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…गंगासागर एक बार

…गंगासागर एक बार

भारत में अनेक धार्मिक मेले लगते हैं। परंतु सबसे बड़ा मेला पश्चिमी बंगाल के सुंदरवन में स्थित सागर द्वीप में लगता है। गंगा के तट पर स्थित किसी भी नगर में लगने वाले कुंभ में पहुंचने वाले यात्रियों की एक दिन की गिनती यहां का मुकाबला नहीं कर सकती।

गंगा की पावन धारा अपनी लंबी यात्रा को तय करके बंगाल की खाड़ी के जलधि में आ मिलती है। जल में जल समा जाता है। गंगा और सागर का यह अनूठा संगम है। इसी संगम स्थल पर पौष मास के अंत में, जनवरी के मध्य, आमतौर पर 14 जनवरी को, मकर सक्रांति को यहां एक दिवसीय वार्षिक मेला लगता है। यह मात्र मेला नहीं, संस्कृति और धर्म का संगम है। वास्तव में तो यह लगता है कि गंगा मैया की अंतिम विदाई का यह समागम है, जिसमें जनसमूह पतित पावनी के प्रति अपनी कृतज्ञता को प्रकट करता है, क्योंकि इसकी जलधारा ने भारत को सुख शांति समृद्धि  सभ्यता और संस्कृति दी है।

मेले के दिन तो ऐसा लगता है जैसे समस्त भारत ही उमड़-घुमड़ कर वहां आ उतरा  हो। यह इक्कठ लघु भारत का दर्शन करवाता है।  इनमें बहुधा वह लोग होते हैं जिनकी भाषा, वेशभूषा, खानपान, जातिगत मान्यताएं और परंपराएं अलग-अलग होती हैं। वह तो यहां एक लक्ष्य से बंधे चले आते हैं कि उन्हें जीवन में एक बार गंगा और सागर के संगम पर स्नान करना है। इसके लिए न कोई किसी को निमंत्रण भेजता है, न कोई विज्ञापन प्रकाशित किया जाता है। वह स्वत: ही इस संगम पर स्नान करने के लिए खींचे चले आते हैं। उनकी मान्यता है कि यहां एक बार स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं। इसलिए इस तीर्थयात्रा के महत्व में यह कहावत प्रसिद्ध है-

सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।’

जब मैंने किसी अकादमिक कार्य वश कोलकाता जाना था तो मेरे सभी रिश्तेदारों और सहयोगियों ने इस अवसर पर गंगासागर भी  अवश्य जाने को कहा था। इस तरह मुझे भी इस  दुर्लभ तीर्थ यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस मेले में साधु-संत, गृहस्थी, गरीब- अमीर, बच्चे-बूढ़े सभी आते हैं। कई बूढ़े तो ऐसे होते हैं जिन्हें दो कदम चलना भी मुहाल होता है। महिलाएं अपने नवजात शिशुओं को अपनी गोदी में उठाए रहती हैं। सागर द्वीप एक दुर्गम स्थल है। यहां की यात्रा अत्यंत कठिन और दुसाध्य है।

कोलकाता तक पहुंचने के लिए यात्रियों को खचाखच भरी बसों-गाडिय़ों में कई-कई घंटों तक सफर करना पड़ता है। कोलकाता से काकद्वीप और फिर गंगा के मीलों तक फैले पाट को पार करने के लिए समुद्री पोत में बैठना पड़ता है। मेले के दिनों में तो यह यात्रियों से खचाखच भरा होता है। खड़े ही होकर जाना पड़ता है। मंजिल अभी दूर है। तीस किलोमीटर का रास्ता पैदल अथवा स्थानीय बस से तय करना बाकी है। रास्ते में पान की बेशुमार बेलों को थकान जाती रहती है।

अपनी यात्रा में मैंने अनुभव किया कि समुद्री पोत ही सागर द्वीप के आसपास बसे गांवों को कोलकाता अथवा अन्य शहरों के साथ जोड़ता है। रोजमर्रा की जरूरतों के सामान तथा अन्य पैदावार के आदान-प्रदान की यह एकमात्र कड़ी है।  वहां रहने वालों के लिए यह जीवन रेखा है। मैंने देखा है कि वह किसी पर उसी पौधों से किस प्रकार पान की टोकरियां, कच्ची सुपारी के ग_र, बकरियां, इलाज के लिए बीमार बुड्ढे-बुढिय़ा, अनेकानेक यात्री निकटवर्ती कस्बों में काम अथवा नौकरी पर पहुंचने के लिए इसे एकमात्र साधन मानते हैं।

गंगासागर की यात्रा भले ही अत्यंत श्रम साध्य है मगर कर्तव्य, भावना, आस्था और श्रद्धा  यात्रियों को डगमगाने नहीं देती और गंगा मैया और कपिल मुनि के जयकारे लगाते  लोग पहुंच जाते हैं। हर दिशा से लोगों का हुजूम बाढ़ गति से अग्रसर होता है। इस प्रवाह का सिलसिला निरंतर चलता रहता है- चौबीसों घंटे। उन्हें निश्चित दिन पर, हर हालत में गंगा सागर में स्नान करना है। यही धुन उन्हें अदम्य उत्साह से भर देती है। सागर तट पर जहां कहीं भी उन्हें स्थान मिलता है, वही तंबू गाड़ देते हैं। झंडे लहरा देते हैं। हर तरफ तंबू और झंडे नजर आते हैं। यहां एक अस्थाई बड़ा नगर बस जाता है जिसके बाजारों में करियाना के सामान के साथ-साथ शंख, मालाएं, सिंदूर, घरेलू बर्तन, तौलिए धोतिया और बच्चों के खिलौने- सभी कुछ उपलब्ध रहता है।

