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पांच राज्यों के चुनावी शंखनाद का वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर प्रभाव

पांच राज्यों के चुनावी शंखनाद का वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर प्रभाव

हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, पंजाब, मणिपुर, गोवा, उत्तराखंड) मैं चुनाव की घोषणा कर दी गई है। चुनाव को भारत में लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है। चुनाव की घोषणा होते ही पूरे भारत में चुनावी माहौल सा हो गया है, होना भी चाहिए क्योंकि इन पांच राज्यों के चुनाव को जहां बीजेपी के लिए 2024 का सेमीफाइनल बोला जा रहा है तो वहीं दूसरी और कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व को भी इन चुनावों से जोड़ा जा रहा है।

पांच राज्यों के चुनाव में इस बार सबकी नजर उत्तर प्रदेश पर है, क्योंकि उसे वहां बीते 34 वर्षों की परंपरा को तोडऩे की चुनौती से जूझना है। उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से कोई भी राजनीतिक दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर सका है। यहां बीजेपी की सत्तावापसी इस लिहाज से बहुत मायने रखती है क्योंकि उसे इस प्रदेश से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे अपार समर्थन मिला था। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में इस बार भी बाजी मार ली तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की राजनीतिक पूंजी में इस लिहाज से पर्याप्त इजाफा हो जाएगा कि वो दोबारा बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधारों की तरफ कदम बढ़ा सके। इस चुनाव में कृषि कानूनों की वापसी यूपी चुनाव का प्रमुख मुद्दा भले न हो, लेकिन यह बैकग्राउंड में तो जरूर रहेगा।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी अपनी प्रतिस्पर्धी पार्टियों के मुकाबले काफी मजबूत दिख रही है। शासन-व्यवस्था और हिंदुत्व के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि से राज्य विधानसभा चुनाव काफी ध्रुवीकृत हो गया है। यूपी में बीजेपी योगी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और ओबीसी जैसे बड़े जातीय समूहों तक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ राम मंदिर निर्माण जैसे भावनात्मक मुद्दे पर भरोसा कर रही है। वर्ष 2017 के पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने वहां अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा सामने नहीं लाया था, लेकिन इस बार योगी आदित्यनाथ के रूप में उसके पास एक दमदार चेहरा है।

जहां तक बात पंजाब की है तो बीजेपी वहां पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और शिरोमणि अकाली दल संयुक्त (स््रष्ठ-स्) लीडर सुखदेव सिंह ढींढसा के साथ त्रीदलीय गठबंधन में शामिल है। वह पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं से समर्थन की उम्मीद लगाए बैठी है। खासकर, 5 जनवरी को एक रैली को संबोधित करने जा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में लगी सेंध के मुद्दे से उसकी यह उम्मीद बढ़ गई है। आखिर में बीजेपी की उम्मीद इस बात पर टिकी है कि भले ही उसे इस चुनाव में बहुत सीटें नहीं आ जाएं, लेकिन कृषि कानूनों को लेकर उससे दूर हुआ सिख समुदाय कुछ हद ही सही, नजदीक आएगा। वहीं, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा जैसे छोटे राज्यों के चुनाव थोड़े पेचीदा हैं। उत्तराखंड में बीजेपी ने लगातार मुख्यमंत्री बदले जिससे कांग्रेस को मजबूती मिली।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भारी जनसमूह के उमडऩे से बीजेपी राहत की सांस ले रही है। उसे लग रहा है कि उसके ताजातरीन सीएम पुष्कर सिंह धामी भ्रमित हो रहे मतदाताओं में पार्टी के फिर से विश्वास बहाली में सफलता पाई है। उधर, गोवा में राजनीतिक अस्थिरता ने इस चुनाव को मजेदार बना दिया है। गोवा का विधानसभा चुनाव मुख्यतौर पर बीजेपी-कांग्रेस और आप-टीएमसी के बीच माना जा रहा है! मसलन गोवा चुनाव बीजेपी के इस लिए भी अहम् हो जाता है क्योंकि 2017 के चुनाव में बीजेपी को कम सीट मिली थी और इस बार उसकी कोशिश पूर्ण बहुमत हासिल करने की होंगी। गोवा के बाद मणिपुर दूसरा राज्य है  जहां सबसे बड़ी पार्टी नहीं होने के बाद भी बीजेपी की सरकार बनी है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं बीजेपी नेता ने जून 2021 में ए शारदा देवी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर बहुत बड़ा दांव खेला था।

मणिपुर के सामाजिक जीवन में महिलाओं का अहम स्थान है। राजधानी इम्फाल में एक ऐसा बाजार है जहां की चार हजार से अधिक दुकानें सिर्फ महिलाएं ही चलाती हैं। ग्रामीण जीवन में भी महिलाएं घर-गृहस्थी का मुख्य आधार हैं। शरदा देवी ने अध्यक्ष बनते ही राज्य के कोने-कोने में यात्रा कर भाजपा की पहुंच को बढ़ाया है। उनके अध्यक्ष बनने के एक महीने बाद ही मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष गोबिनदास कोंथोजम पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गये। कांग्रेस के कई विधायक भी बीजेपी में शामिल हुए। बीजेपी अन्य दलों के मजबूत नेताओं को जोड़ कर अपना विस्तार कर रही है। अभी जो स्थिति है

उसके मुताबिक सबसे अधिक भाजपा के टिकट की मांग है। अधिकतर नेता बीजेपी से टिकट पाने के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं। एक बात तो तय है यह पांच राज्यों के चुनाव 2024 के लोकसभा के चुनाव में महत्वपूर्ण रोल अदा करेंगे।

 

डॉ. प्रीति

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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