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भाजपा में भगदड़ की सुगबुगाहट तो मीडिया में थी, नेतृत्व फिर भी नहीं जागा!

भाजपा में भगदड़ की सुगबुगाहट तो मीडिया में थी, नेतृत्व फिर भी नहीं जागा!

देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में चुनावी ऊट किस करवट बैठेगा उसकी बानगी दिखने लगी है। बहुमत के अहंकार के कारण इस बार चुनाव दिलचस्प होने के साथ ही दलबदल का एक नया इतिहास बनाने जा रहे हैं। टिकटों के बंटवारे से पहले भाजपा में ऐसी भगदड़ मचना अप्रत्याशित होने के अलावा पार्टी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। भगदड़ की सुगबुगाहट के बीच प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने किसी निवर्तमान विधायक की टिकटि न कटने की घोषणा की लेकिन किसी पर कोई भी असर न होना लाचारी का परिणाम है। सोचने वाली बात है कि दलितों व पिछड़ों की राजनीति करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी उपेक्षा से अगर इतने ही नाराज चल रहे थे तो पार्टी नेतृत्व या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें मनाने की कोशिश क्यों नहीं की और यह नौबत ही क्यों आने दी।

अहंकार की राजनीति में डूबा सूबे का नेतृत्व सत्ता की साझेदारी में अपना हिस्सा तो पूरा वसूल रहा था बाकी दूर से सब कुछ होते देख रहे थे। यह विद्रोह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है जो उसके जाति आधारित सियासी गणित को पलटते हुए उनके मंसूबों पर पानी फेर सकता है। तीन मंत्रियों के पद से इस्तीफा देने  और उनके समर्थन में अब तक 14 विधायकों के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की बात के बाद गठबंधन के दल के अब भाजपा को नसीहत देने लगे हैं कि उसे नेताओं के आत्मसम्मान का ख्याल रखना चाहिए। 5 साल पहले भाजपा सत्ता में गठबंधन के बल पर आई थी उनमें से एक भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर पहले ही भाजपा का दामन छोडक़र अखिलेश यादव की साइकिल पर जा बैठे हैं अभी अपना दल एस की संयोजक व केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल को भी सपा का साथ देने के लिए पूरी ताकत से लगे हुए हैं हालांकि अपना दल सोनेलाल अभी तक तो एनडीए का हिस्सा है लेकिन इस बार उसने अपने लिए ज्यादा सीटें मांगी है। भाजपा ने उसे पूरा नहीं किया तो अपना दल भी राजभर या स्वामी प्रसाद मौर्य की रास्ते पर जा सकता है। सपा को इन्हें सहयोगी बनाने से परहेज भी नहीं है। भाजपा के पास दलितों का ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं होगा जो 5 साल पहले की तरह ही उसे वोट दिला पाए।

विधानसभा के अन्दर भाजपा के विधायको की बगाबत पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने नजरअंदाज कर किसी खास वर्ग के ठीक-ठाक जनाधार रखने वाले नेता अपनी उपेक्षा से नाराज होकर पार्टी को गुडबाय कर रहे हैं। तब नेतृत्व को होश आता है और फिर डैमेज कंट्रोल में जुट जाता है लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी होती है। बताया जा रहा है कि की अनेक विधायक मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री से नाराज चल रहे थे लेकिन उनकी नाराजगी को केंद्रीय नेतृत्व तथा प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष ने कभी ध्यान नहीं दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि अचानक सभी ने एकजुट होकर इस्तीफे की झड़ी लगा दी है। अब तक भारतीय जनता पार्टी से 14 विधायकों ने इस्तीफा देकर भाजपा को संकट में डाल दिया है। भाजपा में भगदड़ की सुगबुगाहट तो मीडिया में थी, नेतृत्व फिर भी नहीं जागा आखिर क्यों?

भाजपा मीडिया कार्यालय में मीडिया प्रभारियों के बीच पत्रकार इनके आक्रोश के किस्से सुनाते रहे। अनेक सह मीडिया प्रभारी चटखारे लेकर सुनते थे उनका मौन किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं था। प्रदेश के संगठन प्रदेश के संगठन महासचिव सुनील बंसल और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव को पता ही नहीं लगा कि संगठन के नीचे से जमीन खिसक रही है। भारतीय जनता पार्टी में बड़े नेता अपने विधायकों की भविष्य में होने वाले चुनाव और उनकी समस्याओं के लिए फुर्सत ही नहीं रही उसका परिणाम आज भाजपा में भगदड़ के सामने आ रहा है। उत्तर प्रदेश में शीतलहर से बढ़ी ठिठुरन में भाजपा को पसीना-पसीना कर दिया है।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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