इस मेले और स्नान के महत्व को समझने के लिए इस कथा को जानना जरूरी है। सदियों पूर्व सागर नामक एक राजा था। अयोध्या का राजा। उसने अश्वमेध यज्ञ के लिए एक घोड़ा छोड़ा। यह घोड़ा दौड़ता-दौड़ता कई राजधानियों को लांघ आखिर सागर द्वीप पर पहुंचा। इस पर कपिल मुनि का आश्रम था। वह तपस्या में निमग्न थे। घोड़े के दौडऩे की आवाज ने उनकी तपस्या को भंग कर दिया। मुनि क्रोधित हो गए। उन्होंने घोड़े को एक पेड़ से बांध दिया। सागर राजा स्वयं इस घोड़े को छुड़ाने के लिए सेना सहित वहां पहुंचा। परंतु मुनि ने अपने तपोबल से राजा को वही सुला दिया। सागर राजा की आगामी कई पीढिय़ों के राजा वहां चढ़ाई करते रहे परंतु सभी को मुनि ने मार गिराया। इस प्रकार उस कुल के लगभग 60000 व्यक्ति मौत के घाट उतार दिए गए। आखिर उस  रघुकुल का राजा भागीरथ कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचा और उनके पैर पकडक़र बड़ी विनम्रता से कहा, ‘महात्मन् क्षमा। मेरे पूर्वजों का उद्धार कैसे होगा? उनकी मृत्यु का कोई उपचार बताइए।’

कपिल मुनि पसीज गए और कहने लगे कि जब यहां तुम गंगा मैया को ले आओगे और उसका पावन जल इन मृत जनों का स्पर्श करेगा तब तुम्हारे पूर्वजों का स्वत: उद्धार हो जाएगा और वह मोक्ष को प्राप्त हो जाएंगे। भागीरथी तभी से इसी कार्य में जुट गया और उसके अथक परिश्रम से गंगा मैया का सागर  द्वीप पर आगमन हुआ और गंगाजल के स्पर्श से उसके सभी पूर्वज मुक्ति को प्राप्त हो गए। इसी कारण जल से सटा सागर का भाग अपार जनसमूह से भर जाता है। लोग भजन गाने लगते हैं। पूजा अर्चना करते हैं। यह नैसर्गिक दृश्य है, जब अपार जनसमूह इसी प्रत्याशा में होता है कि वह शुभ घड़ी कब आएगी जब स्नान कर पाएंगे। पुजारी की घोषणा के साथ ही यात्री गंगा सागर में डुबकी लगाने लगते हैं। सागर स्नान करने के उत्साह को देखते ही बनता है। गंगासागर से बाहर निकलने को दिल ही नहीं करता। बार-बार डुबकी लगाते हैं। मैया की जय-जय बुलाते हैं।

कई बच्चों को अपने मां-बाप से यह हठ करते हुए भी देखा गया है, ‘मां! गंगा को अपने गांव ही ले चलो।’

स्नान करने के पश्चात यात्री परिवार सहित धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दक्षिणा देते हैं। इस अवसर पर गंगासागर के स्थानीय निवासी, आदिवासी सामूहिक विवाह का भी आयोजन करते हैं। इनमें से कई लड़कियों की शादी तो सागर से ही की जाती है। वहां ऐसी मान्यता है कि इन लड़कियों के दूल्हे यदि मर भी जाए तो भी यह लड़कियां विधवा नहीं मानी जाती।

यात्री कपिल मुनि के मंदिर में भी हाजिरी लगवाना जरूरी समझते हैं। वर्तमान मंदिर उस स्थान पर उस स्थान पर नहीं है जहां कभी कपिल मुनि ने तपस्या की थी। इस दौरान मंदिर का कई बार निर्माण हुआ। कई बार सागर ने उसे अपने आगोश में लिया। इस वर्तमान मंदिर को सागर से दूर स्थापित किया गया है। इसमें संगमरमर पत्थर की तीन मूर्तियां है। इनके बीच कपिल मुनि जी हैं और एक तरफ गंगा मैया है और दूसरी तरफ सागर राजा। उनसे कुछ दूरी पर अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है। यहां भजन-कीर्तन सुनने और दर्शन करने के पश्चात के यात्री विदा ले जाते हैं।

गंगासागर की एक बार की यात्रा का अनुभव ही अनूठा है। यहां बार-बार जाने की आवश्यकता नहीं रहती। स्मृतियों के सहारे वहां बार-बार जाने का जाने के तुल्य आनंद उठाया जा सकता है।

 

डॉ. प्रतिभा गोयल

(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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