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गहलोत के तीसरे शासनकाल का तीसरा सफल वर्ष

गहलोत के तीसरे शासनकाल का तीसरा सफल वर्ष
  • मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान में कांग्रेस के किलें को अभेद्य बनाए रखने में सफल

विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के ‘कांग्रेस मुक्त भारत अभियान’ से उपजे माहौल की वजह से आज 136 वर्ष पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व संकट में पड़ गया है और एक जमाने में पूरे देश पर एक छत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी का शासन आज कुछ राज्यों तक ही सिमट कर रह गया है। साथ ही कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज रसातल में अथवा भाजपा की शरण में चले गए हैं। सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी पिछलें दो आम चुनावों में भाजपा के आगे सफल नही हो पाए तथा राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने के बाद सोनिया गांधी को एक बार फिर से कांग्रेस की बागडोर सम्भालनी पड़ी है।

जनसंघ काल से लोकप्रिय अटल बिहारी के बाद भाजपा के ओजस्वी नेता के रुप में उभरें नरेंद्र दामोदरदास मोदी के देश का प्रधानमंत्री बनने के उपरान्त भारतीय जनता पार्टी का अश्वमेघ घोड़ा जिस तेज गति से विजयी रथ के साथ परिक्रमा पर निकला कि देखते ही देखते देश का मानचित्र भगवा रंग में रंगता गया।

किंतु राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को यूं ही जननायक नहीं कहा जाता। वे सही अर्थों में गांधीवादी और प्रचलित धारा से अलग नई परम्पराओं को स्थापित  करने वाले नेता है। कोरोना वायरस के कारण पैदा हुई वैश्विक महामारी और सम्पूर्ण देश में लॉकडाउन के तीसरे चरण की शुरुआत के मध्य विगत तीन मई को अपना जन्म दिवस नही मनाने की घोषणा कर उन्होंने जनता का दिल जीत लिया हैं। गहलोत जमीन से जुड़े एक संवेदनशील नेता हैं। वे आम अवाम के सुख दु:ख की फिक्र करते हैं और आपदाओं के वक्त पीडि़तों के सच्चे हमदर्द होते है।

उनकी इसी खूबी के कारण आज कोविड-19 की विपदा से निपटने और उभरती परिस्थितियों के बीच अपने सही निर्णयों और पहल के कारण वे राज्यो के हितों की रक्षा करने वाले नेता के रूप में उभरे है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ ही हर कोई उनके द्वारा उठायें गए कदमों की प्रशंसा कर रहा है।

वे युवा अवस्था में राजनीति में आए और देखते ही देखते दिग्गजों से भरी कांग्रेस पार्टी में कदम दर कदम आगे बढ़ते हुए अपनी बेजोड़ जादूगरी से देश एवं प्रदेश की राजनीति में ऐसे  छा गए कि आज वे देश की अग्रणी पंक्ति के एक अहम नेता बन चुके हैं। उनके सियासती कदमों ने अच्छे-अच्छे राजनैतिक सूरमाओं को धूल चटाई है।

राजनीति के कई दिग्गज पहले तो अशोक गहलोत को राजनीति का कच्चा खिलाड़ी मानते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी छुपी प्रतिभा को कुछ इस तरह प्रदर्शित कर दिखाया कि राजनीति के अनुभवी बड़े-बड़े नेता ‘कछुआ और खरगोश’ की दौड़ की तरह ठगे से तमाशा देखने  को मजबूर हो गए।

गहलोत जब पहली बार जोधपुर से  सांसद बन कर दिल्ली पहुंचे थे तो किसी ने नहीं सोचा था कि छरहरे शरीर और छह फुट लम्बाई वाला तथा बहुत ही शान्त रहने एवं कम बोलने वाला यह शख्स नवयुवक इंदिरा गांधी जैसी राजनैत्री और उनकी नृशंस हत्या के बाद प्रचण्ड बहुमत से प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और उनकी भी कायरतापूर्ण ढंग से हुई हत्या के बाद प्रधानमन्त्री बने नरसिम्हा राव जैसे सभी प्रतिभाशाली प्रधानमंत्रियों के मंत्रीमंडल में शामिल होगा।

