में आने वाली मानवता मर्यादा के साथ बंधी रहे। सूर्य नारायण पिता बने और भूमि माता। माता भूमि: पुत्रोहम पृथिव्या:। चंद्रमा तब से ही भूमि पुत्रों के मामा कहे जाने लगे।

सकल ब्रह्मांड में चारों ओर नगाड़े बज उठे थे। शहनाईयों के सुरमई नाद के अखंड आनंद में ब्रह्मा सब कुछ देखकर वैसे ही ध्यान मगन थे जैसे पुत्र के विवाह में पिता के आनंद को वही समझे जो पिता हो। ब्रह्माजी के अन्य मानसपुत्र सप्तऋषि सृजन के सत्य को प्रकट करने वाला महान वेदमंत्र पढ़ रहे थे, शिव-पार्वती ने ही तब उस प्रथम कन्यादान का कार्य अपने हाथों से पूर्ण किया था और सूर्य नारायणदेव ने पिता प्रजापति ब्रह्म की आज्ञा से सिन्दूरदान की रस्म पूरी की।

जगत की सृजन बेला के दृश्य को देखकर चतुर्दिक आनन्द समाया था। मंत्र पढ़ते और सुनते हुए समस्त देवगणों और सप्त ऋषियों की आंखें भर आईं। साखोच्चार गाया जाने लगा। ऋषि कश्यप कहने लगे कि हे नारायण और लक्ष्मी, जब तक आप दोनों का यह जोड़ा अखंड और अमर रहेगा, तब तक जीवन का सृजन करने के लिए युग-युग तक यह सिन्दूरदान ऐसे ही होता रहेगा। यही इस ब्रह्मांड का ध्रुव सत्य है। ध्रुव समेत ये समस्त तारे, बुध, शुक्र, वृहस्पति समेत ये सभी ग्रह इस बात के साक्षी हैं। ऋषि अंगिरा ने कहा- हे नारायण, यह अग्नि जो आपके कारण प्रकट हुई है, यह अग्नि ही इस महामिलन का साक्षी है, आपके सारे कृत कार्य इस अग्नि के द्वारा ही निराकार ब्रह्माजी और शिवजी तक पहुंचते रहेंगे। ये समस्त ग्रह आदि आप दोनों की ही सेवा में तब तक जुटे रहेंगे जबतक कि आप दोनों इस सृजन के खेल को आनन्दपूर्वक खेलते रहेंगे। जीवन के प्रत्येक उषाकाल में आप प्रतिदिन इस पृथ्वी की मांग को अपने सिन्दूर से भरकर सुहागन करेंगे और जीवन के अन्त में भी जब यह पृथ्वी घनी अंधेरी मृत्यु रूपी महारात्रि में विलीन होगी, तब आप ही उसकी मांग में अंतिम सिन्दूर भरकर उसे अन्तिम विदाई देकर अपने धरा-धाम बैकुंठ में उसी के साथ  लौट जाएंगे। तब यह जगत फिर से अप्रकट हो जाएगा। जहां से आया है वहीं महाशिव की गोद में ही इसका महालय हो जाएगा। आप दोनों का साथ अमर और अनन्त ही रहेगा। अनन्त शेषशायी आप लक्ष्मी के साथ चिर विश्राम में चले जाएंगे।

भगवान विश्वकर्मा प्रजापति ने आशीर्वाद दिया कि- माता सरस्वती-ब्रह्मा और माता उमा-महेश्वर ब्रह्मांड के जिस आनन्द को अब तक निराकार निर्गुण रूप में देखते-समझते रहे हैं, उसे आप दोनों साकार रूप में देखेंगे और समझेंगे। आदिशक्ति भवानी ने जिस आनन्दलीला को देखने के लिए इस सृजन कार्य की प्रेरणा महाशिव को दी है, वह आप दोनों के ही संयोग से साकार और साक्षात पूर्ण होगी। मैं विश्वकर्मा प्रजापति सपरिवार साक्षात इस कार्य के लिए युग-युग तक आप दोनों के साथ रहेंगे।

इस प्रकार दसों प्रजापति और सप्त ऋषियों ने वर-वधू से अग्नि की चारों दिशाओं में चार परिक्रमा कर एक दूसरे को सात वचनों से बांध दिया। अपनी लीला से ही नारायण और पृथ्वी एक दूसरे के बंधन में बंध गए। समस्त जीव-जगत दोनों को अपने शरीर के भीतर अन्तर्यामी रूप में पाकर प्रसन्न हो गया। समस्त जीव-शरीर पृथ्वी के मातृत्व से मृत्तका रूपी मिट्टी का शरीर और नारायण के पितृत्व की चैतना रूपी अग्नि का संयोग पाकर जन्म लेने लगे, लेते आ रहे हैं।

…और जब लक्ष्मी रूपा वसुंधरा पृथ्वी सूर्यनारायण का वरण कर उनके साथ अपने माता-पिता के बताए मंगलकारी लोक-सृजन पथ पर सदा के लिए चल पड़ी तो दोनों ही ओर आंसू बरसने लगे। शिव और पार्वती, ब्रह्म और ब्राह्मी दोनों ने एक दूसरे को पहले तो हंसी-खुशी विदाई दी, लेकिन जब बेटी को छोडऩे की बारी आई तो दोनों बिलख उठे। रोती हुई पार्वती को मनाते हुए शिव ने कहा- पार्वती देख, तेरी ही ये इच्छा आज कितनी बड़ी हुई है, ये इच्छा आगे और फलीभूत होगी, जगत में आनन्द का कारण बनेगी, यही इसके होने का हेतु है। लेकिन अब ये इच्छा मेरी और तुम्हारी नहीं रहेगी, यह तो अपने नारायण की होगी। इस इच्छा को बढ़ते हुए देख देखकर हम भी अपने सृजन के आनन्द को पाते रहेंगे। हे नारायण, इसे सुखी रखना, इसे हमने नाजों से पाला है। इसी इच्छा से संसार जन्म  लेता आया है, लेता रहेगा, किन्तु सत्य यही है कि अब ये इच्छा हमारी नहीं रहेगी, अपने संसार की हो जाएगी जो इससे जन्म लेगा, यह इच्छा उसी के साथ रहेगी। वैसे ही जैसे, हे पार्वती, हम दोनों रहते आ रहे हैं।

यही था वह प्रथम कन्यादान। पहला सिन्दूर दान। युग-युग से अनबुझ पहेली सा यह खेल चला आ रहा है, चलता ही रहेगा। जो जान लेता है, आनन्दवत होकर पार हो जाता है। जो नहीं जानता है, वह जीवन को दु:ख और विषाद मानकर रोता है।

 

डॉ. राकेश उपाध्याय

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