केन्द्रीय मंत्री के रूप में गहलोत ने देश की राजधानी को जहां दिल्ली हाट एवं निफ्ट जैसे संस्थान के तोहफे दिये वहीं सिविल एवीएशन व पर्यटन के क्षेत्र में भी उन्होंने कई नवाचार किये। साथ ही गहलोत ने अपने निर्वाचन क्षेत्र जोधपुर को देश का पहला ऐसा नगर बनवा दिया जिसमें आज हर प्रकार के बड़े राष्ट्रीय संस्थान मौजूद हैं।

दिवंगत मोहनलाल सुखडियां, हरिदेव जोशी, नवल किशोर शर्मा, नाथूराम मिर्धा, राम निवास मिर्धा, कुंवर नटवर सिंह,  शिवचरण माथुर, जगन्नाथ पहाडिय़ा, हीरालाल देवपुरा, गुलाब सिंह शक्तावत, भीखाभाई, सी. पी. जोशी, कमला बेनीवाल, डा. गिरिजा व्यास, शीशराम ओला, परसराम मदेरणा, राजेश पायलट, बलराम जाखड़, बूटा सिंह आदि दिग्गज नेताओं से भरी राजस्थान कांग्रेस में जब वे पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बन कर आयें तो किसी को भी यह विश्वास नहीं हुआ था कि वे राजस्थान में अपनी धाक जमा पायेगें लेकिन जादूगर गहलोत ने अपना ऐसा जादू चला दिया कि वे एक बार नहीं …दो बार नहीं…तीसरी बार भी देश के भौगोलिक नक्शे पर सबसे बड़े सूबे राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गये।

अशोक गहलोत ने यह मुकाम  अचानक ही हासिल नहीं किया हैं, बल्कि इसके लिए उन्होंने रात-दिन समर्पित भाव से अपनी पार्टी के सिद्धान्तों के प्रति प्रतिबद्ध रह कर कड़ी लगन एवं मेहनत और कर्मठता के साथ अपनी एक अलग ही हैसियत बनाई है।

राजनीति में एक क्षण भी गंवाना उनकी डिक्शनरी में नहीं लिखा हैं। एक बार चुनाव में पराजित होने के बावजूद वे उसी दिन अपने मतदाताओं को घर-घर धन्यवाद देने अकेले ही निकल पड़े थे और देखते ही देखते ऐसा कारवां बना कि वे फिर कभी कोई चुनाव नहीं हारे। उस दिन रात को ही अपने निजी सहायकों से कहा कि चलो  कार्यकर्ताओं, परिचितों एवं शुभचिंतकों की सभी लिस्ट निकालो, हम नए सिरे से नई सूचियां बनाते है। उनके वर्षों पुराने सहायक बताते है कि गहलोत अलग ही मिट्टी के बने हैं। राजनीति उनके खून में रची बसी है, जिसके बूते वे रोज नई राजनीतिक बिसातें बिछाते हैं और उसमें प्राय: विजयी होते हैं।

राजनीति में लम्बी रेस का घोड़ा बनने की दिवंगत हरिदेव जोशी की नसीहत उनके जेहन  में इस तरह घर कर गई है कि उन्होंने अपने राजनीतिक कद को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाया हैं।उनमें हर वक्त हर विषय को गहराई से समझने की जिज्ञासा देखीं जा सकती हैं। चाहें वह मिठाई का डिब्बा हो अथवा कोई मेडिसिन दवाई का नुस्खा ही क्यों नहीं होवें, वे उसकी तासीर को समझे बिना उसका उपयोग कभी नहीं करते। इसी तर्ज पर राजनीति में भी फूंक -फूंक कर कदम उठाने का अभ्यास करते करते वे आज इसमें इतने पारंगत हो गये है कि लोग उन्हें राजनीति का चाणक्य तक कहने लगे हैं।

तभी तो राजनीति के सशक्त खिलाड़ी गहलोत अपनी संगठन क्षमता के बलबूते पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह प्रांत में पहले अपने दिवंगत वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को राज्यसभा का चुनाव जितवाने की प्रतिष्ठा से भरी लड़ाई में विजय दिलवा चुकें हैं। उन्होंने गुजरात विधानसभा के पिछली बार के चुनावों में भी भाजपा की चूलें हिलाने में कोई कसर बाकी  नहीं छोड़ी थी। सोनिया गांधी, राहुल गांधी व कांग्रेस पार्टी ने उन्हें समय-समय पर जो भी जिम्मेदारियां सौंपी, वे सारी उन्होंने बहुत ही शिद्दत के साथ निभाई। फिर चाहें कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के साथ पंजाब का चुनाव जितवाने की चुनौती ही क्यों नहीं हो? अथवा कर्नाटक में सरकार का गठन कराना हो अथवा दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में संगठन के कार्य होवें, उन्होंने हर कसौटी पर अपने आपको साबित कर दिखाया है।

मुकद्दर के सिकंदर माने जाने वाले गहलोत को अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी का पूरा समर्थन औरआशीर्वाद मिल रहा है। इससे गहलोत में एक नया हौसला एवं आत्मविश्वास देखा जा सकता है। वे अपनी पार्टी के गिने-चुने नेताओं में से एक हैं जो कि हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को हर रोज़ सार्वजनिक रूप से घेरने का साहस प्रदर्शित करते है। इन दिनों समसामयिक विषयों पर  उनकी बेबाकी एवं सटीक टिप्पणियां की  वजह  से  वे  बहुत  चर्चित हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वे पिछले कई वर्षों से खुल कर बोलते रहे है। चुनावी फण्ड को लेकर  उनके बयान से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में रहें है।

राजस्थान में विधानसभा उप चुनावों और पंचायत एवं निकाय चुनावों के परिणामों में मिली विजय से गहलोत एवं उनकी सरकार की साख बढ़ी हैं।

गहलोत अपनी पार्टी के जन घोषणा पत्र को सरकारी दस्तावेज बना उन्हें लागू करवाने की दिशा में मिली सफलताओं पर विशेष फोकस करने के साथ-साथ शेष घोषणाओं को अमली जामा पहनाने का रोडमेप बनाना भी उनके जेहन में सबसे पहली प्राथमिकताओं में शुमार हैं। हालांकि यह सच है कि कोविड के लम्बे कालखण्ड और लोकसभा एवं अन्य स्थानीय चुनावों के कारण प्रदेश में अधिकांश समय आचार संहिता लागू होने तथा कोरोना प्रबंधन से विकास का एजेण्डा प्रभावित हुआ है। लेकिन गहलोत बहुत ही साफगोई में विश्वास रखते है और हर सकारात्मक आलोचना को सरकार के लिए आई ऑपनर मान उन्हें अपनी कमियों को सुधारने का पैमाना मानते है। अपनी तीसरी पारी में गहलोत काफी बदले हुए तेवर दिखाते हुए चीते की चाल से परिणामदायक उपलब्धियों को पूरा करने में किसी प्रकार की कोताही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। वे अपनी सरकार के मूलमंत्र जवाबदेही, पारदर्शिता एवं संवेदनशीलता पर नहीं चलने वाले  सरकारी कारिंदों को भी अपना स्पष्ट सन्देश दे चुके हैं। उम्मीद है गहलोत के इन इरादों से आने वाले सालों में राजस्थान के विकास को नए पंख लगेंगे।

 

गोपेंद्र नाथ भट्ट

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